Sri Lanka Economic Crisis
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आगे की क्या होगी योजना?
ऐसे हालात में जब हर सामान की कीमत बढ़ रही हो, महंगाई दर पचास प्रतिशत को पार कर चुकी हो और पूरा देश बिजली, दवाई, ईंधन की कमी से जूझ रहा हो, सबसे बड़ा सवाल यह बनता है कि सरकार के पास आगे की क्या योजना है?
सामानों के आयात के लिए विदेशी मुद्रा अब बचा नहीं है और आगे की व्यवस्था कैसे बहाल होगी, इसका भी जवाब नहीं है।
फिलहाल, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से 3 बिलियन डॉलर की राहत राशि और रूस तथा कतर से कम लागत में पेट्रोल आपूर्ति के लिए बातचीत जारी है। यही नहीं, जरूरत पड़ने पर सरकारी मालिकाना हक वाली श्रीलंकाई एयरलाइंस का निजीकरण भी हो सकता है।
विश्व बैंक ने 600 मिलियन डॉलर और भारत ने 1.9 बिलियन डॉलर उधार देने पर सहमति जताई है। इसके अलाावा, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, ब्रिटेन और अमेरिका की ग्रुप-7 ने कर्ज में राहत देने का वादा किया है।
संवैधानिक संकट का क्या होगा?
मौजूदा समय का सबसे बड़ा सवाल देश के राजनीतिक भविष्य को लेकर है। बगैर इस्तीफा दिए राष्ट्रपति के देश छोड़ने के बाद प्रधानमंत्री अंतरिम राष्ट्रपति के रूप में कार्यभार संभाल रहे हैं। संवैधानिक प्रावधानों के तहत इस नियुक्ति को मंजूरी देने के लिए संसद को एक महीने के अंदर बैठक करना अनिवार्य है, लेकिन प्रदर्शनकारी तुरंत उनके इस्तीफे की मांग कर रहे हैं।
उनके इस्तीफे के बाद स्पीकर महिंदा यप्पा अभयवर्द्धना राष्ट्रपति बन सकते हैं जो गोटाबाया के दल से ही हैं। इसका मतलब साफ है कि विपक्षी दलों का समर्थन उन्हें किसी भी हालत में नहीं मिलेगा।
गौरतलब है कि सजिथ प्रेमदासा के नेतृत्व वाली विपक्षी दल का दावा है कि 113 सांसदों के समर्थन के साथ उन्हें संसद में बहुमत हासिल है। एक संभावना यह भी बनती है कि स्पीकर के बाद सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को राष्ट्रपति बनाया जाए, लेकिन इसके लिए भी संसद को प्रस्ताव पारित करना होगा जो संभव नहीं दिखता।
सजिथ प्रेमदासा की एसजेपी और जेवीपी ने संयुक्त रूप से घोषणा की है कि वे सरकार बना सकते हैं, लेकिन इसके लिए राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को पहले इस्तीफ़ा देना होगा। आर्थिक संकट से जूझ रहे देश के पास चुनाव कराने के लिए पैसे नहीं हैं और ऐसे में यह संकट जल्दी खत्म होता नहीं दिख रहा है।
भारत पर क्या होगा असर?
श्रीलंका में जारी राजनीतिक गतिरोध और आर्थिक संकट की वजह से भारत के समुद्री कारोबार पर असर पड़ सकता है क्योंकि भारत आने वाले 50 फीसदी से ज्यादा जहाज श्रीलंकाई बंदरगाह पर ही आते हैं। यही नहीं, इससे हर साल होने वाले करीब 4 अरब डॉलर के निर्यात और कर्ज वापसी में भी परेशानी हो सकती है।
भारत के लिए श्रीलंका का महत्व कारोबारी नज़रिए से ज्यादा जियो पॉलिटिक्स के नजरिए से है। यही वजह है कि भारत काफी सतर्क है और हर घटनाक्रम पर फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है।
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