खटीमा गोलीकाण्ड के मात्र एक दिन के अन्तराल में मसूरी में भी गोलीकाण्ड हो गया।
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खटीमा से गिरने लगी थीं आन्दोलनकारियों की लाशें
दरअसल, उधमसिंहनगर जिले के खटीमा में स्थानीय पुलिस ने 1 सितम्बर से पहले क्षेत्र में घर-घर तलाशी के दौरान लोगों से अभद्रता करने के साथ ही कई युवाओं को अकारण हिरासत में लेकर उन्हें थाने में टॉर्चर करना शुरू कर दिया था जिसके विरोध में 1 सितम्बर 1994 को पूर्वाहन लगभग 11.10 बजे खटीमा पुलिस स्टेशन के सामने 10 से 15 हजार के करीब भीड़ एकत्र होकर पुलिस और प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी करने लगी। जिस पर पुलिस ने अकारण गोलीबारी कर दी।
इस घटना में 7 लोग मारे गए जिनकी लाशों को पुलिस ने अपने ढंग से ठिकाने लगाने के बाद मुश्किल से तीन लोगों के मरने की पुष्टि की तथा 4 अन्य को लापता बता कर मामला रफादफा करने का प्रयास कर दिया। पुलिस ने जिन तीन आन्दोलनकारियों के मारे जाने की पुष्टि की थी उनमें भगवान सिंह सिरौला, प्रताप सिंह एवं सलीम अहमद शामिल थे। इन तीनों को पुलिस ने मृतक बताया उनकी को भी परिजनों को देने के बजाय उनका खटीमा से 10-15 किमी दूर मझोला में अंतिम संस्कार कर दिया।
इनमें से दो हिन्दुओं को फूंका गया और एक अन्य मुस्लिम आन्दोनकारी के शव को मिट्टी में दबा दिया गया। शेष 4 अन्य की लाशों को पहले ही ठिकाने लगा दिया गया था इसलिए उनका पोस्टमार्टम तक नहीं हुआ। पहले लापता और फिर मृतक बताए गए आन्दोलनकारियों में धर्मानन्द भट्ट, गोपीचन्द, परमजीत सिंह, एवं रामलाल शामिल थे। इन चारों की मौत की पुष्टि बाद में सीबीआइ जांच में हुई और अदालत में सरकारी वकील ने भी इन मौतों की पुष्टि की।
इस पुलिस कार्रवाई में 250 से अधिक आन्दोलनकारी घायल हुए थे और लगभग 47 लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार कर बराणसी आदि जेलों में भेज दिया था। इस प्रकार देखा जाय तो उत्तराखण्ड राज्य के सपने को साकार बनाने के लिए 1994 की जनक्रांति की नीव में हिन्दू, मुसलमान और सिख तीनों के लहू ने मजबूती प्रदान की थी और पृथक पहाड़ी राज्य के लिए भड़की जनक्रांति की मसाल पहाड़ से दूर मैदानी खटीमा से जल उठी थी।
खटीमा के दूसरे दिन मसूरी हुई लहूलुहान
खटीमा में 1 सितम्बर गोलीकाण्ड की खबर जंगल की आग की तरह जब सारे उत्तराखण्ड में फैली तो लोग आग बबूला हो उठे। इसकी प्रतिक्रिया पहाड़ों की रानी मसूरी में भी होनी स्वाभाविक ही थी। लेकिन प्रशासन की नादानी और दमन की नीति के फलस्वरूप खटीमा गोलीकाण्ड के मात्र एक दिन के अन्तराल में मसूरी में भी गोलीकाण्ड हो गया जिसमें एक काबिल डीएसपी उमाकांत त्रिपाठी समेत 8 लोगों की मौत एवं दर्जनों अन्य घायल हो गए। त्रिपाठी गोलीबारी का विरोध कर रहे थे इसलिए पीएसी ने सबसे पहले उन्ही को गोली मार कर घायल किया।
पुलिस ने बिना किसी वारण्ट और बिना किसी वैध कारण के 47 लोगों को गिरफ्तार कर लिया जिनमें नगरपालिका के पूर्व अध्यक्ष हुक्म सिंह पंवार एवं रिटायर्ड डीआइजी एस.पी. चमोली भी शामिल थे। इन गिरफ्तार लोगों को मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करने के बजाय बस में ठूंस कर बरेली जेल भेज दिया गया। रास्ते में उनके साथ मारपीट की गई और भोजन तथा पानी भी नहीं दिया गया। वे दूसरे दिन 5 बजे सांय भूखे प्यासे बरेली जेल पहुंचे।
मसूरी के थाना प्रभारी को 1 सितम्बर 1994 को बदल दिया ग।
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मसूरी का झूलाघर बना जलियांवाला बाग
दरअसल, खटीमा काण्ड के विरोध में 2 सितम्बर 1994 को आन्दोलनकारियों ने मसूरी बंद का आवाहन किया था। इस पर एसडीएम और थाना प्रभारी की एक संयुक्त रिपोर्ट में कहा गया था कि मसूरी के नागरिकों की शांतिप्रिय प्रवृति को देखते हुए बंद के दौरान अतिरिक्त पुलिस बल भेजने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन प्रशासन के दुराग्रहपूर्ण रवैये के कारण उस रिपोर्ट की उपेक्षा कर मसूरी के थाना प्रभारी को 1 सितम्बर 1994 को बदल दिया गया और वहां पीएसी और पुलिस की भारी मात्रा में तैनाती कर दी गई।
