यूसीसी के बारे में जरूरी बातें।
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विधि आयोग का कार्यकाल यूसीसी के लिए बढ़ा?
जस्टिस ऋतुराज अवस्थी की अध्यक्षता में 21 फरबरी 2020 को 22वें विधि आयोग का गठन 3 साल के लिए हुआ था जिसका कार्यकाल फरबरी 2023 में पूरा होने के बाद उसे 31 अगस्त 2024 तक का विस्तार दिया गया है। भारत का विधि आयोग एक गैर-सांविधिक निकाय है और भारत सरकार के विधि और न्याय मंत्रालय की एक अधिसूचना द्वारा कानून के क्षेत्र में अनुसंधान करने के लिए एक निश्चित समय सीमा के साथ इसे गठित किया जाता है और आयोग के विचारार्थ विषयों के अनुसार सरकार को (रिपोर्ट के रूप में) सिफारिशें करता है।
वर्तमान आयोग के समक्ष भी विधि एवं न्याय मंत्रालय द्वारा समान नागरिक संहिता के मामले को संदर्भित किया गया है। आयोग को अपने मूल कार्यकाल की समाप्ति के बाद अब यूसीसी पर तत्परता दिखाने को सीधा मतलब भारत सरकार का इस मुद्दे को अपनी प्रथमिकता में लाना है। तत्परता भी तब दिखाई जा रही है जबकि उसका मूल कार्यकाल ही समाप्त हो गया। सरकार का इस विषय पर इतनी रुचि दिखाने का मतलब 2024 का लोकसभा चुनाव ही हो सकता है।
आसान नहीं था इसलिए हो रहा ट्रायल
संविधान के नीति निर्देशक तत्व संख्या 44 में सरकार सेे भारत के पूरे क्षेत्र के अंन्दर समान नागरिक संहिता लागू करने की अपेक्षा की गई है। मौलिक अधिकारों संबंधी अनुच्छेद 24 से 28 की रुकावटों, देश की संास्कृतिक विधिता और अनुसूची 5 और 6 की विशेष परिस्थितियों के कारण भारत की सरकारें अब तक इसे लागू नहीं कर सकीं। मोदी सरकार धारा 370 को तक हटाने का बहुत ही मुश्किल काम आसानी से कर गई। लेकिन वह भी देश की धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता तथा संवैधानिक प्रावधानों को देखते हुए ‘‘यूसीसी’’ को लेकर ठिठक गई।
यह संहिता सीधे तौर पर लोगों की आस्था और धार्मिक परम्पराओं के मौलिक अधिकारों से संबंधित है। यह भारत के धर्मनिरपेक्ष चरित्र से भी संबंधित है और सुप्रीम कोर्ट की सबसे बड़ी बेंच 1973 में कह चुकी है कि संसद के पास संविधान संशोधन के व्यापक अधिकार तो हैं लेकिन असीमित अधिकार नहीं हैं। उसी समय कोर्ट का यह भी कहना था कि संविधान की मूल भवना से छेड़छाड़ नहीं की जा सकती है और अगर ऐसा होता है तो सुप्रीमकोर्ट को ऐसे संशोधनों की समीक्षा का अधिकार है। इसलिए उत्तराखण्ड की यूसीसी को भी कोर्ट में चुनौती अवश्य मिलेगी।
संवैधानिक प्रावधान आड़े आएंगे यूसीसी के आगे
जहां तक उत्तराखण्ड में ‘‘यूसीसी’’ का सवाल है तो राज्य विधानसभा को कानून बनाने का पूरा अधिकार है मगर संविधान के दायरे से बाहर जाने का अधिकार नहीं। यह संविधान की समवर्ती सूची का है और अनुच्छेद 254(1) कहता है कि समवर्ती सूची के विषयों पर संसद के साथ ही विधानसभा भी कानून बना तो सकती है लेकिन अगर दोनों के कानून टकराते हैं तो केन्द्र के कानून के आगे राज्य का कानून स्वतः अमान्य हो जाएगा।
चूंकि इस विषय पर पहले ही संसद द्वारा पारित हिन्दू मैरेज ऐक्ट और मुस्लिम पर्सनल लॉ जैसे कानून मौजूद हैं, जिन्हें बदलने का अधिकार राज्य विधानसभा को नहीं है। लेकिन इसी अनुच्छेद के 254 (2) में कहा गया है कि अगर समवर्ती सूची में राज्य विधानसभा द्वारा पारित कानून को राष्ट्रपति अनुमति देते हैं तो वह कानून उस राज्य की सीमा के अंदर लागू हो सकता है।
जाहिर है कि इसी धारा को ध्यान में रखते हुए उत्तराखण्ड में ‘‘यूसीसी’’ बनाने की पहल हो रही है और बिना केन्द्र सरकार के आश्वासन या प्रोत्साहन के राज्य सरकार द्वारा यह पहल नहीं हो सकती थी। इस यूसीसी में मौलिक अधिकारों के हनन के साथ ही लिव इन रिलेशन, सम्पति का उत्तराधिकार, सरकारी कर्मचारियों तथा दूसरे राज्यों में रह रहे प्रवासियों पर बंदिशें जैसी कुछ एंसी खामियां हैं जो अदालती हस्तक्षेत्र के लिए पर्याप्त कारण है। ऐसा लगता है कि केन्द्र सरकार ट्रायल के तौर पर उत्तराखण्ड में यह संहिता परखना चाहती है और देखना चाहती है कि इसके सामाजिक, राजनीतिक और संवैधानिक प्रभाव क्या हो सकते हैं।
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