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इस्तांबुल: अपनी ही तलाश में भटकता एक शहर

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इस्तांबुलः संस्कृतियों के मिलन-बिंदु पर खड़ा इतिहास का जीवंत दस्तावेज़ - फोटो : पार्थो कुणार:अमर उजाला
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कंधे से कंधा सटाकर खड़ी इमारतें। पहाड़ के उतार-चढ़ाव का साथ देते लाल कवेलू की छत वाले मकान। समंदर के सीने पर तने हुए लंबे झूलते पुल। ऊंची नोकदार मीनारों के बीच बड़े गोल गुम्बद वाली मस्ज़िदें। किसी भी योरपीय देश की तरह चौड़ी खुली सड़कें और उन पर फर्राटा भरती बड़ी-बड़ी गाड़ियां। गोरी चमड़ी और तगड़ी कद-काठी के पुरुष। बुर्के या हिजाब या स्कार्फ़ वाली महिलाएं, साथ ही कुछ स्कर्ट-टॉप वाली लड़कियां भीं।

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इन दृश्यों को देखकर तो इस्तांबुल एक सामान्य सा शहर ही मालूम पड़ता है, जो बस शायद थोड़ा अलग है। एक सामान्य पर्यटक के लिए सामान्य। थोड़ा अलग देख पाने वाले के लिए थोड़ा अलग। इन दृश्यों और शब्द चित्रों में छिपे विरोधाभासों को पढ़ सकने वाले किसी यात्री के लिए बेहद रहस्यमयी और रोमांचित करने वाला शहर और किसी इतिहास के शोधार्थी के लिए सभ्यताओं और संस्कृतियों के मिलन-बिंदु पर खड़ा इतिहास का जीवंत दस्तावेज़!

जी, हां, बायज़ेंटियम (बाज़न्तीन), या नया रोम या कुस्तुंतुनिया या इस्तांबुल। साम्राज्य और गणराज्य की परतों के  भीतर से झांकता एक शहर, जो कभी एशिया की खिड़की से पूरब को ताकता है तो कभी योरप के दरवाज़े से होकर पश्चिम को निकल पड़ता है। उसकी परेशानी भी यही है– पूरब से उगे या पश्चिम में ढले या फिर उन सांचों में जिनमें उसे ढालने की कोशिश समय-समय पर होती रही है। अपने अस्तित्व के कौन से हिस्से पर नाज़ करे और किसे बिसरा दे?
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क्या वो सरायबर्नु में बायज़ेंटियम के रूप में अपने सबसे पहले स्वरूप को याद करे या फिर उस महान रोमन साम्राज्य का हिस्सा होने पर गर्व करे जिसे कोन्सटेंटिन प्रथम जैसे महान शासक ने आकार दिया था। इस शहर से कोंस्टेंटिन के लगाव और प्रभाव के कारण ही इसका नाम कुस्तुंतुनिया (कोंस्टेंटिनोपोल) पड़ा। जबकि कोंस्टेंटिन ख़ुद इसे नए रोम के नाम से पुकारता और देखता था। या फिर ये शहर उस महान उस्मानी (ऑटोमन) साम्राज्य की विरासत पर फख्र करे जिसका परिचय देने वाली इमारतें अब भी यहां मौजूद हैं। या फिर वो बस उस गणराज्य का जश्न मनाता चले जिसे वहां के राष्ट्रपिता मुस्तफा कमाल पाशा- अतातुर्क ने स्थापित किया। तुर्की की पेशानी पर पहचान के संकट की ये शिकन बा-आसानी देखी-पढ़ी जा सकती है।   

ओरहान पामुक को बचपन में हमेशा ये लगता रहा कि उनका कोई हमशक्ल इस्तांबुल में ही कहीं रहता है।  हूबहू उनके जैसा। जब भी वो इस्तांबुल की गलियों में घूमने निकलते, अपने उस हमशक्ल को ढूंढ़ने लगते। वो बहुत उत्सुकता और कौतुहल के साथ खिड़कियों में झांकने लगते। देखते कि कहीं वो ‘दूसरा’ओरहान दिखाई तो  नहीं दे रहा। 

