टारगेट किलिंग के बाद बढ़ी सख्ती
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इसके अलावा जम्मू-कश्मीर के परिसीमन के बाद से लोकतंत्र की खातिर चुनावी सुगबुगाहट शुरू हो चुकी है। हालांकि, परिसीमन का विवाद फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है और गर्मी की छुट्टी के बाद ही इस पर सर्वोच्च अदालत ने गौर करने का मन बनाया है,लेकिन गुपकार गुट से लेकर तमाम राजनीतिक पार्टियां परिसीमन को लेकर सवाल खड़े कर चुकी हैं।
यूं भी जम्मू-कश्मीर में चुनाव से पहले वहां शांति बहाली की बड़ी जिम्मेदारी अब सरकार पर है। चुनाव से भारतीय जनता पार्टी को प्रदेश में भले सत्ता लाभ न मिल पाए लेकिन चुनाव कराकर केंद्र सरकार दुनिया के सामने लोकतंत्र का संदेश तो देना चाहेगी ही।
जम्मू-कश्मीर के बदले हालात का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि जहां 370 हटने के बाद एक साल से ज्यादा दिनों तक इंटरनेट पाबंदी रही, हर जुमे को इंटरनेट की पाबंदी मजबूरी थी, वहां आतंकी मामलों में अलगाववादी यासीन मलिक को सजा के फैसले पर महज कुछ घंटों के लिए ही इंटरनेट सेवाएं रोकी गईं, छिटपुट पत्थरबाजी हुई, फिर अमन-चैन। यह भी जम्मू-कश्मीर के तेजी से बदलते हालात की मिसाल है।
शांति व स्वर्ग की आस
टारगेट किलिंग से उपजे हाल के हालात पर अब केंद्र फिर सख्ती और समीक्षा की स्थिति में है। गृह मंत्री अमित शाह और एनएसए दोभाल के बीच मंत्रणा के बाद शुक्रवार को फिर उच्चस्तरीय बैठक में प्रदेश और केंद्र सरकार मंत्रणा कर माहौल सामान्य करने की दिशा में बड़े और कड़े फैसले ले सकती है। जाहिर है, शांतिपूर्ण अमरनाथ यात्रा व टारगेट किलिंग रोकना पहली प्राथमिकता होगी।
यूं भी कश्मीरी पंडितों, हिंदुओं और गैरकश्मीरियों से लहूलुहान कश्मीर में उबाल चरम पर है। कश्मीरी पंडित व हिंदू पीड़ित परिवार सुरक्षा और शांति चाहते हैं। वे सामूहिक पलायन और तबादले की जिद पर अड़े हैं। दूसरी तरफ, कश्मीर में इस्लामिक आतंक, पाक के नापाक इरादे, आतंकी आर्थिक मदद व हवाला कनेक्शन, अलगाववादियों की गुपचुप सक्रियता लगातार चुनौती पैदा कर रही है।
ऐसे में केंद्र सरकार ने 370 हटाकर जैसे 56 इंच का सीना दिखाया,उतनी ही मजबूत राजनीतिक इच्छा शक्ति से कश्मीर को फिर से स्वर्ग बनाने के लिए बड़ी पहल की जरूरत अब महसूस की जा रही है। केंद्र और राज्य सरकार की ढृढ़ इच्छाशक्ति से ही कश्मीर में आगे हालात और सुधरेंगे। कश्मीर में शांति के साथ-साथ स्वर्ग की आस अभी कायम है।
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