यह बहुत दुखद है कि आज उनका अवसान हुआ है और उनके जाने से एक बड़ी रिक्ति आई है।
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यह भी बहुत महत्वपूर्ण बात है कि जो बड़े कलाकार या गायक होते हैं, वह हर तरह से निष्णात होते हैं। शिवकुमार शर्मा ने अपने संगीत का आधार संतूर को बनाया लेकिन अपने पिता से तबला भी सीखा था और क्या कामयाब तबला बजाते थे। सिर्फ एक उदाहरण ही काफी होगा कि गाइड फिल्म के लिए उन्होंने एसडी बर्मन के संगीत निर्देशन में लता जी का प्रसिद्ध गाना 'मोसे छल किए जाए, हाय रे हाय देखो शैया बेमान' में तबला बजाया था और संगत की थी बराबर।
और यह भी देखने की बात है कि जिस समय वह संगत कर रहे हैं, वह उसमें परफेक्ट ढंग से उभरते हैं और आप कह नहीं सकते है कि वह शांता प्रसाद गुदई महाराज या किसी बड़े उस्ताद अल्लाह रख्खा की तरह तबला नहीं बजा रहे हैं। जबकि फिल्म का गाना है, क्लासिकल बेस गाना है।
जब संगीतकार जोड़ी के रूप में वह फिल्मों में संगीत देते हैं तो हमें समझना चाहिए कि जो एक फिल्म म्यूजिक का पैटर्न होता है कि राजदारी से अलग राग की छायाओं पर मिश्र रागों के समेकित प्रभावों से बनता है, उसकी उनको बखूबी जानकारी थी। कितना संक्षिप्त करना है, कितना उसको काटना है, कितना उसमें विस्तार लेना है, उसमें आलाप, गमक और मेड का काम किस तरह दिखाना है, ताकि वह रोचक भी लगे और शास्त्रीयता भी बरकरार रहे व लोक का रास्ता भी आसानी से संयमित होता जाए। उन सब में उनको महारत हासिल थी।
यह बहुत दुखद है कि आज उनका अवसान हुआ है और उनके जाने से एक बड़ी रिक्ति आई है। कम से कम पहली पंक्ति के उन बड़े संगीतकारों में, जिनको सिर्फ संगीत नहीं पता था, वह शास्त्र भी समझते थे। उन्होंने भरपूर रियाज किया था। अपनी गुरु परंपरा को जानते थे और सबको साधते हुए एक कोई नवाचार करते थे। यह भी कहना चाहिए कि जब तमाम सारे फ्यूजन हो रहे हैं, जब दो तरह की विधाओं को जोड़ दिया जाता है, ऐसे में शिवकुमार शर्मा अपनी परंपरा की शुद्धता को बरकरार रखते हुए अपने वादन कला को साधे हुए थे।
सबसे बड़ी बात है कि जिस तरह से पंडित बिस्मिल्लाह खां को हम शहनाई के लिए याद करते हैं, पंडित रवि शंकर को हम सितार के लिए याद करते हैं, स्वामी पागलदास को हम पखावज के लिए याद करते हैं, ठीक उसी तरह से जब संतूर का नाम याद आता है तो पंडित शिव कुमार शर्मा जी का नाम उभरकर सामने आता है।
दरअसल, वह दोनों एक दूसरे के पर्याय हैं। नवजागरण काल के बाद जो भारतीय संस्कृति संगीत के द्वारा बनी है, उसमें जो नवाचार है, जो विकास है के लिए जो बड़े लोग शामिल हैं, उसमें शिवकुमार शर्मा का अग्रणी योगदान है। आज वह नहीं हैं लेकिन उनका संगीत मौजूद है। हमें उसी थाती को संवारना है सहेजना है। संतूर के विद्यार्थियों के लिए यह सबक है कि उन्हें किस तरह से पाठ्य पुस्तक की तरह पढ़ा जाए। वह सारे कलाकार केवल अभ्यास ही नहीं करते थे, वे विचारक थे, बौद्धिक थे और हर तरह के काम को सीखते हुए अपने ढंग से रास्ता बनाते थे।
मेरी विनम्र श्रद्धांजलि पंडित शिवकुमार शर्मा।
यतीन्द्र मिश्र कवि, लेखक और कला मर्मज्ञ हैं. संगीत पर विशेष कार्य व कई पुस्तकों का लेखन. लता: सुर-गाथा' के लिए साल 2019 में उन्हें 64वां राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ है. इसके अतिरिक्त श्री यतीन्द्र मिश्र कविता के लिए भारत भूषण अग्रवाल सम्मान व, उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार सहित कई अन्य प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित हैं. इस लेख का आधार उनसे हुई एक लंबी बातचीत है.
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