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अंतर्ध्वनि: अपनी सृष्टि के प्रति कलाकार में एक दायित्व भाव रहता है

Thu, 12 Sep 2019 01:16 AM IST
Nilesh Kumar अज्ञेय
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art - फोटो : अमर उजाला
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कला एक अपर्याप्तता की भावना के प्रति व्यक्ति का विद्रोह है। इसका अभिप्राय क्या है? कला संपूर्णता की ओर जाने का प्रयास है, व्यक्ति की अपने को सिद्ध प्रमाणित करने की चेष्टा है। अर्थात वह अंतत: एक प्रकार का आत्मदान है, जिसके द्वारा व्यक्ति का अहं अपने को अक्षुण्ण रखना चाहता है, भौतिक उपादेयता से श्रेष्ठ ढंग की उपादेयता का अनुभव करना चाहता है। 
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अतएव अपनी सृष्टि के प्रति कलाकार में एक दायित्व भाव रहता है। अपनी चेतना के गूढ़तम स्वर में वह स्वयं अपना आलोचक बनकर जांचता रहता है कि जो उसके विद्रोह का फल है, जो समाज को उसकी देन है, वह क्या सचमुच इतना आत्यंतिक मूल्य रखती है कि उसे प्रमाणित कर सके? इस प्रकार कलावस्तु रचना का एक नैतिक मूल्यांकन निरंतर होता रहता है। 

इस क्रिया को हम यों भी कह सकते हैं कि 'सच्ची कला कभी भी अनैतिक नहीं हो सकती' और यों भी कह सकते हैं कि 'प्रत्येक शुद्ध कला चेष्टा में अनिवार्य रूप से एक नैतिक उद्देश्य निहित है।' यह एक पक्ष है कि कला समाज के द्वारा समाज के इस या उस अंग के लिए नहीं है, पर उद्देश्यहीन सौंदर्योंपासना, निरा उच्छवास भी नहीं है, एक नैतिक उद्देश्य से अंत:सलिल है। किंतु दूसरा पक्ष भी है। 
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'आत्मदान' अहं को ही पुष्ट करने के लिए है, क्योंकि अहं को छोटा करके व्यक्ति संपूर्ण नहीं रह सकता, बल्कि शायद जी भी नहीं सकता। इस प्रकार कलाकार का आत्मदान केवल एक नैतिक मान्यता के लिए ही नहीं होता, सच्चे अर्थ में 'स्वान्त: सुखाय' भी होता है, और वह सुख अपनी सिद्धि पा लेने का, समाज को उसके बीच रहे होने का प्रतिदान दे देने का सुख है। 

कला के इस दोहरे उत्तरदायित्व को समझकर ही कलाकार अपने और अपने समाज और यदि उसकी आत्मा इतनी विशाल है कि 'समाज' के अंतर्गत समूचे मौलिक जगत को खींच सकती है, तब वह अपने संसार के संबंध को फलप्रद बना, सच्चा कलाकार हो सकता है। 
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(अज्ञेय: दिवंगत हिंदी कवि)
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