नए थाना प्रभारी ने मसूरी पहुंचते ही 2 सितम्बर 1994 की प्रातः झूलाघर स्थित धरना स्थल पहुंचकर 5 आन्दोलनकारियों को गिरफ्तार कर दानपात्र सहित कुछ अन्य सामान जब्त कर धरनास्थल खाली कर उस पर कब्जा कर दिया। इससे आन्दोलनकारी और अधिक आक्रोशित हो गए और हजारों की संख्या में मसूरीवासियों ने पुनः झूलाघर स्थित धरनास्थल पर कब्जा कर खटीमा गोली काण्ड के हताहतों के लिए श्रद्धाजलि सभा शुरू कर दी। उस समय मसूरी के डीएसपी उमाकांत त्रिपाठी झूलाघर को पुनः आन्दोलनकारियों को सौंपने को तैयार थे जबकि नया थानेदार इसके लिए तैयार नही हुआ।
इसी दौरान अचानक पीएसी और पुलिस के जवानों ने बिल्डिंग को घेर कर एसडीएम की अनुमति के बिना अकारण ही जनता पर फायरिंग शुरू कर दी। इस गोलीबारी के लिये एसडीएम से भी बंदूक की नोक पर बाद में अनुमति ली गई।
अपने ही डीएसपी को मरवाया पुलिस ने
सीबीआई द्वारा इलाहाबाद हाइकोर्ट में दाखिल जांच रिपोर्ट के अनुसार पुलिस ने मात्र 5 फुट की दूरी से श्रीमती हंसा धनाईं और श्रीमती बेलमती चौहान पर गोलियां बरसा दीं जिससे दोनों का भेजा फटकर बाहर निकल गया। इसी दौरान रायसिंह बंगारी, धनपत सिंह और मदन मोहन ममगाईं को भी गोलियां लगीं और उनकी मौत हो गई। एक गढ़वाली कांस्टेबल ने बलबीर सिंह नेगी नाम के युवक के सीने में रायफल का बेनट घोंप दिया जिससे उसकी भी मौत हो गईं।
राजेन्द्रसिंह नाम के एक एडवोकेट के सीने में गोली मारी गई जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गया। फायरिंग के दौरान पुलिस लाठीचार्ज भी करती रही। पुलिस क्षेत्राधिकारी उमाकांत त्रिपाठी ने जब अपने हिंसा पर उतारू अपने लोगों को चिल्लाकर रोकने की कोशिश की तो उन पर भी .303 (थ्रीनॉट थ्री) रायफल से गोली चला दी गई जिससे वह भी घायल हो गए। पुलिस ने अपने घायल डीएसपी को सुरक्षा में अलग उपचार कराने के बजाय अन्य घायल आन्दोलनकारियों के साथ ही आम आदमी की तरह जीपों में ठूंस कर उन्हें अस्पताल भेज दिया जहां आक्रोशित लोगों ने पुलिस की वर्दी में एक घायल को देख कर गलतफहमी में उसे अस्पताल से बाहर फेंक कर मौत के घाट उतार दिया।
खटीमा-मसूरी गोली काण्डों ने आग में घी का काम किया
खटीमा और मसूरी गोली काण्डों ने उत्तराखण्ड आन्दोलन में आग में घी का काम किया और गांव-गांव में लोग उद्वेलित हो उठे और दशकों से सुलग रही असन्तोष की आग जबरदस्त दवानल में बदल गई। इसके बाद सम्पूर्ण गढ़वाल और कुमाऊ के आवाल, वृद्ध वनिता पृथक राज्य की मांग के लिए वलिदान देने हेतु आन्दालन में कूद पड़े।
भारत में नब्बे के दशक के उत्तराखण्ड आन्दोलन के जैसा दूसरा उदाहरण कोई नहीं है जिसमें लोग अलग देश के लिए नहीं बल्कि भारत के प्रति पूर्ण आस्था के साथ उत्तर प्रदेश से अलग नए पहाड़ी प्रदेश के लिए अपनी जान तक देने के लिए पुलिस की लाठी गोलियों के आगे खड़े हुए।
इसी के बाद 2 अक्टूबर को मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहे पर प्रशासन और पुलिस ने ऐसा काण्ड किया जिसकी मिसाल शायद ही दुनिया में कहीं शायद ही मिले। क्योंकि पुलिस ने न केवल कई आन्दोलनकारियों को मौत के घाट उतारा बल्कि हजारों लोगों की मौजूदगी में रात के अंधेरे में कई आन्दोलनकारी महिलाओं के साथ बलात्कार करने के साथ बेहद बहशियना ढंग से उनकी लज्जाभंग की। इलाहाबाद हाइकोर्ट ने आन्दोलन के दौरान सरकार द्वारा की गई कार्यवाही को राज्य प्रायोजित आतंकवाद की संज्ञा दी। इतनी शहादतों के बाद राज्य तो मिला मगर साथ ही पदलोलुपता, प्रचंच और अवसरवाद ने धूमिल कर दिया शहीदों के सपनों को।
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