दिल्ली में 500 स्कूलों को खोलने और यमुना को साफ करने के ऐलान पर अभी तक आप फंसी हुई है।
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कांग्रेस-अकाली दल और भाजपा की स्थिति
कांग्रेस और अकाली दल ने पूरे 7 दशक तक पंजाब पर राज किया है, ऐसे में उनको उखाड़ फेंकना बड़ी बात तो थी ही, एक पॉजीटिव फैक्टर भी था उनके लिए कि अब कोई नया चाहिए, आम पंजाबी के अंदर ये बैठ गया था। इस चुनाव में पंजाबियों के पास एक नहीं बल्कि तीन तीन नई पार्टियां थीं, आप तो थी ही, अमरिंदर सिंह की पंजाब लोक कांग्रेस और बीजेपी भी थी।
बीजेपी नई इसलिए क्योंकि 24 साल अकालियों के साथ जूनियर पार्टनर रहने के बाद इस बाद वो पहली बार कायदे से चुनाव लड़ रहे थे, लेकिन किसान आंदोलन के साइड इफैक्ट्स के साथ, इसका फायदा भी आप को मिला तो कांग्रेस में चन्नी-सिद्धू- अमरिंदर की फूट का फायदा भी आप को साफ मिलता दिखा है।
हालांकि आप के लिए जमीन तो पिछले चुनावों में बन ही गई थी, रहा सहा काम पहले अमरिंदर सिंह की विदाई, फिर चन्नी-सिद्धू के बवाल ने कर दिया, साफ संदेश गया कि कांग्रेस के पास पंजाह के लिए कोई कोई ऐसा रास्ता या चेहरा नहीं, जो पंजाब के लोगों को पसंद आए। जाहिर है ऐसे में दिल्ली मॉडल ने आम पंजाबी को काफी प्रभावित किया, फ्री की बिजली, सस्ता पानी इनमें सबसे आगे था। बाकी वो अपने स्कूल और अस्पतालों, खासतौर पर मोहल्ला क्लीनिक का दावा तो करते ही हैं।
आढ़तियों के चंगुल में फंसे पंजाब के किसानों को कुछ भी मुफ्त मिलना एक तरह से तोहफा है। इस बार वायदे भी ऐसे किए गए, जो सीधे पब्लिक को फायदा पहुंचाने वाले हैं, महिलाओं के खाते में एक हजार रुपया हर महीने आया करेगा, जिसके चलते राजनीति से थोड़ा दूर रहने वाली महिलाओं को ये आइडिया बड़ा अच्छा लगा। कम से कम एक फिक्स इनकम जैसी होगी, जो उनकी अपनी होगी।
केजरीवाल की अपनी रणनीति कुछ नए वर्गों के लिए काम करने की भी रहती है। नवम्बर में मुझे खुद गोवा इंटरनेशनल फिल्म फेस्टीवल के दौरान वहां कुछ दिन रहने को मौका मिला, तो कई टैक्सी वालों से बात करने को मिला। इन चुनावों मे भले ही आम आदमी पार्टी को 2 सीटें ही गोवा में मिल पाई हों, लेकिन गोवा के टैक्सी वाले केजरीवाल के शर्तिया मुरीद थे, उनको कोरोना महामारी के दौरान आम आदमी पार्टी ने काफी सपोर्ट किया।
सभी गरीबों को लक्ष्य बनाने के बजाय वहां आप ने मोटे तौर पर टैक्सी वाले परिवारों की मदद की। जाहिर है राशन और दवाइयों से। दिल्ली में तो हर टैक्सीवालों को पांच हजार रुपया महीने लॉकडाउन के दौरान दिया ही गया था, ऐसे में सरकारी खजाने से गए इस पैसे ने पार्टी का बेस मजबूत किया।
दिल्ली में तो केजरीवाल नियंत्रण कर लेते हैं, लेकिन अब इतनी दूर से हर मंत्री, विधायक, नेता, अधिकारी पर नजर रखना आसान नहीं होगा।
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केजरीवाल के लिए चुनौतियां
केजरीवाल की नजर मोदी सरकार द्वारा दिए जा रहे मुफ्त राशन पर भी कभी से है, तभी तो उसकी होम डिलीवरी देकर योजना का नाम बदलने की कोशिश की, लेकिन केन्द्र सरकार ने उसे भांपकर रोक लगा दी।
