भारत में 'जल ही जीवन है' का मुहावरा काफी प्रचलित है, लेकिन इसका वास्तविक अर्थ देश की अधिकांश जनसंख्या को नहीं पता है, क्योंकि वो पानी के महत्व को न ठीक से समझते हैं ना ही ठीक से समझना चाहते हैं। पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र ने विश्व के सभी देशों को चेतावनी देते हुए कहा कि यदि पानी की बर्बादी को जल्द नहीं रोका गया तो जल्दी ही विश्व गंभीर जल संकट से गुजरेगा। दुनिया की आबादी जिस तरह से बढ़ रही है सबको स्वच्छ पेयजल मुहैया कराना विश्व के सभी देशों खासकर विकासशील देशों के लिए एक चुनौती है।
जलवायु में बदलाव व चुुुुुनौतियां
संयुक्त राष्ट्र की विश्व जल विकास रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि जलवायु परिवर्तन से पानी की उपलब्धता पर प्रभाव पड़ेगा, जिसकी वजह से वैश्विक खाद्य उत्पादन का मौलिक स्वरूप बदल सकता है। इस तरह आने वाले समय में मौसम में छोटे से छोटा बदलाव भी खाद्य असुरक्षा (खाद्य कीमतों में वृद्धि) और ग्रामीण क्षेत्र में गरीबी की घटनाओं को बढ़ा सकता है।
संयुक्त राष्ट्र के शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) और यूएन वॉटर के सहयोग से तैयार वर्ड वाटर डेवलपमेंट रिपोर्ट में आगाह किया गया है कि विश्व को अगले कई दशकों तक जल असुरक्षा और जलवायु परिवर्तन, दो बड़े संकटों का सामना करना पड़ेगा।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अध्ययन के अनुसार दुनियाभर में 86 फीसदी से अधिक बीमारियों का कारण असुरक्षित व दूषित पेयजल है। वर्तमान में 1600 जलीय प्रजातियां जल प्रदूषण के कारण लुप्त होने के कगार पर हैं। विश्व में 1.10 अरब लोग दूषित पेयजल पीने को मजबूर हैं और साफ पानी के बगैर अपना गुजारा कर रहे हैं।
जलसंकट और भारत
पिछले दिनों एक वैश्विक संस्था नेचर कंजरवेंसी ने साढ़े सात लाख से अधिक आबादी वाले 500 शहरों का जल ढांचे का अध्ययन कर यह निष्कर्ष निकाला कि भारत के भी कई शहर गंभीर जल संकट से गुजर रहे हैं और अगर समय रहते इसके लिए प्रबंध नहीं किए गए तो आने वाले समय में यहां विकराल स्थिति उत्पन्न हो जाएगी। देश के कई छोटे मझोले शहरों के साथ ही दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई, बंगलुरू और हैदराबाद जैसे बड़े महानगर भी जल संकट से जूझ रहे हैं।
देश में पानी के अधिकांश स्थानीय स्रोत सूख चुके हैं या उनका अस्तित्व नहीं रह गया है। देश की सैकड़ों छोटी नदियां विलुप्ति के कगार पर हैं, देश के अधिकांश गांव और कस्बों में तालाब और कुएं भी बिना संरक्षण के सूख चुके हैं। देश के अधिकांश जगहों में गंगा और यमुना अत्यधिक प्रदूषित हैं, जिसकी वजह से इसका पानी भी पीने योग्य नहीं रह गया है। कुल मिलाकर देश में जल संकट और जल संरक्षण को लेकर बहुत ज्यादा संजीदगी नहीं दिख रही है।
जल संरक्षण की दिशा में कुछ सार्थक प्रयास भी हो रहे हैं, मसलन मध्यप्रदेश के आदिवासी बाहुल्य झाबुआ जिले में लोग सामूहिक रूप से जल संरक्षण के लिए हलमा के जरिए प्रयास कर रहे हैं। दरअसल, हलमा भीली बोली का शब्द है, जिसका मतलब होता है- 'सामूहिक श्रमदान'। झाबुआ जिले के हाथीपावा की पहाड़ी पर पानी को रोकने के लिए सैकड़ों ग्रामीण कंटूर बना रहे हैं, ताकि बारिश के पानी को रोककर इस पहाड़ी के जंगल को एक बार फिर से तैयार किया जाए।
इस काम में बच्चे, बूढ़े और जवान अपना योगदान दे रहे हैं। मध्य प्रदेश के सागर जिले की आदिवासी बाहुल्यता वाली केसली जनपद पंचायत की एक ऐसी ही ग्राम पंचायत मरामाधो है, जहां के 2 हजार 246 लोगों ने अपनी मेहनत के बलबूते और सरकारी पहल के बल पर अपने पंचायत क्षेत्र को सिंचित बना लिया है। इसका सुखद परिणाम ही है कि कभी बारिश के चार माह बाद भी पानी को तरसने वाले ग्रामीण अब जल संकट से छिड़ी जंग को लगभग जीत चुके हैं।