इस शोध पत्र में पशुशास्त्र से लेकर युध्द-शास्त्र तक के कई प्राचीन और दुर्लभ ग्रंथों की जानकारियां इसमें मिलती है।
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क्या है इस शोध-पत्र में खास?
आज का दौर शोध का है। ऐसे में यूनिवर्सिटी ऑफ मेसाचुसेट्स की ये रिसर्च एक आशा की किरण है। इस शोध के उपसंहार में स्पष्ट तौर पर लिखा है, कि ऐसे महान ग्रंथ आधुनिक विज्ञान के लिए भी महत्वपूर्ण हैं, लेकिन भाषा कि बाधा से वर्तमान शोधार्थी इनसे पूरी तरह अनभिज्ञ हैं।
इस शोध पत्र में अलग-अलग विषयों के ग्रंथों को सूचीबद्ध किया गया है। पशुशास्त्र से लेकर युध्द-शास्त्र तक के कई प्राचीन और दुर्लभ ग्रंथों की जानकारियां इसमें मिलती है। इस लेख का मकसद है, भारतीय प्राचीन साहित्य में रुचि रखने वाले सभी शोधार्थियों को उस गौरवशाली और समृध्द परंपरा से रुबरू करवाना।
पशु पक्षी शास्त्र या वेटनरी साइंसेस की बात करें, तो इसमें 14 वी शताब्दी में हंसदेव जी द्वारा लिखा गया मृगपक्षिशास्त्रम है। ये भारतीय पशु पक्षियों पर वर्तमान में उपलब्ध साहित्य में सबसे प्राचीन माना गया है। निश्चित तौर पर इसमें भी जो संदर्भ लिए गए हैं, वो प्राचीन वांग्मय से है।
कहने का तात्पर्य ये, कि भारत में इस तरह के शास्त्रों की परंपरा बहुत पुरानी रही है। अन्य पुस्तकों में हाथी और घोड़ों से जुड़ा साहित्य है। इसमें उनके लालन-पालन से उनके उपयोग तक की सारी बातें हैं।
इनमें मुख्य हैः- गजग्रहम प्रकारः (नारायण दीक्षित), अश्वशास्त्रम (नकुल), अश्ववैद्यकम (जयदत्त), हस्त्यायुर्वेद एवं गजशास्त्रम (पालकाप्य), हरिहर चतुरंगम (गोदावर मिश्र द्वारा हाथी और घोड़ों के युध्द में इस्तेमाल पर रचित ग्रंथ) अश्व दर्पण (वन्दी मिश्रा), मातंगलीला (हाथियों के खेल कूद पर नीलकंठ का लिखा ग्रंथ), इनके अलावा प्रकीर्ण पशुशास्त्र भी मिलता है, जिसके लेखक आदि का परिचय उपलब्ध नहीं है।
पशु शास्त्र से शुरूआत सिर्फ ये बताने के लिए भारत में लगभग हर क्षेत्र में ज्ञान विज्ञान के साथ आगे बढ़ा जाता था। इसके बाद बारी आती है, इंजीनियरिंग के क्षेत्र में लिखे गए प्राचीन ग्रंथों की। इनमें स्पेक्टोस्कोपी पर लिखा गया अंशुबोधिनी और एयरोनॉटिक्स पर लिखा गया विमानशास्त्र है, इन दोनों के ही रचयिता महर्षि भारद्वाज थे।
इसके साथ ऋषि भारद्वाज द्वारा रचित रत्नप्रदीपिका भी मिलता है, जो सिरेमिक पर लिखा हुआ विस्तृत ग्रंथ है। राजा भोज भी शिल्प कला और इंजीनियरिंग के बड़े जानकार थे। उन्होंने समरांगण सूत्रधार और युक्तिकल्पतरू जैसे ग्रंथों की रचना की है। इन ग्रंथों के साथ ही सुब्राया शास्त्री का अप्तत्वप्रकाशिका ग्रंथ भी मिलता है, जिसमें इंजीनियरिंग और शिल्प शास्त्र के कई रहस्योद्घाटन किए गए हैं।
पाराशर नामक एक कृषि वैज्ञानिक ने करीब दो हजार वर्ष पहले "कृषि पाराशर' पुस्तक लिखी।
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भारतीय ज्ञान-विज्ञान के महत्व को समझना होगा
भारत कृषि प्रधान देश रहा है। दुनिया को कृषि कर्म सिखाने वाली भी यही पावन धरा है। इसकी पुष्टि हजारों वर्ष पहले लिखे गए कृषि विज्ञान से होती है। "एशियन एग्रो हिस्ट्री फाउंडेशन' ने एक संस्कृत पुस्तक प्रकाशित की, जिसमें हम पाते हैं कि पाराशर नामक एक कृषि वैज्ञानिक ने करीब दो हजार वर्ष पहले "कृषि पाराशर' पुस्तक लिखकर उस समय के किसानों को सही-तरीके और सही समय पर बीज रोपण, सिंचाई इत्यादि प्रक्रिया अपनाकर कैसे अच्छी उपज ली जाए, इसकी जानकारी दी थी।