इस्तांबुल की उन गलियों की सी गलियों में पामुक की ये तलाश महज संयोग या निजी कौतूहल नहीं लगती। मुझे लगता है कि पामुक की आंखों से खुद इस्तांबुल अपने आप को तलाश रहा है, इसीलिए इस्तांबुल ने पामुक को चुनकर उनसे ऐसा लेखन भी करवाया होगा, जो उसका शब्द-चित्र खींचता है। भीतर झांकता है। प्रतिबिम्ब तैयार करता है। खुद को तलाशता है। तो कई विरोधाभासों को एक साथ जीते और ख़ुद को तलाशते इस शहर इस्तांबुल की यात्रा दिलचस्प रही। शहर का मुख्य चौराहा-तकसीम, जिसे यहां के लोगों ने उच्चारण में भी टैक्ज़िम कर दिया है और कई जगह लिखते भी Taxim ही हैं। ये चौराहा और इसके इर्द-गिर्द की गलियां इस्तांबुल शहर का सबसे हलचल वाला हिस्सा हैं।

ये यहां का ह्रदयस्थल यानि डाउन-टाउन है। ये गलियां सारी रात जागती हैं। यहां के छोटे-बड़े पब और रेस्त्रां रात भर आबाद रहते हैं। इस चौक के बीचों-बीच तुर्की का चर्चित गणराज्य स्मारक बना हुआ है। इसे 1923 में तुर्की के गणराज्य बनने की याद में बनाया गया, जिसका अनावरण 1928 में हुआ। इसमें मुस्तफा कमाल पाशा के अलावा इश्मत इनोनु और फेवज़ी कक्माक की प्रतिमाएं हैं। तकसीम का अर्थ होता है बंटवारा। इस चौक का नाम तकसीम इसलिए पड़ा क्योंकि पुराने इस्तांबुल में पानी की मुख्य लाइन यहीं आती थी और उसका आगे बंटवारा होता था।

इस्तांबुल और तुर्की के इतिहास को बयान करने वाला स्मारक है आयासोफिया (हागिया सोफिया) - फोटो : पार्थो कुणार:अमर उजाला

तकसीम चौक पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र ज़रूर है पर इस्तांबुल और तुर्की के इतिहास को बयान करने वाला स्मारक है आयासोफिया   (हागिया सोफिया।) पहले गिरिजाघर, फिर मस्जिद और अब संग्रहालय। इस इमारत की गिरिजाघर से मस्जिद और मस्जिद से संग्रहालय की यात्रा तुर्की के इतिहास और विरोधाभास दोनों का ही जीवंत दस्तावेज है। संग्रहालय भी देखिए और सामने बनी सुल्तान अहमद मस्जिद या नीली मस्जिद (Blue Mosque) भी। 

आयासोफिया (हागिया सोफिया) 537 ईस्वी में बना ऐसा शानदार गिरिजाघर जो अपने ज़माने की सबसे दर्शनीय इमारत थी। इसे उस समय की अभियांत्रिकी का नायाब नमूना कहा गया था। तत्कालीन वास्तुकला का बेहतरीन प्रतीक। 537 ई. में अपने निर्माण से लेकर सन् 1453 तक ये अपनी वास्तुकला के साथ ही एक गिरिजाघर के रूप में ही कायम रहा। मई 1453 में उस्मानी शासक महमद द्वितीय द्वारा इस्तांबुल पर कब्ज़ा करते ही इस गिरिजे को मस्जिद में तब्दील कर दिया गया था।

1453 से 1931 तक ये इमारत मस्जिद ही रही। फिर 1931 में जब तुर्की गणराज्य बन गया था, तब मुस्तफा कमाल पाशा, यानी अतातुर्क ने इसे संग्रहालय में बदल कर आमजन के लिए खोलने का आदेश दिया। 1935 से ये इमारत एक संग्रहालय के रूप में अब तुर्की आने वाले सर्वाधिक पर्यटकों को आकर्षित करने वाला केंद्र है। ये एक अनूठी इमारत है जिसमें ईसा-मसीह और मदर मैरी भी दीवारों पर दिख जाते हैं और कुरान की आयतें और मिहराब भी। 

जब आप इस्तांबुल जाते हैं तो टूर गाइड आपको तुर्की के गणराज्य बन जाने की कहानी सुनाते समय कहता है कि इससे तुर्की अधिक सेक्यूलर यानी ‘धर्म-निरपेक्ष’ हो गया। भारत में तो ख़ैर इस शब्द को लेकर ख़ासा विवाद है ही, पर तुर्की के परिवेश में ये प्रयोग बहुत ही दिलचस्प है।

