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यादों में पंडित शिवकुमार शर्मा: वे संगीत ही नहीं, शास्त्र भी समझते थे, उन्हें पाठ्य पुस्तक की तरह पढ़ा जाना चाहिए

सार

जिस तरह से पंडित बिस्मिल्लाह खां को हम शहनाई के लिए याद करते हैं, पंडित रवि शंकर को हम सितार के लिए याद करते हैं, ठीक उसी तरह से जब संतूर का नाम याद आता है तो पंडित शिव कुमार शर्मा जी का नाम उभर कर सामने आता है। पंडित शिवकुमार शर्मा को याद कर रहे हैं लेखक और कला मर्मज्ञ यतीन्द्र मिश्र.  

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कश्मीर से आने वाले पंडित शिव कुमार की शिक्षा-दीक्षा बनारस घराने में हुई। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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पंडित शिवकुमार शर्मा का सबसे बड़ा योगदान ये है कि उन्होंने लोकवाद्य संतूर को, जो कश्मीर की वादियों से निकलकर आता है, उसे शास्त्रीय क्षितिज पर मान्यता दिलाई और उसमें न केवल रागदारी भरी, बल्कि अपने अध्ययन, चिंतन और अभ्यास से अलाप, जोड़-झाला और गत का काम करीने से संपादित किया।

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आप उनके वाद्यकारी में, उनकी लयकारी में एक बात खास ढंग से लक्ष्य कर सकते हैं कि किसी भी राग की दर्शना कराने में वह पूरी तरह से सक्षम थे और सबसे विचित्र संयोग यह है कि कश्मीर से आने वाले पंडित शिव कुमार की शिक्षा-दीक्षा बनारस घराने में हुई। उनके पिता पंडित उमादत्त शर्मा बहुत बड़े संगीतज्ञ थे। तबला और रबाब के निपुण वादक थे और अपने जमाने के काशी के बड़े संगीताचार्य बड़े रामदास जी के शिष्य थे।

बड़े रामदास जी की परंपरा में जो संगीत निकलकर आया, वह उमादत्त जी ने सीखा और उसे अपने बेटे तक हस्तांतरित किया। तो अगर बनारस के घराने के चारों पट की गायकी देखें, जहां ध्रुपद धमार की बात होती है, जहां ख्याल-टप-ख्याल की बात होती है, जहां अर्धशास्त्रीय विधाएं टप्पा, ठुमरी, दादरा, कजरी की बात होती है। उन सब का एक फ्लेवर अंत:सलील होकर के बहता है और यह बहुत यूनिक बात है, बहुत अनूठी बात है कि उनके तंत्रकारी में यह सारी बात परिलक्षित होती है। इसकी सबसे खूबसूरत अभिव्यक्ति के लिए उनका फिल्मों के लिए काम देखना चाहिए।

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रुपहले पर्दे पर गूंजते सितार और बांसुरी 

फिल्मों में जिस तरह से वह पंडित हरिप्रसाद चौरसिया के साथ मिलकर शिव-हरि के साथ जोड़ी बनाते हैं, तो तमाम सारे गानों में उनका वह काम बहुत अच्छे से परिलक्षित होता है और फोक ट्यून के साथ जो वादियों का मामला है, उसमें जो संतूर निकलकर आता है और उसके साथ सामंजस्य बिठाती हरिप्रसाद चौरसिया की जो बांसुरी बजती है, वह बहुत महत्वपूर्ण है।

खास करके संगीत पर अगर हम ध्यान दें तो लम्हें फिल्म के गाने, जिसमें 'मोरनी बागा में', 'मोहे छेड़ो न नंद के लाला' में ठुमरी और दादरा के बीच की जो रस्साकशी हो रही है, उसको बहुत खूबसूरत ढंग से अंजाम देते हैं।

दरअसल, यह कहा जाता है कि शास्त्रीय तंत्र वादक अक्सर बहुत अतिविलंबित का संधान करते हैं और अतिविलंबित को इस लेवल पर लेकर जाते हैं, जहां से लोकप्रियता की राह छूट जाती है। लेकिन पंडित शिवकुमार शर्मा का एक बहुत डिजाइंड लय के पैटर्न पर बहुत सुंदर ढंग से बुना हुआ अलंकृत जामितीय के साथ उनका वादन था, जो उनके काम को बहुत बड़ा बनाता था। आप पांच मिनट में संतूर के उस पूरे ग्रोथ को स्वरमान या पिच को तीनों सप्तकों में मध्य और तार में टहलता हुआ देख सकते थे।