इस रिसर्च पेपर में इस ग्रंथ के अलावा पाराशर ऋषि द्वारा रचित कृषिकाण्डम का भी उल्लेख मिलता है। इसी संस्थान ने पहले "वृक्षायुर्वेद' नामक एक संस्कृत पुस्तक भी प्रकाशित की थी, इसके लेखक सुरपाल थे। इसमें वृक्षों तथा पेड़-पौधों की बीमारियों का कैसे इलाज किया जाए, इसका विवरण था। इस पुस्तक के बारे में भी यूनिवर्सिटी ऑफ मेसाचुसेट्स के शोध पत्र में जानकारियां मिलती हैं।
कुछ अन्य ग्रंथ इस प्रकार हैं- काश्यपीय कृषिसूक्तिः (काश्यप), विश्ववल्लभः (चक्रपाणी मिश्र), कृषिषशासनम (दशरथ शास्त्री), बृहतसंहितान्तर्गत वृक्षायुर्वेद (आचार्य वराहमिहिर)। इन ग्रंथों के अलावा भारतीय कृषि शास्त्र की महत्वपूर्ण जानकारियां प्रकीर्ण वृक्षायुर्वेद में भी मिलती है, जो पुराण इत्यादि से प्राप्त हुआ है।
भास्कराचार्य ने सिद्धांत शिरोमणि ग्रंथ की रचना की।
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हजारों सालों पहले मेडिकल फूड की संकल्पना भी
लाइफ स्टाइल आज का बड़ा मसला है। भारत के प्राचीन ग्रंथों में पाक कला के अतिरिक्त खाने पीने के तरीकों पर भी प्रकाश डाला गया है। मेडिकल फूड की संकल्पना भी पाराशर ऋषि द्वारा रचित तक्रकल्प में सबसे पहले मिलती है। वहीं महाराजा नल द्वारा लिखी गई पाकदर्पणम खान-पान पर लिखा गया सबसे प्राचीन ग्रंथ माना जाता है।
इस विषय पर कुछ अन्य ग्रंथ और उनके रचयिता इस प्रकार हैः- भोजनकुतूहलम (श्री रघुनाथ), क्षेमकुतूहलम (क्षेम शर्मा), सूपशास्त्रम (सुकेश), मानसोल्लास (सोमेश्वर)। इसी तरह पौराणिक ग्रंथों के आधार पर पाकावली और प्रकीर्ण पाकशास्त्र जैसे ग्रंथ भी इसी विषय पर मिलते हैं।
युध्द संबंधित ग्रंथों में भगवान शिव द्वारा रचित शिव धनुर्वेद दुर्लभ और महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है। इसी तरह महर्षि वशिष्ठ ने वशिष्ठ धनुर्वेद की भी रचना की थी। शोधार्थियों ने इन ग्रंथों के अध्ययन और इनमें मौजूद दुर्लभ जानकारियों के आधार पर इन्हें भी अपने शोध में शामिल किया है। धनुर्विद्या और युध्दकौशल पर आधारित कुछ अन्य ग्रंथ इस प्रकार हैः- नीति प्रकाशिका (वैशम्पायन), कोदण्डमण्डनम एवं धनुर्विद्याविलासम (लेखक अज्ञात), खड्ग परीक्षा (आचार्य शाड्.र्गधर)। प्रकीर्ण धनुर्वेद में कई ग्रंथों से इसी विषय पर लिखे गए साहित्य के अंश मिलते हैं।
ये भारतीय पुरातन साहित्य का अंश मात्र है। ये वो ग्रंथ हैं जो किसी तरह बचे रह गए हैं, लेकिन धीरे-धीरे ये भी खत्म हो रहे हैं। बहुत आवश्यक है, कि इन्हें रिप्रिंट करवाकर लोकप्रिय साहित्य के बीच में रखा जाए।
मैं हर लेख में कहता हूं, कि प्राथमिक शिक्षा से ही भारत के प्राचीन ज्ञान विज्ञान के विषय में छात्रों को पढ़ाए जाने की जरूरत है। इससे उनमें अपने गौरवशाली अतीत को जानने की ललक पैदा होगी।
भारत ज्ञान-विज्ञान की उर्वरा भूमि रही है और यदि हम इस गौरवशाली इतिहास को ईमानदारी से रखेंगे, तो भारत के युवाओं में ऐसी ही वैज्ञानिक खोजों के लिए उत्सुकता बढ़ेगी। इस तरह के शोधकार्य भारतीय संस्थानों द्वारा भी किए जाने की उम्मीद है।
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