भारत के लिए अपनी विदेश नीति निर्धारण में भारतीय हितों की चिंता सर्वोपरि रही है और होनी भी चाहिए।
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अमेरिका की रणनीति और रूस-यूक्रेन
एक बारगी अमेरिका यूक्रेन को नाटो के साथ नहीं भी जोड़े तो उसका क्या बिगड़ता है। उसकी चौधराहट पर आंच आती है और सारी दुनिया में उसका रौब तनिक घटता है। इसके अलावा कोरोना काल में आर्थिक मंदी ,बेरोज़गारी,महँगाई और ठन्डे पड़े हथियार कारोबार को बढ़ाने के लिए उसे नए छोटे-छोटे देश चाहिए। इस कारण इन देशों का नाटो के बैनर तले आना अमेरिका ज़रूरी समझता है। रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद वह कहता है कि हर देश को इसका विरोध करना चाहिए।
प्रश्न यह भी पूछा जा सकता है कि संसार के हर हिस्से में उसे दख़ल का हक़ किसने दिया? विश्व के किसी भी मुल्क़ में अपनी फौज भेजने से पहले वह किसी संगठन और राष्ट्र से मशविरा तक नहीं करता। यहां तक की संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी संस्था को वह अपनी जेबी संस्था समझता है।
अंतरराष्ट्रीय शक्ति संतुलन का तक़ाज़ा यह कहता है कि कोई देश इतना ताक़तवर भी नहीं होना चाहिए कि वह समूचे संसार पर अपनी दादागीरी करे। इस नज़रिए से एक समानांतर शक्ति केंद्र भी आवश्यक है। यह इसलिए भी ज़रूरी है कि शेष विश्व कठपुतली की तरह किसी मुल्क़ के इशारों पर नहीं नाचे।
भारत के लिए अपनी विदेश नीति निर्धारण में भारतीय हितों की चिंता सर्वोपरि रही है और होनी भी चाहिए। मगर हमने बीते दिनों कभी-कभी भारत की तराजू अमेरिका के पलड़े में झुकती हुई देखी है। दूसरी ओर अमेरिका को हमने सदैव एक कारोबारी नज़रिए से भारत के साथ रिश्ते रखने वाला देखा है।पचास साल तक वह पाकिस्तान को पालता -पोसता रहा।
सुरक्षा परिषद् में जब भी भारत को शामिल करने और वीटो अधिकार देने की बात उठी तो पाकिस्तान ,अमेरिका और चीन ने ही विरोध किया। जब आर्थिक उदारीकरण का दौर आया तो अमेरिका एक चतुर बनिए की तरह भारत के साथ व्यवहार करने लगा। भारत उसकी चौधराहट की चकाचौंध में ठगा सा दिखाई दिया।
अमेरिका के मौजूदा राष्ट्रपति जो बाइडेन और उप राष्ट्रपति कमला हेरिस ( भले ही वे भारतीय मूल की हैं ) कश्मीर के मामले में भारत की नीति का समर्थन नहीं करते।
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भारत की स्थिति से समझना होगा हालात
अमेरिका ने भारत- पाकिस्तान की हर जंग में पाकिस्तान का साथ दिया और अपने हथियारों का बाज़ार भारत के इस पड़ोसी के लिए खोलकर रखा।आज भी उसके लिए भारत अपने व्यापारिक और कूटनीतिक हित साधने का एक ज़रिया है।
हमने देखा है कि जब हम अमेरिका के साथ रिश्तों का हनीमून मना रहे थे तो वह अफ़ग़ानिस्तान में हमें झटका दे रहा था और ईरान से संबंध तोड़ने पर ज़ोर दे रहा था। वह अपनी मंडी के माल को भारत में खपाना चाहता था और हथियार बाज़ार का बड़ा ख़रीददार बनाना चाहता था। इसीलिए जब भारत ने रूस के साथ मिसाइल सौदा किया तो उसने कड़ा विरोध किया। आज भी वह इस मुद्दे पर भारत के साथ नहीं है।
वह पाकिस्तान के साथ पींगें बढ़ा सकता है लेकिन भारत के मामले में सावधान रहता है। अमेरिका के मौजूदा राष्ट्रपति जो बाइडेन और उप राष्ट्रपति कमला हेरिस ( भले ही वे भारतीय मूल की हैं ) कश्मीर के मामले में भारत की नीति का समर्थन नहीं करते।
दूसरी तरफ रूस ने भारत की आज़ादी के बाद से ही उसके पुनर्निर्माण में कंधे से कन्धा मिलाकर साथ दिया है। आज सरपट भागती दुनिया में कोई देश या देशों का समूह वैचारिक आधार पर संबंधों का निर्धारण नहीं करता। अमेरिका लोकतांत्रिक है, पर पूंजीवादी सोच के चलते लोकतंत्र की अनेक मान्यताएं ताक में रख देता है।
चीन और रूस भी अब वामपंथी नहीं रहे। पाकिस्तान में चुनाव तो होते हैं लेकिन वहाँ सैनिक तानाशाही हमेशा हावी रही। तो जब कोई नैतिक आधार नहीं रहा तो गठबंधन भी विशुद्ध निजी हितों के आधार पर क्यों नहीं होना चाहिए।