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मणिपुर विधानसभा चुनाव 2022: आखिर क्यों हारी कांग्रेस?

सार

बीरेन सिंह का कहना है कि मुख्यमंत्री के बारे में फैसला केंद्रीय नेतृत्व करेगा। बीते विधानसभा चुनाव के समीकरणों को ध्यान में रखें तो राज्य की राजनीति मे दलबदल का असर समझने में आसानी होगी। वर्ष 2017 में कांग्रेस 28 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी थी जबकि बीजेपी को महज 21 सीटें मिली थीं।
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एनपीपी और एनपीएफ को पिछली बार चार-चार सीटें मिली थीं। लेकिन इन दोनों दलों का प्रदर्शन बेहतर हुआ है। - फोटो : Agency
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विस्तार
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देश में खासकर उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड के विधानसभा चुनाव और उसके बाद रूस और यूक्रेन के बीच शुरू हुई लड़ाई में पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में हुए विधानसभा चुनाव भले हाशिए पर रहे हों, इस छोटे-से पर्वतीय राज्य में लड़ाई कम दिलचस्प नहीं थी। साठ विधानसभा सीटों वाले इस राज्य में वोटरों ने लगातार दूसरी बार किसी एक पार्टी को बहुमत नहीं दिया है। वर्ष 2017 से पहले लगातार 15 साल तक यहां राज कर चुकी कांग्रेस को जहां बड़े पैमाने पर दलबदल की कीमत चुकानी पड़ी है, वहीं क्षेत्रीय दलों के बेहतर प्रदर्शन ने भी उसका खेल बिगाड़ दिया।

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वैसे भी इस बार नागा पीपुल्स फ्रंट (एनपीएफ) और मेघालय के मुख्यमंत्री कोनराड संगमा की नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) को किंगमेकर माना जा रहा था। नतीजे भी अनुमान के अनुरूप ही रहे हैं। मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह शुरू से ही इस बार कम से कम 40 सीटें जीत कर अकेले अपने बूते बीजेपी की सत्ता में वापसी का दावा करते रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और तमाम दूसरे केंद्रीय नेताओं ने राज्य में चुनाव प्रचार किया था। बावजूद इसके बीजेपी अपने दावे से दूर रही है। इस बार भी उसे सरकार बनाने के लिए सहयोगी दलों का सहारा लेना होगा। शुरुआती रुझानों के बाद मुख्यमंत्री ने दावा किया कि एनपीएफ सरकार में उनके साथ रहेगा। लेकिन एनपीपी के बारे में पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता।
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बीरेन सिंह का कहना है कि मुख्यमंत्री के बारे में फैसला केंद्रीय नेतृत्व करेगा। बीते विधानसभा चुनाव के समीकरणों को ध्यान में रखें तो राज्य की राजनीति मे दलबदल का असर समझने में आसानी होगी। वर्ष 2017 में कांग्रेस 28 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी थी जबकि बीजेपी को महज 21 सीटें मिली थीं।

लेकिन राज्यपाल ने बीजेपी को सरकार बनाने का न्योता दिया था और उसने एनपीएफ और एनपीपी के अलावा निर्दलीयों के समर्थन से अपना बहुमत साबित कर दिया। उसके बाद तो कांग्रेस में बड़े पैमाने पर पलायन हुआ और उसके 13 विधायक दूसरे दलों में शामिल हो गए। कांग्रेस विधायकों के शामिल होने के बाद बीजेपी के विधायकों की तादाद भी कुछ महीनों बाद 28 तक पहुंच गई थी।

एनपीपी और एनपीएफ को पिछली बार चार-चार सीटें मिली थीं। लेकिन इन दोनों दलों का प्रदर्शन बेहतर हुआ है। अबकी सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस को हुआ है। उसकी कुछ सीटें बीजेपी के खाते में गई हैं तो बाकी क्षेत्रीय दलों के खाते में।

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कांग्रेस ने हार की वजहों की समीक्षा करने की बात कही है। - फोटो : social media
राज्य में पिछड़ापन, विकास और बेरोजगारी जैसे मुद्दे ही अहम रहे। बीजेपी के अलावा तमाम दलों ने अपने घोषणापत्र में विवादास्पद सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम (अफस्पा) के खात्मे को प्रमुख मुद्दा बनाया था। लेकिन नतीजों से साफ है कि अफस्पा का मुद्दा इस बार भी असरदार साबित नहीं हुआ। उधर, बीजेपी ने कहा है कि अब सरकार के गठन के बाद पार्टी केंद्र से इस अधिनियम को हटाने का अनुरोध करेगी।

मुख्यमंत्री बीरेन सिंह कहते हैं कि उनके पांच साल के शासनकाल के दौरान राज्य में शांति बहाल हुई और अब इसी बुनियाद पर अफस्पा को खत्म करने की मांग उठाई जा सकती है। बीजेपी ने अपने चुनाव अभियान के दौरान लगातार मणिपुर को नाकाबंदी मुक्त करने का दावा किया। पहले मणिपुर हर बात पर महीनों लंबी आर्थिक नाकेबंदी के लिए कुख्यात था।

दूसरी ओर, कांग्रेस ने हार की वजहों की समीक्षा करने की बात कही है। राजनीतिक पंडितों का अनुमान था कि अगर पार्टी पिछले प्रदर्शन के आसपास रहती है तो वह एनपीपी के साथ मिलकर सरकार बना सकती है। लेकिन उसके खराब प्रदर्शन ने इस संभावना को खत्म कर दिया।

वैसे, आम लोगों में चुनावी मुद्दों के प्रति कोई खास उत्साह नहीं था। इस संवाददाता ने अपने एक सप्ताह मणिपुर प्रवास के दौरान जितने लोगों से बात की उन सबका कहना था कि सरकार में कोई भी आम लोगों के जीवन में कोई खास बदलाव नहीं आएगा। राजधानी इंफाल तक में पीने के पानी और सीवर का भारी संकट है। लेकिन नतीजों पर इसका कोई असर नहीं नजर आ रहा है। फाल में एकाध ओवरब्रिज ही है। नतीजतन ट्रैफिक जाम की भारी समस्या है।

राजनीतिक विश्लेषक पी. नाओबा कहते हैं, "एक मजबूत विपक्ष के अभाव और क्षेत्रीय दलों के बीच वोटों के विभाजन ने बीजेपी का फायदा पहुंचाया है। बीते पांच साल के दौरान बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार ने ऐसा कोई काम नहीं किया है जिसके कारण उसकी सीटों में इजाफा होता। खुद पार्टी के नेताओं को भी इसका भरोसा नहीं था।"

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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