बिल्लियों पर कई लेखक लिख चुके किताब
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बिल्ली पर लिखने वाले ताकाशी अकेले लेखक नहीं हैं। हमारे अपने हरनोट की ‘बिल्लियां बतियाती हैं’। सत्यदेव त्रिपाठी ने अपनी बिल्ली पर बहुत मार्मिक संस्मरण लिखा है। नोबेल पुरस्कृत लेखिका डोरिस लेसिंग ने ‘ऑन कैट्स’ लिखा है। उनके यहां बिल्लियां हैं, साथ ही जंगली बिलाड़ भी। बाज, उल्लू और ढ़ेर सारे पशु-पक्षी हैं। इसकी सेटिंग अफ्रीका है। जबकि ‘द गेस्ट कैट’ की सेटिंग जापान है। छिबि बहुत सुंदर जीव है, बिल्लियों में रत्न।
बिल्ली स्वभाव में कुत्ते से बहुत भिन्न होती है। वह कुत्ते की तरह पोस नहीं मानती है, बड़ी स्वतंत्र प्रकृति की होती है। छिबि आती है, खाती है और चली जाती है। अगले दिन फिर आती है, उसके अगले दिन फिर। अब वह केवल रसोई में नहीं रहती है। खास समय पर आती है, खाती है और सोफे पर आराम फरमाती है। फिर उठकर चली जाती है। बताना मुश्किल है कि छिबि उनकी है या उनके पड़ोसी की।
छिबि के साथ इस युगल के घर में थोड़ी-सी खुशी भी चली आती है। अचानक उनकी जिंदगी बदलने लगती है। अब वे टेबल पर सिर झुकाए अपने-अपने काम में डूबे नहीं रहते हैं। वे छिबि के लिए खरीदारी करने लगते हैं। साथ-साथ घूमने-बतियाने लगते हैं। छोटी-छोटी बातें साझा करने लगते हैं। साथ पब जाते हैं, बागीचे की खूबसूरती निहारते हैं, बागीचा जो बहुत योजना के साथ लगाया गया है, जहां हर मौसम में अलग फ़ूल खिलते हैं। दोनों टेडपोल्स को मेढ़कों में परिवर्तित होते देखते हैं। हवा में उड़ती हुई ड्रैगनफ़्लाई जोड़ा बनाती है, उसमें उन्हें भग्न हृदय की छवि नजर आती है। वे छिबि के साथ खेलते हैं। जिंदगी खूबसूरत हो उठती है।
छिबि के आने से पति आत्मकथात्मक का आभास देता उपन्यास लिखना शुरू कर देता है। पाठक देखता है कि कथावाचक जो कह रहा है वह वास्तव में उसकी नई किताब है। मगर सब दिन एक समान नहीं होते हैं। परिवर्तन जीवन का अटूट नियम है। कुछ ऐसा होता है कि अचानक परिकथा उदासी और हताशा में डूब जाती है।
कथावाचक के साथ पाठक के मुंह से भी निकलता है, ‘भला उसने ऐसा कैसे किया?’ पाठक का रहस्य से सामना होता है और वह सोचने पर मजबूर हो जाता है। वास्तविक उदासी के विषय में लिखना संभव नहीं है। हां, ताकाशी ने यह असंभव काम संभव किया है। क्या होता है? कैसे होता है? क्यों होता है? यह आप स्वयं पढ़ कर जाने, अनुभव करें।
इस लघु उपन्यास का काल पिछली सदी का आठवां दशक है, जब सब चीजों के बाजार भाव चढ़े हुए हैं। घरों और रीयल इस्टेट के दाम आकाश छू रहे हैं। चारों ओर आर्थिक असुरक्षा मुंह बाए खड़ी है। हां, मध्यकाल, मेकियावेली का संदर्भ भी इस लघु उपन्यास में आया है। बीच-बीच में फिलॉसफी का छौंक लगाता यह उपन्यास अवलोकन क्षमता, हास्य और बुद्धि का अद्भुत संगम है। नाजुक कलात्मक, परिवर्तन पर ध्यान लगाता यह उपन्यास हमें भी संवेदनशील और निरीक्षण में कुशल बनाता है।
जापानी खुशबू से लबरेज यह उपन्यास पढ़ना आपको एक अलग दुनिया में ले जाता है।
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