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हिंदुस्तान के लिए क्या सोचते हैं भारतीय मूल के कीवी क्रिकेटर्स?

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कोरोना के चलते क्रिकेट जगत में खबरों का अकाल सा पड़ गया है। न्यूजीलैंड दौरे से वापस लौटने के बावजूद एक कहानी मेरे जेहन में तैरती रही है। और वो ये कि कैसे भारतीय या एशियाई मूल के खिलाड़ी कीवी क्रिकेट का हिस्सा बनते जा रहें हैं। न्यूजीलैंड की टीम में भारतीय मूल के खिलाड़ियों की मौजूदगी भी अपने आप में एक सुखद अनुभव है। मुंबई के एजाज पटेल को वेलिंग्टन टेस्ट में भले ही सिर्फ 6 ओवर की गेंदबाजी का मौका मिला, लेकिन उनका इस मुल्क के लिए खेलना दिखाता है तो यहां पर आपको मौका बराबरी के स्तर पर दिया जाता है।

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पटेल से जब हमारी मुलाकात होती है तो हमने उनसे हिंदी में बात करने की गुजारिश की और वो तुरंत तैयार हो गए। उनकी जुबान में किसी भी तरह से न्यूजीलैंड का असर नहीं था। वो 6 साल की उम्र में मुंबई से अपने परिवार के साथ यहां आ गए थे और क्रिकेट में ऐसे रम गए कि अब उन्हें अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर के तौर पर अलग पहचान मिल रही है।' भारत के खिलाड़ी ही मेरे हीरो रहें हैं। मैं रवींद्र जडेजा से काफी प्रभावित हूं और उनकी गेंदबाजी को काफी गौर से देखता हूं।' पटेल की बातों में ये साफ झलकता है कि उनके घर में अब भी भाषा और संस्कृति के लिहाज से हिंदुस्तान जीवित है। कुछ ऐसा ही हाल साथी खिलाड़ी ईश सोढ़ी का है। सोढ़ी से जब हमने हिंदी में बात करने की कोशिश की तो उन्होंने कहा वो हिंदी समझते पूरा है, लेकिन पंजाबी में ज्यादा सहज महसूस करते हैं।'

मैं जब भी भारत दौरे पर जाता हूं तो मेरी पंजाबी और अच्छी हो जाती है। मेरी शादी पूरी तरीके से पंजाबी शैली में ही हुई थी।' पंजाब के लुधियाना से आए सोढ़ी का परिवार अब पूरी तरह से कीवी हो गया है, लेकिन उनके घर में और दिल में भारत भी बसता है। मैनें जब उनसे ये पूछा कि क्या भारत के मुकाबले न्यूजीलैंड के लिए खेलना आसान है तो वो थोड़े नाराज हो गए। 'आपको लगता है कि किसी भी मुल्क के लिए क्रिकेट खेलना आसान है। चाहे वो भारत हो या न्यूजीलैंड। हां, ये तो किसी से छिपा नहीं है कि भारत में आपका मुकाबला लाखों खिलाड़ियों से होता है, लेकिन यहां पर उतने नहीं हैं, जिसकी वजह जनसंख्या है'।

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दरअसल, न्यूजीलैंड के हर मैदानों के बाहर आपको सोढ़ी के बड़े-बड़े पोस्टर दिखेंगे और वो भी इसलिए ताकि यहां के भारतीय और एशियाई लोगों को क्रिकेट से और जोड़ा जा सके। न्यूजीलैंड क्रिकेट के मीडिया अधिकारी बेन मैकी ने मुझे बताया कि स्कूल और कॉलेज क्रिकेट में एशियाई मूल के खिलाड़ियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। फिलहाल, फर्स्ट क्लास क्रिकेट में मार्क चैपमैन, जीत रावल और भारत पोपली भी सोढ़ी और पटेल के अलावा बेहद लोकप्रिय एशियाई मूल के खिलाड़ी है। इन सबके अलावा आंध्र प्रदेश के तरुण नथुला, रॉनी हीरा (इनका जन्म ऑकलैंड में हुआ था), और आदित्य अशोक जैसे खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में न्यूजीलैंड के लिए खेल चुके हैं। वैसे जब भी भारतीय मूल के खिलाड़ियों की बात आती है हर किसी के जेहन में ऑप स्पिनर दीपक पटेल का नाम ताजा हो जता है। पटेल ने 1992 वर्ल्ड कप में नई गेंद से पारी शुरु करने का क्रांतिकारी कदम उठाया था। आधिकारिक तौर पर कई खिलाड़ियों ने ये बात तो नहीं कही, लेकिन ज्यादातर लोगों का मानना ये ह कि वो दिन दूर नहीं जब इंग्लैंड के पूर्व कप्तान नासिर हुसैन की तरह भविष्य में भारतीय मूल का ही कोई खिलाड़ी इस देश की कप्तानी करता नजर आए। हो सकता है अगली बार टीम इंडिया जब न्यूजीलैंड के दौरे पर जाए तो सिक्के की उछाल के लिए स्थानीय कीवी की बजाए आपको भारतीय या फिर एशियाई मूल का ही खिलाड़ी नजर आए!
 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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