पृथ्वी केवल मनुष्य की नहीं है बल्कि इस जगत में व्यापत सभी प्राणियों की है। इन सभी के सहयोग व सहचर्य के कारण पृथ्वी जीवित है।
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पृथ्वी केवल मनुष्य की नहीं है बल्कि इस जगत में व्यापत सभी प्राणियों की है। इन सभी के सहयोग व सहचर्य के कारण पृथ्वी जीवित है। अक्सर हम स्वयं को श्रेष्ठ मानने की मानसिकता में अपने से कमज़ोर का शोषण करते देखे जाते हैं।
मनुष्य और प्रकृति के बिगड़ते संबंध
पृथ्वी के भीतर भी अनंत चराचर जीवों का निवास है और हम अपने आशियाने की तलाश में उनके आशियाना नष्ट करते चले जा रहे हैं जिसका प्रभाव पृथ्वी में जल, थल और वायु में विचरण करने वाले जीवों में देखा जा सकता है।
शहरों में आबादी व वृक्षों के नदारद होने के कारण पक्षियों का डेरा घरों की मुंडेर व बालकनी बन गया है। प्रजनन के दौरान घर न हो पाने के कारण उनके अंडे आपको कभी घरों में तो कभी बालकनी में मिलते हैं।
जंगलों के तेजी से कटने व भोजन की तलाश के कारण जानवरों का प्रवेश आबादी वाले क्षेत्रों में बढ़ गया है, और इन सब घटनाओं से भी हमने नहीं सीखा की यह मनुष्य और प्रकृति के मध्य बिगड़ते संबंधों का नतीजा है जिसने अपनी विस्तार की नीति में केवल अपने हित को प्राथमिकता दी।
आज व्यक्ति व सामाजिक हितों की टकराहट के कारण पृथ्वी में असंतुलन की स्थितियां पनप रही है। आज व्यक्ति व समाज की ज़िम्मेदारी बन जाती है कि वह छोटे-छोटे स्तर पर इस असंतुलन को कम करने का प्रयास करे ताकि वह पृथ्वी में जीवन के संतुलन बचा सके।
अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब पृथ्वी उसी प्रारम्भिक अवस्था में स्वयं को पहुंचा लेगी जहां जीवन नदारद था और पृथ्वी जलमय थी। ऐसे में जयशंकर प्रसाद की कामयानी की चिंता सर्ग की पंक्तियां याद आती है। जहां पृथ्वी जलमग्न है और मनु चिंता में-
हिमगिरी के उत्तुंग शिखर पर‚ बैठ शिला की शीतल छांह
एक पुरुष‚ भीगे नयनों से‚ देख रहा था प्रलय प्रवाह।
नीचे जल था‚ ऊपर हिम था‚ एक तरल था एक सघन
एक तत्व की ही प्रधानता कहो उसे जड़ या चेतन।
दूर दूर तक विस्तृत था हिम स्तब्ध उसीके हृदय समान
नीरवता – सी शिला‚ चरण से टकराता फिरता पवनमान।
तरुण तपस्वी सा वह बैठा‚ साधन करता सुर- श्मशान
नीचे प्रलय सिन्धु लहरों का‚ होता था सकरुण अवसान।
बंधी महाबट से नौका थी सूखे में अब पड़ी रही
उतर चला वह जलप्लावन और निकलने लगी मही।
निकल रही मर्म वेदना‚ करुणा विकल कहानी सी
वहाँ अकेली प्रकृति सुन रही‚ हंसती सी पहचानी सी।
चिन्ता करता हूं मैं जितनी उस अतीत की‚ उस सुख की
उतनी ही अनंत में बनती जातीं रेखाएं दु:ख की।
स्वयं देव थे हम सब‚ तो फिर क्यों न विश्रृंखल होती सृष्टि
अरे अचानक हुई इसी से कड़ी आपदाओं की वृष्टि।
मौन! नाश! विध्वंस! अंधेरा!शून्य बना जो प्रगट अभाव‚
वही सत्य है‚ अरी अमरते! तुझको यहाँ कहाँ ठांव।
मृत्यु‚ अरी चिरनिद्रे! तेरा अंक हिमानी सा शीतल‚
तू अनन्त में लहर बनाती काल – जलधि की – सी हलचल।
वाष्प बन उजड़ा जाता था वह भीषण जल संघात‚
सौर चक्र में आवर्तन था प्रलय निशा का होता प्रात:।
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