एक संदिग्ध मौत कितने चेहरे बेनकाब कर सकती है, कितने रैकेट उजागर कर सकती है, कितनी सियासत और कितनी इंसाफ की बात कर सकती है, यह अभिनेता सुशांत सिंह प्रकरण ने दिखा दिया है। सुशांत मामले में पहले आत्महत्या फिर हत्या इसके आगे चरित्र हत्या, ड्रग्स एंगल जैसे मुद्दों पर खेल जाने वाला इलेक्ट्राॅनिक मीडिया टीआरपी कांड पर खुद ‘हिट विकेट’ होता दिख रहा है।
गुरुवार को मुंबई पुलिस ने जो भांडाफोड़ किया, उसके पीछे राजनीति तो है ही, लेकिन इसने टीआरपी के नाम पर देश में चल रहे गोरखधंधे से भी पर्दा उठा दिया है। अर्थात टीआरपी की आड़ में जो कुछ चल रहा है, वह टीवी दर्शकों को ठगने, इसके लिए कुछ भी करने, और एक निश्चित एजेंडे को चलाने और बेचने की आतंक कथा है। इसमें भी नित नए ट्विस्ट आते जा रहे हैं।
मुंबई पुलिस द्वारा इस ‘हाॅरर स्टोरी’ में रिपब्लिक टीवी का नाम लेने पर पर उस चैनल ने मुंबई पुलिस पर आपराधिक मानहानि का मुकदमा दायर करने की धमकी दे डाली तो मुख्य प्रतिद्वंद्वी ‘आज तक’ सहित कई चैनलों ने रिपब्लिक टीवी पर खुला हमला बोल दिया। पर शुक्रवार को साफ हुआ कि इस मामले में फरियादी ने जो एफआईआर लिखवाई है, उसमें रिपब्लिक टीवी का नाम नदारद है, लेकिन ‘आज तक’ का है। इसके बाद ‘आज तक’ की बोलती बंद होती दिखी।
दूसरी तरफ एनडीटीवी जैसे टीआरपी मामले में अमूमन हाशिए पर रहे चैनलों ने खुद को ‘न्यूज कमिटेड’ चैनल के रूप में प्रचारित करना शुरू कर दिया। अभी तो यह टीआरपी को लेकर जारी छापामार लड़ाई की शुरूआत है, आगे न जाने क्या-क्या गुल खिलेंगे?
इस माहौल में एक गंभीर दर्शक और श्रोता के मन में यह सवाल उठने लगे हैं कि चैनलों के इस टीआरपी युद्ध से उसका क्या लेना-देना है? वह समाचार और वो भी विश्वसनीय तरीके से देखने के लिए पैसा देता है या प्राइम टाइम की मुर्गा लड़ाई देखने के लिए देता है?
बीते दो दशकों में हमारी बोलचाल में जिस शब्द ने जगह बना ली है, वो है टीआरपी। हालांकि ज्यादातर को इस शब्द का फुल फार्म पता नहीं होता, ठीक उसी तरह कि पीडीएफ का मतलब क्या है, इससे अधिकांश लोग बेखबर होते हैं। भले ही वो अखबार नियमित रूप से ऑनलाइन पढ़ते हों।
टीआरपी का पूरा रूप है ‘टेलिविजन रेटिंग प्वाइंट।‘ यह टीवी चैनल मालिकों, विज्ञापन एजेंसियों की अपनी कार्यक्रम लोकप्रियता आकलन की व्यवस्था है। आज देश में करीब 20 करोड़ टीवी सेट्स हैं, जिनके माध्यम से हमें हिंदी सहित विभिन्न भाषाओं के 892 से ज्यादा न्यूज चैनल्स दिखाए जाते हैं।
शुरुआत में न्यूज चैनल और मनोरंजन चैनलों का चरित्र बिल्कुल अलहदा था। मनोरंजन चैनल देखे खूब जाते हों, लेकिन उनका दायरा मनोरंजन तक ही सीमित था। लेकिन जैसे-जैसे निजी चैनलों की संख्या बढ़ती गई, उसी अनुपात में व्यूअरशिप छीनने और टीआरपी बढ़ाने का अनैतिक खेल भी जोर पकड़ने लगा।
आलम यह है कि आजकल टीवी चैनल खबरें कम और तमाशे ज्यादा दिखाते हैं। कुछ मामलों में तो उन्होंने मनोरंजन चैनलों को भी शर्मिंदा कर दिया है। ‘न्यूज’ के नाम पर कई प्रायोजित कथाएं, सच्ची- झूठी अंतर्कथाएं, खबर का धुर एकपक्षीय प्रस्तुतिकरण, बेतरह लोगों की कच्ची-पक्की, और मूर्खतापूर्ण प्रतिक्रियाएं दिखाई जाने लगीं।
‘टैलेंट हंट’ की तर्ज पर बदतमीज और अभद्रता हंट भी शुरू हो गया। सबसे ज्यादा कहर उन प्राइम टाइम बहसों ने ढाना शुरू किया, जिसमें ऐसे-ऐसे लोग छांट-छांटकर बिठाए जाने लगे, जिन्हें बदतमीजी का ‘आइकाॅन’ कहा जा सकता है। इनमें टीवी चैनलो के कथित स्टार एंकर भी शामिल हैं।
प्रायोजित बहसों के जरिए हर उस मूर्खता का महिमा मंडन या खंडन किया जाने लगा, जो कोई भी सभ्य परिवार करना शायद ही पसंद करे। ऊपर से दावा यह कि ‘दर्शक यही चाहते हैं।’ लेकिन असली मजबूरी है टीआरपी। यानी ‘नो टीआरपी, नो सर्वावइल।‘