इस्तांबुल और तुर्की के इतिहास को बयान करने वाला स्मारक है आयासोफिया (हागिया सोफिया)
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तकसीम चौक पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र ज़रूर है पर इस्तांबुल और तुर्की के इतिहास को बयान करने वाला स्मारक है आयासोफिया (हागिया सोफिया।) पहले गिरिजाघर, फिर मस्जिद और अब संग्रहालय। इस इमारत की गिरिजाघर से मस्जिद और मस्जिद से संग्रहालय की यात्रा तुर्की के इतिहास और विरोधाभास दोनों का ही जीवंत दस्तावेज है। संग्रहालय भी देखिए और सामने बनी सुल्तान अहमद मस्जिद या नीली मस्जिद (Blue Mosque) भी।
आयासोफिया (हागिया सोफिया) 537 ईस्वी में बना ऐसा शानदार गिरिजाघर जो अपने ज़माने की सबसे दर्शनीय इमारत थी। इसे उस समय की अभियांत्रिकी का नायाब नमूना कहा गया था। तत्कालीन वास्तुकला का बेहतरीन प्रतीक। 537 ई. में अपने निर्माण से लेकर सन् 1453 तक ये अपनी वास्तुकला के साथ ही एक गिरिजाघर के रूप में ही कायम रहा। मई 1453 में उस्मानी शासक महमद द्वितीय द्वारा इस्तांबुल पर कब्ज़ा करते ही इस गिरिजे को मस्जिद में तब्दील कर दिया गया था।
1453 से 1931 तक ये इमारत मस्जिद ही रही। फिर 1931 में जब तुर्की गणराज्य बन गया था, तब मुस्तफा कमाल पाशा, यानी अतातुर्क ने इसे संग्रहालय में बदल कर आमजन के लिए खोलने का आदेश दिया। 1935 से ये इमारत एक संग्रहालय के रूप में अब तुर्की आने वाले सर्वाधिक पर्यटकों को आकर्षित करने वाला केंद्र है। ये एक अनूठी इमारत है जिसमें ईसा-मसीह और मदर मैरी भी दीवारों पर दिख जाते हैं और कुरान की आयतें और मिहराब भी।
जब आप इस्तांबुल जाते हैं तो टूर गाइड आपको तुर्की के गणराज्य बन जाने की कहानी सुनाते समय कहता है कि इससे तुर्की अधिक सेक्यूलर यानी ‘धर्म-निरपेक्ष’ हो गया। भारत में तो ख़ैर इस शब्द को लेकर ख़ासा विवाद है ही, पर तुर्की के परिवेश में ये प्रयोग बहुत ही दिलचस्प है।
ये दरअसल कट्टरपंथ से मुक्ति का प्रतीक है वहां के लोगों के लिए। इसके संदर्भ और मानी उसी विरोधाभास और पहचान के संकट की ओर आपको ले जाएंगे जिससे आज का तुर्की जूझ रहा है। क्या वो पुराने इस्लामी कट्टरपंथ को अपनाए या फिर गणराज्य के रूप में उसने जिस आधुनिकता और खुलेपन को को अंगीकार किया है उसे ही आगे बढ़ाता चले।
धर्मनिरपेक्षता के बहाने भारत की बात चली ही है तो एक और महत्वपूर्ण संदर्भ का जिक्र जो भारत और तुर्की को जोड़ता है। ये ख़िलाफत और महात्मा गांधी वाले से भिन्न संदर्भ है। वो नाम है बिस्मिल। जी हां, हमारे महान क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल। क्रांति को सफल बनाने के लिए काकोरी में ट्रेन से अंग्रेज़ों का खजाना लूटने वाले जांबाज़ योध्दा।
तुर्की के अतातुर्क यानी मुस्तफा कमाल पाशा रामप्रसाद बिस्मिल से प्रभावित थे। बिस्मिल भी तुर्की में मुस्तफा के नेतृत्व में चल रही क्रांति से प्रभावित थे और उन्होंने 1922 में 'प्रभा' पत्रिका में 'विजयी कमाल पाशा' नाम से एक लेख भी लिखा था, जब अगस्त 1922 में वहां विजय दिवस मनाया गया था।
कमाल पाशा ने अपनी क्रांति की शुरुआत दियारबाकिर प्रांत से की थी।
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तुर्की के दक्षिण में एक प्रांत है-दियारबाकिर। कमाल पाशा ने अपनी क्रांति की शुरुआत दियारबाकिर प्रांत से की थी। दियारबाकिर का अर्थ है विद्रोहियों का इलाका। 1923 में मुस्तफा के नेतृत्व में तुर्की गणराज्य बन गया। 1927 में बिस्मिल, अशफाक व रोशन सिंह को फांसी के बाद मुस्तफा कमाल पाशा ने अमर सपूतों का अपने संस्मरणों में जिक्र भी किया। इस प्रांत में एक शहर का नाम है बिस्मिल।
इस शहर की आधिकारिक साइट तो इस बात की पुष्टि नहीं करती पर इतिहास के एक शोधार्थी सुधीर विद्यार्थी के मुताबिक मुस्तफा कमाल पाशा ने रामप्रसाद बिस्मिल की याद में ही इस शहर का नाम बिस्मिल रखा। हालांकि बिस्मिल राम प्रसाद जी का तखल्लुस ही था। बिस्मिल के मानि हैं घायल या आहत।
मरमरा और काले सागर के बीच बास्तुरस के मुहाने पर बसा इस्तांबुल। दुनिया का एकमात्र शहर जो दो महाद्वीपों में पसरा है। इस्तांबुल की ये यात्रा बहुत ही दिलचस्प और यादगार रही। यात्राएं यों भी बहुत दिलचस्प होती हैं। यात्रा करने के लिए हम बाहर जाते हैं पर यात्रा हमें भीतर ले जाती है। बहुत अंदर। गहरे। बहुत दूर तक। बिना प्रयत्न। कोई किताब, लेख, फिल्म या वीडियो यात्रा से मिले प्रत्यक्ष अनुभव की बराबरी नहीं कर सकता। हां, यात्रा के लिए संदर्भ ज़रूरी है और संदर्भ के लिए लेख, किताबें और फिल्म। पर ये सब सहायक हैं। सहयात्री हैं। इनका साथ मिलने से यात्रा का आनंद बढ़ता है। पर ये ना भी हों तो भी यात्रा होनी चाहिए। बिना संदर्भ यात्रा का अपना मज़ा है। यात्रा ख़ुद ही अपने संदर्भ तैयार करती चलती है।
ये दुनियादारी और मजबूरी ना हो तो कोई झोला उठा कर बस घूमता ही रहे!
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