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विश्व पर्यावरण दिवस: जल, जंगल और जमीन की बढ़ती समस्या, मनुष्य-प्रकृति के बिगड़ते संबंध

सार

मनुष्य और प्रकृति एक दूसरे के पूरक है। दोनों का साथ और सहयोग ही पृथ्वी को हरा-भरा और खूबसूरत बना सकता है। लेकिन हम सभी इस पूरकता को भूलते जा रहे हैं।
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आज 5 जून है और आज का ही दिन विश्व पर्यावरण दिवस के रूप में पूरे विश्व में मनाया जाता है। - फोटो : istock
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विस्तार
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आज 5 जून है, यह दिन विश्व पर्यावरण दिवस के रूप में पूरे विश्व में मनाया जाता है। हमारे यहां दिवसों की भी एक लंबी परंपरा निर्मित होती जा रही है। पहले यह दिवस सामाजिक स्तर पर आंदोलन और संरक्षण के रूप में सक्रिय थे और जमीनी स्तर पर काम भी कर रहे थे। लेकिन अब तिथि और दिन बनकर याद किए जा रहे हैं। अब सरकारी फंडिंग और अन्य तरीकों से अनिवार्य रूप से इसे सभी को जागरूक करने के उद्देश्य से एक जागरूक दिवस के रूप में मनाया जाने लगा है। लेकिन यह आज भी जमीनी स्तर पर कारगर नहीं है।

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वर्तमान समय में बड़ी तादाद में वृक्ष लगाए जाते हैं और तस्वीरें वायरल होती है। मगर उनकी देखभाल और संरक्षण पर कोई बहस नहीं होती है। जबकि हमारी परंपराओं में प्रकृति के प्रति साहचर्य और संरक्षण का भाव पहले से मौजूद है। उसी के कारण आज भी पृथ्वी पर जीवन है, लेकिन यह जीवन कब तक संभव हो सकेगा यह विचारणीय प्रश्न है।

कोरोना आपदा में ऑक्सीजन की किल्लत ने मनुष्य को ऑक्सीजन के महत्व को समझा दिया और पर्यावरण के संरक्षण पर पुन: मंथन के लिए विचाराधीन बना दिया। इस आपदा ने हमें पुन: पर्यावरण संरक्षण पर सोचने और पुन: एकजुट होकर आगे आने की सीख दी है, क्योंकि हम सभी सुविधाओं के कारण पर्यावरण के प्रति लापरवाह हो चुके हैं।
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यह लापरवाही केवल महानगरों में ही देखने को नहीं मिलती बल्कि ग्रामीण परिवेश में भी इसे देखा जा सकता है। जहाँ जंगलों का जलना लगातार जारी है, कहीं यह व्यक्ति हित के कारण हो रहा है तो कहीं लापरवाही से जंगल के जंगल जल रहे हैं। शहरों से लेकर गांवों तक कूड़े और इलेक्ट्रॉनिक कचरे का पहाड़ बन रहा है जो विकास की दौड़ में अभी बहस के केंद्र से बाहर है।

प्रकृति का बढ़ता विनाश

मनुष्य और प्रकृति एक दूसरे के पूरक है। दोनों का साथ और सहयोग ही पृथ्वी को हरा-भरा और खूबसूरत बना सकता है। लेकिन हम सभी इस पूरकता को भूलते जा रहे हैं।

मनुष्य के सहयोग से उपभोग की बढ़ती लालसाओं का ही परिणाम है कि जल, जंगल और जमीन की समस्या आज सभी समस्याओं में केंद्रीय समस्या बनकर उभर रही है। इस पर भी विचार तब होता है जब मनुष्य पर विपदाओं का पहाड़ टूट पड़ता है। अन्यथा मनुष्य अपनी उपभोगवादी लालसाओं के साथ जीवन में आगे बढ़ता चला जाता है।


वर्तमान में पूरा विश्व महामारी के इस दौर में पुन: सोचने और समझने को मजबूर हुआ कि उसकी विकास यात्रा में उसकी सहयात्री प्रकृति कहां है? क्योंकि विकास भले ही मनुष्य की कामना है लेकिन संसाधन का सहयोग तो प्रकृति ही देती है। फिर भी अहम् भाव में हम मनुष्य स्वयं को आदि और अंत मानने की अपनी मानवीय प्रवृति में अपनी ही सहयात्री और सहयोगी प्रकृति को नष्ट करते हुए आगे बढ़ जाते हैं। भविष्य की आक्षंकाओं पर उस कबूतर की भांति आंखे बंद कर लेते हैं जो सोचता है उसके सामने खड़ी बिल्ली उसे नहीं खाएगी।

मनुष्य का भी स्वभाव इसी प्रकार है वह अपनी आकांक्षा और लोभ में सब कुछ नष्ट कर देता है और फिर हाहाकार की स्थिति में आ जाता है। मनुष्य और प्रकृति के मध्य आदिकाल से सहचर्य का संबंध रहा है। लेकिन धीरे-धीरे यह संबंध टूट रहा है और उपभोग-उपभोक्ता का संबंध बन रहा है।