ये दरअसल कट्टरपंथ से मुक्ति का प्रतीक है वहां के लोगों के लिए। इसके संदर्भ और मानी उसी विरोधाभास और पहचान के संकट की ओर आपको ले जाएंगे जिससे आज का तुर्की जूझ रहा है। क्या वो पुराने इस्लामी कट्टरपंथ को अपनाए या फिर गणराज्य के रूप में उसने जिस आधुनिकता और खुलेपन को को अंगीकार किया है उसे ही आगे बढ़ाता चले। 

धर्मनिरपेक्षता के बहाने भारत की बात चली ही है तो एक और महत्वपूर्ण संदर्भ का जिक्र जो भारत और तुर्की को जोड़ता है। ये ख़िलाफत और महात्मा गांधी वाले से भिन्न संदर्भ है। वो नाम है बिस्मिल। जी हां, हमारे महान क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल। क्रांति को सफल बनाने के लिए काकोरी में ट्रेन से अंग्रेज़ों का खजाना लूटने वाले जांबाज़ योध्दा।

तुर्की के अतातुर्क यानी मुस्तफा कमाल पाशा रामप्रसाद बिस्मिल से प्रभावित थे। बिस्मिल भी तुर्की में मुस्तफा के नेतृत्व में चल रही क्रांति से प्रभावित थे और उन्होंने 1922 में 'प्रभा' पत्रिका में 'विजयी कमाल पाशा' नाम से एक लेख भी लिखा था, जब अगस्त 1922 में वहां विजय दिवस मनाया गया था। 
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कमाल पाशा ने अपनी क्रांति की शुरुआत दियारबाकिर प्रांत से की थी। - फोटो : पार्थो कुणार:अमर उजाला

तुर्की के दक्षिण में एक प्रांत है-दियारबाकिर। कमाल पाशा ने अपनी क्रांति की शुरुआत दियारबाकिर प्रांत से की थी। दियारबाकिर का अर्थ है विद्रोहियों का इलाका। 1923 में मुस्तफा के नेतृत्व में तुर्की गणराज्य बन गया। 1927 में बिस्मिल, अशफाक व रोशन सिंह को फांसी के बाद मुस्तफा कमाल पाशा ने अमर सपूतों का अपने संस्मरणों में जिक्र भी किया। इस प्रांत में एक शहर का नाम है बिस्मिल।

इस शहर की आधिकारिक साइट तो इस बात की पुष्टि नहीं करती पर इतिहास के एक शोधार्थी सुधीर विद्यार्थी के मुताबिक मुस्तफा कमाल पाशा ने रामप्रसाद बिस्मिल की याद में ही इस शहर का नाम बिस्मिल रखा। हालांकि बिस्मिल राम प्रसाद जी का तखल्लुस ही था। बिस्मिल के मानि हैं घायल या आहत। 


मरमरा और काले सागर के बीच बास्तुरस के मुहाने पर बसा इस्तांबुल। दुनिया का एकमात्र शहर जो दो महाद्वीपों में पसरा है। इस्तांबुल की ये यात्रा बहुत ही दिलचस्प और यादगार रही। यात्राएं यों भी बहुत दिलचस्प होती हैं। यात्रा करने के लिए हम बाहर जाते हैं पर यात्रा हमें भीतर ले जाती है। बहुत अंदर। गहरे। बहुत दूर तक। बिना प्रयत्न। कोई किताब, लेख, फिल्म या वीडियो यात्रा से मिले प्रत्यक्ष अनुभव की बराबरी नहीं कर सकता। हां, यात्रा के लिए संदर्भ ज़रूरी है और संदर्भ के लिए लेख, किताबें और फिल्म। पर ये सब सहायक हैं। सहयात्री हैं। इनका साथ मिलने से यात्रा का आनंद बढ़ता है। पर ये ना भी हों तो भी यात्रा होनी चाहिए। बिना संदर्भ यात्रा का अपना मज़ा है। यात्रा ख़ुद ही अपने संदर्भ तैयार करती चलती है। 


ये दुनियादारी और मजबूरी ना हो तो कोई झोला उठा कर बस घूमता ही रहे!


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।       

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