केजरीवाल के लिए पंजाब में चुनौतियां भी कम नहीं होंगी, 300 यूनिट बिजली फ्री करने के अलावा, 12 घंटे तक किसानों को फ्री बिजली देना, हर वयस्क महिला को 1000 रुपए देना, विधवा आदि की पेंशन 500 से बढ़ाकर 2500 करना, 16000 महिला क्लीनिक खोलना, हॉस्पिटल, स्कूलों की स्थिति सुधारना आदि।
हालांकि दिल्ली में 500 स्कूलों को खोलने और यमुना को साफ करने के ऐलान पर अभी तक आप फंसी हुई है। लेकिन बीजेपी विरोधी वोटों को इकट्ठा इस आधार पर लेना कि कांग्रेस तो बर्बादी की कगार पर है, अपने वोट खराब ना करें, ये दिल्ली फॉरमूला पंजाब में भी उनके लिए काम कर गया है।
आर्थिक चुनौतियों के अलावा भी आप के लिए पंजाब एक बड़ी चुनौती है क्योंकि बॉर्डर स्टेट है, खालिस्तानियों की नजर इस राज्य पर रहती है, केजरीवाल का पिछले चुनावों में एक ऐसे व्यक्ति के यहां रुकना, कुमार विश्वास के आरोप पहले से ही परेशानी का सबब बन चुके हैं। ऐसे में जबकि बादल पिता-पुत्र हार गए हैं और मोटे तौर पर एसजीपीसी में उनके लोग हैं, यहां की धार्मिक भावनाएं प्रबल हैं, तो कभी भी राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी चिंताएं यहां की सरकार से हो सकती हैं।
जाहिर है दिल्ली में तो केजरीवाल नियंत्रण कर लेते हैं, लेकिन अब इतनी दूर से हर मंत्री, विधायक, नेता, अधिकारी पर नजर रखना आसान नहीं होगा।
वैसे भी राज्य की कमान उस व्यक्ति के हाथों में होगी, जो अपने शराब के शौक के लिए पहले से ही विपक्ष के निशाने पर रहे हैं, और घर से संसद के अंदर तक जाने और सिक्योरिटी गेट्स लाइव फेसबुक पर दिखाने का उनका वीड़ियो पहले से वायरल हो चुका है, ऐसे में लोग ये आसानी से जज्ब नहीं कर पाएंगे कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मसले पर भगवंत मान वाकई में गंभीर हो जाएंगे। क्या वैसी गंभीरता ला पाएंगे जैसी कि किसान आंदोलन के दौरान कैप्टन अमरिंदर सिंह ने दिल्ली आकर गृहमंत्री अमित शाह से मिलकर दिखाई थी।
हालांकि अभी तक केजरीवाल धार्मिक अतिवादियों से फायदा लेते रहने के बावजूद उनसे सार्वजनिक दूरी बनाते हुए रखते आए हैं, शाहीन बाग की मंच पर नहीं गए, दिल्ली दंगों में भी खुलकर नहीं उतरे, अखिलेश यादव की तरह ना तो मुस्लिम दागदार चेहरों को टिकट दी और ना जिन्ना के नाम का इस्तेमाल किया। बल्कि सावधानी से दिल्ली में तिरंगा लहरा दिए और राम-कृष्ण की बजाय खुद को हनुमान भक्त के तौर पर स्थापित कर लिया है।
धीरे से पंजाब को ध्यान में रखकर अम्बेडकर और भगत सिंह दोनों को अपने एजेंडे में शामिल कर लिया। इसका फायदा उन्हें मिला भी है, लेकिन पंजाब आसान राज्य नहीं है, वो भी तब जब खुद केजरीवाल वहां नहीं हों और ना ही उनका दिल्ली का कोई करीबी विश्वस्त नेता, सो रिमोट कंट्रोल से सरकार कैसे चलाएंगे?
क्या भगवंत मान दिल्ली से ऐसे तार जोड़कर पंजाब की सरकार को चला पाएंगे, जिससे उनकी सरकार और देश के विरोधियों को भी पंजाब को पटरी से उतारने का मौका नहीं मिल पाए? ये सवाल वक्त के गर्भ में हैं, और इनका जवाब वक्त ही देगा।
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