मनुष्य और प्रकृति के बदलते संबंधों पर वैश्विक स्तर चर्चाएं हो रही है और प्रकृति और मनुष्य के संबंध को पुन: मजबूत बनाने व प्रकृति के संरक्षण के लिए सैद्धांतिक स्तर पर कार्य किया जा रहा है। इसी कार्य प्रक्रिया में इस बार विश्व पर्यावरण दिवस का थीम भी ‘केवल एक पृथ्वी’ रखा गया है।

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पृथ्वी केवल मनुष्य की नहीं है बल्कि इस जगत में व्यापत सभी प्राणियों की है। इन सभी के सहयोग व सहचर्य के कारण पृथ्वी जीवित है। - फोटो : Istock
पृथ्वी केवल मनुष्य की नहीं है बल्कि इस जगत में व्यापत सभी प्राणियों की है। इन सभी के सहयोग व सहचर्य के कारण पृथ्वी जीवित है। अक्सर हम स्वयं को श्रेष्ठ मानने की मानसिकता में अपने से कमज़ोर का शोषण करते देखे जाते हैं।

मनुष्य और प्रकृति के बिगड़ते संबंध

पृथ्वी के भीतर भी अनंत चराचर जीवों का निवास है और हम अपने आशियाने की तलाश में उनके आशियाना नष्ट करते चले जा रहे हैं जिसका प्रभाव पृथ्वी में जल, थल और वायु में विचरण करने वाले जीवों में देखा जा सकता है।

शहरों में आबादी व वृक्षों के नदारद होने के कारण पक्षियों का डेरा घरों की मुंडेर व बालकनी बन गया है। प्रजनन के दौरान घर न हो पाने के कारण उनके अंडे आपको कभी घरों में तो कभी बालकनी में मिलते हैं।

जंगलों के तेजी से कटने व भोजन की तलाश के कारण जानवरों का प्रवेश आबादी वाले क्षेत्रों में बढ़ गया है, और इन सब घटनाओं से भी हमने नहीं सीखा की यह मनुष्य और प्रकृति के मध्य बिगड़ते संबंधों का नतीजा है जिसने अपनी विस्तार की नीति में केवल अपने हित को प्राथमिकता दी।

आज व्यक्ति व सामाजिक हितों की टकराहट के कारण पृथ्वी में असंतुलन की स्थितियां पनप रही है। आज व्यक्ति व समाज की ज़िम्मेदारी बन जाती है कि वह छोटे-छोटे स्तर पर इस असंतुलन को कम करने का प्रयास करे ताकि वह पृथ्वी में जीवन के संतुलन बचा सके।

अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब पृथ्वी उसी प्रारम्भिक अवस्था में स्वयं को पहुंचा लेगी जहां जीवन नदारद था और पृथ्वी जलमय थी। ऐसे में जयशंकर प्रसाद की कामयानी की चिंता सर्ग की पंक्तियां याद आती है। जहां पृथ्वी जलमग्न है और मनु चिंता में-
हिमगिरी के उत्तुंग शिखर पर‚ बैठ शिला की शीतल छांह
एक पुरुष‚ भीगे नयनों से‚ देख रहा था प्रलय प्रवाह।
नीचे जल था‚ ऊपर हिम था‚ एक तरल था एक सघन
एक तत्व की ही प्रधानता कहो उसे जड़ या चेतन।

 दूर दूर तक विस्तृत था हिम स्तब्ध उसीके हृदय समान
नीरवता – सी शिला‚ चरण से टकराता फिरता पवनमान।
तरुण तपस्वी सा वह बैठा‚ साधन करता सुर- श्मशान
नीचे प्रलय सिन्धु लहरों का‚ होता था सकरुण अवसान।

बंधी महाबट से नौका थी सूखे में अब पड़ी रही
उतर चला वह जलप्लावन और निकलने लगी मही।
निकल रही मर्म वेदना‚ करुणा विकल कहानी सी
वहाँ अकेली प्रकृति सुन रही‚ हंसती सी पहचानी सी।

चिन्ता करता हूं मैं जितनी उस अतीत की‚ उस सुख की
उतनी ही अनंत में बनती जातीं रेखाएं दु:ख की।
स्वयं देव थे हम सब‚ तो फिर क्यों न विश्रृंखल होती सृष्टि
अरे अचानक हुई इसी से कड़ी आपदाओं की वृष्टि।

मौन! नाश! विध्वंस! अंधेरा!शून्य बना जो प्रगट अभाव‚
वही सत्य है‚ अरी अमरते! तुझको यहाँ कहाँ ठांव।
 मृत्यु‚ अरी चिरनिद्रे! तेरा अंक हिमानी सा शीतल‚
तू अनन्त में लहर बनाती काल – जलधि की – सी हलचल।

वाष्प बन उजड़ा जाता था वह भीषण जल संघात‚
सौर चक्र में आवर्तन था प्रलय निशा का होता प्रात:।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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