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यह बहुत दुखद है कि आज उनका अवसान हुआ है और उनके जाने से एक बड़ी रिक्ति आई है। - फोटो : सोशल मीडिया
यह भी बहुत महत्वपूर्ण बात है कि जो बड़े कलाकार या गायक होते हैं, वह हर तरह से निष्णात होते हैं। शिवकुमार शर्मा ने अपने संगीत का आधार संतूर को बनाया लेकिन अपने पिता से तबला भी सीखा था और क्या कामयाब तबला बजाते थे। सिर्फ एक उदाहरण ही काफी होगा कि गाइड फिल्म के लिए उन्होंने एसडी बर्मन के संगीत निर्देशन में लता जी का प्रसिद्ध गाना 'मोसे छल किए जाए, हाय रे हाय देखो शैया बेमान' में तबला बजाया था और संगत की थी बराबर।

और यह भी देखने की बात है कि जिस समय वह संगत कर रहे हैं, वह उसमें परफेक्ट ढंग से उभरते हैं और आप कह नहीं सकते है कि वह शांता प्रसाद गुदई महाराज या किसी बड़े उस्ताद अल्लाह रख्खा की तरह तबला नहीं बजा रहे हैं। जबकि फिल्म का गाना है, क्लासिकल बेस गाना है।
 
जब संगीतकार जोड़ी के रूप में वह फिल्मों में संगीत देते हैं तो हमें समझना चाहिए कि जो एक फिल्म म्यूजिक का पैटर्न होता है कि राजदारी से अलग राग की छायाओं पर मिश्र रागों के समेकित प्रभावों से बनता है, उसकी उनको बखूबी जानकारी थी। कितना संक्षिप्त करना है, कितना उसको काटना है, कितना उसमें विस्तार लेना है, उसमें आलाप, गमक और मेड का काम किस तरह दिखाना है, ताकि वह रोचक भी लगे और शास्त्रीयता भी बरकरार रहे व लोक का रास्ता भी आसानी से संयमित होता जाए। उन सब में उनको महारत हासिल थी।  

यह बहुत दुखद है कि आज उनका अवसान हुआ है और उनके जाने से एक बड़ी रिक्ति आई है। कम से कम पहली पंक्ति के उन बड़े संगीतकारों में, जिनको सिर्फ संगीत नहीं पता था, वह शास्त्र भी समझते थे। उन्होंने भरपूर रियाज किया था। अपनी गुरु परंपरा को जानते थे और सबको साधते हुए एक कोई नवाचार करते थे। यह भी कहना चाहिए कि जब तमाम सारे फ्यूजन हो रहे हैं, जब दो तरह की विधाओं को जोड़ दिया जाता है, ऐसे में शिवकुमार शर्मा अपनी परंपरा की शुद्धता को बरकरार रखते हुए अपने वादन कला को साधे हुए थे।

सबसे बड़ी बात है कि जिस तरह से पंडित बिस्मिल्लाह खां को हम शहनाई के लिए याद करते हैं, पंडित रवि शंकर को हम सितार के लिए याद करते हैं, स्वामी पागलदास को हम पखावज के लिए याद करते हैं, ठीक उसी तरह से जब संतूर का नाम याद आता है तो पंडित शिव कुमार शर्मा जी का नाम उभरकर सामने आता है।

दरअसल, वह दोनों एक दूसरे के पर्याय हैं। नवजागरण काल के बाद जो भारतीय संस्कृति संगीत के द्वारा बनी है, उसमें जो नवाचार है, जो विकास है के लिए जो बड़े लोग शामिल हैं, उसमें शिवकुमार शर्मा का अग्रणी योगदान है। आज वह नहीं हैं लेकिन उनका संगीत मौजूद है। हमें उसी थाती को संवारना है सहेजना है। संतूर के विद्यार्थियों के लिए यह सबक है कि उन्हें किस तरह से पाठ्य पुस्तक की तरह पढ़ा जाए। वह सारे कलाकार केवल अभ्यास ही नहीं करते थे, वे विचारक थे, बौद्धिक थे और हर तरह के काम को सीखते हुए अपने ढंग से रास्ता बनाते थे।

मेरी विनम्र श्रद्धांजलि पंडित शिवकुमार शर्मा।

यतीन्द्र मिश्र कवि, लेखक और कला मर्मज्ञ हैं. संगीत पर विशेष कार्य व कई पुस्तकों का लेखन. लता: सुर-गाथा' के लिए साल 2019 में उन्हें 64वां राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ है. इसके अतिरिक्त श्री यतीन्द्र मिश्र कविता के लिए भारत भूषण अग्रवाल सम्मान व, उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार सहित कई अन्य प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित हैं. इस लेख का आधार उनसे हुई एक लंबी बातचीत है.

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 
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