पंडित भजन सोपोरी जी का निधन बहुत दुखद है। उनकी तबीयत काफी समय से खराब चल रही थी, लेकिन बीच-बीच में यह भी पता चलता था कि अब उनका स्वास्थ्य सुधर रहा है। उनके बेटे अभय से बात होती रहती थी। हालचाल मिलता रहता था कि घर आ गए हैं, ठीक हो रहे हैं, लेकिन ऐसी बीमारियों में कुछ कहा नहीं जा पाता है।
संतूर के लिए तो यह बहुत ही बुरा समय है। कुछ ही समय पहले पंडित शिवकुमार शर्मा जी का निधन हुआ और अब पंडित भजन सोपोरी नहीं रहे। ये संतूर के दो शिखर थे। थोड़े दिनों के भीतर ही दोनों दिग्गज कलाकारों का निधन हो गया। और संतूर ही क्या कहें, संगीत जगत को ही जैसे कोई नजर लग गई है। थोड़े समय के भीतर ही देखिए कितने कलाकार हमसे दूर हो गए हैं। जसराज जी, बिरजू महाराज जी, देबू चौधरी, राजन भैया, शुभंकर बनर्जी, प्रतीक चौधरी-कितने सारे कलाकारों का इधर निधन हो गया। फिल्मों के पार्श्वगायक केके का निधन हो गया, लता जी हमसे बिछड़ गईं। न जाने कितने कलाकार हमसे बिछड़ते चले गए। मन दुख से भर गया है।
भजन जी बड़े ही अच्छे कलाकार होने के साथ ही एक बहुत अच्छे इंसान भी थे। 40-42 साल पहले मुझे कश्मीर में उनके घर जाने का भी मौका मिला था। वे आकाशवाणी में थे। हमें साथ लेकर कई जगह घुमाने भी गए। मुझे याद है कि वे तब किसी फिल्मी हीरो की तरह रहते थे, लंबा कोट पहनते थे, सिगार पीते थे। बाद में वे बहुत पूजा-पाठ करने लगे थे। संतूर में पंडित शिवकुमार शर्मा बहुत बड़े कलाकार हुए, लेकिन पंडित भजन सोपोरी ने भी अपनी अलग पहचान और जगह बनाई। साज तो कश्मीर का ही था, लेकिन दोनों के बजाने का अंदाज अलग था।
(आलोक पराड़कर से बातचीत पर आधारित)
एकल वाद्य के रूप में संतूर को पहचान दिलाई
पंडित शिवकुमार शर्मा के बाद पंडित भजन सोपोरी के निधन से संगीत जगत को कभी न भरने वाली क्षति हुई। सिर्फ 10 वर्ष की उम्र में पहली जन प्रस्तुति देने वाले सोपोरी ने संतूर वादन की शिक्षा पहले अपने दादा पंडित संसार चंद सोपोरी और उसके बाद पिता पंडित शंभुनाथ सोपोरी से हासिल की थी।
सोपोरी उत्तरी कश्मीर के सोपोर के मूल निवासी थे और सूफियाना घराने से आते थे। संतूर को एकल संगीत वाद्य के रूप में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर स्थापित करने का श्रेय पंडित भजन सोपोरी को दिया जाता है। सोपोरी ने नाम भले ही संतूर वादन में कमाया लेकिन उनके पास संतूर के साथ सितार बजाने में भी स्नातकोत्तर की दो डिग्रियां थी।