ख़य्याम ने मुज़फ़्फ़र अली की फ़िल्म में ग़ज़ल गवाने के लिए आशा को चुना तो वो हैरत में पड़ गए।
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ख़य्याम ने लाहौर में बाबा चिश्ती के साथ काम किया, लेकिन कुछ दिनों के बाद 1943 में लुधियाना आ गए। 18 साल की उम्र में द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान ख़य्याम फौज में भर्ती हो गए। ख़य्याम ने बंदूक तो उठा ली पर उनकी उंगलियां वाद्य यंत्रों पर पड़ने के लिए मचलती थीं।
तीन साल फौज में बिताने के बाद उन्होंने मुंबई जाकर अपने ख़्वाबों सच करने की ठानी। काफी संघर्ष के बाद उन्हें 1948 में फ़िल्म हीर-रांझा में संगीत देने का मौक़ा मिला। ख़य्याम हमेशा से ही संगीत की गुणवत्ता को सबसे ऊपर रखते थे।
बड़े-बड़े गायक उनकी बनाई धुनों को गाने में पसीने छोड़ देते थे। फिल्म शोला और शबनम में महान गायक मोहम्मद रफ़ी ने एक गाने में 21 टेक लिए थे, जबकि मोहम्मद रफ़ी एक बार में ही गाना ख़त्म कर देते थे।
ये गाना था जाने क्या ढूंढती रहती हैं ये आंखें मुझमें....कुछ ऐसा ही एक वाक्या लीजेंड सिंगर आशा भोंसले के साथ भी जुड़ा हुआ है। फ़िल्म 'उमराव जान' से पहले आशा ने कभी भी ग़ज़ल नहीं गाई थी। ख़य्याम ने मुज़फ़्फ़र अली की फ़िल्म में ग़ज़ल गवाने के लिए आशा को चुना तो वो हैरत में पड़ गए।
जब आशा भोंसले ने ख़य्याम की धुनों को सुना तो उन्होंने रिकॉर्डिंग 8 दिनों के लिए टाल दी। वजह साफ़ थी, आशा इसके लिए क़ायदे से अभ्यास करना चाहती थीं। इन धुनों को गाना आसान नहीं था।
'ये क्या जगह है दोस्तों', 'दिल चीज़ क्या है आप मेरी' और 'इन आंखों की मस्ती के' जैसी ग़ज़लें आज भी गवाही देती हैं कि ख़य्याम जैसा संगीतकार सदियों में एक बार आता है और सदियों तक बना रहता है।
जाते-जाते खय्याम अपनी 10 करोड़ की संपत्ति कला को बढ़ावा देने के लिए दान कर गए हैं। लता मंगेशकर ने भी महान संगीतकार के निधन पर अपनी भावनाएं ज़ाहिर कीं और कहा- 'महान संगीतकार और बहुत ही नेक दिल इंसान ख़य्याम साहब आज हमारे बीच नहीं रहे। यह सुनकर मुझे इतना दुख हुआ है जो मैं बयां नहीं कर सकती। ख़य्याम साहब के साथ संगीत के एक युग का अंत हुआ है। मैं उनको विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करती हूं'।
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