बतौर संगीतकार भी शिव जी ने अपने अनन्य सखा पं. हरिप्रसाद चौरसिया के साथ शिव-हरि के नाम से संगीकार जोड़ी भी बनाई
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नौशाद, सचिन देव बर्मन, वसंत देसाई, ओ.पी.नैयर की फिल्मों में तो शिवजी के संतूर की जो छटा बिखरी है उसके तो कहने ही क्या। फिल्म मेरे मेहबूब के शीर्षक गीत मेरे मेहबूब तुझे मेरी मुहब्बत की कसम में तो बस संतूर ही संतूर है।
भव्य आर्केस्ट्रा से अपने संगीत को सजाने वाले नौशाद साहब की इस नज्म में शकील बदायूंनी की शायरी, मोहम्मद रफी के स्वर के बाद सिर्फ और सिर्फ शिव जी के संतूर का पारस स्पर्श मौजूद था।
शिव और हरि की अविस्मरणीय जोड़ी
बतौर संगीतकार भी शिव जी ने अपने अनन्य सखा पं. हरिप्रसाद चौरसिया के साथ शिव-हरि के नाम से संगीकार जोड़ी भी बनाई और कुछ बेजोड़ नग़मे संगीतरसिकों के लिए रचे। इसमें सिलसिला उनकी कालजयी फिल्म कही जा सकेगी। इसमें कोई शक नहीं कि फिल्म संगीत का रंग और ढंग जिस तरह से बदला उसमें शिव-हरि जैसे मेलोड़ी के साधकों के लिए जगह नहीं बन सकती थी सो उन्होंने हमेशा शास्त्रीय संगीत के मंचों को ही अपनी प्राथमिकता में शामिल रखा।
सत्तर के दशक में आया कॉल ऑफ द वैली नाम का कैसेट म्युजिक इण्डस्ट्री का सबसे बड़ा सैंसेशन बना था। ब्रजभूषण काबरा का गिटार और पं. हरिप्रसाद चौरसिया की बांसुरी तो उसमें थी ही लेकिन पं. शिवकुमार शर्मा के संतूर की टंकार तो एक दैवीय आलोक रच देती थी।
उस कैसेट के फ्लैप पर बनी कश्मीर घाटी की तस्वीर शिवजी के संतूर के जरिए एक करिश्माई ठंडक श्रोताओं की आत्मा में उतार गई थी। इस एलबम ने बिक्री के सारे कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए थे। पं. शर्मा के महान कलावंत होने के साथ यह भी समझने योग्य तथ्य है कि उनके संतूर टोनल क्वालिटी में ऐसा कुछ विलक्षण जरूर था जो दीगर संतूर वादकों से सुनाई नहीं देता। इसमें पण्डितजी की लगन अपने साज़ पर सुदीर्घ रिसर्च को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता।
एकाधिक शो एंकर करते हुए पं.शिवकुमार शर्मा को ग्रीन रूम में नजदीक से देखने और समझने के कई मौके मुझे मिले। कार्यक्रम के पहले मैंने हमेशा उन्हें धीर-गंभीर और शांत तबियत का पाया। सौ तार वाले बाजे को मिलाना असीम धीरज और एकाग्रता मांगता है। इस काम को करते हुए उन्हें देखना किसी ऋषि को ध्यानस्थ होकर मंत्रोच्चारण करते देखना होता था।
बहुत मितभाषी और सॉफ़्ट बोलने वाले शिवजी बाद बाद में आध्यात्मित विभूति नजर आते थे। यह अलग बात है कि 84 की पकी उम्र में वे विदा होकर एक अपूरणीय शून्य छोड़ गए हैं किंतु वे अपनी अंतिम महफिल तक निर्विवाद रूप से युवा और आकर्षक ही दिखते रहे. सूरत और सीरत दोनों के लिहाज से शास्त्रीय संगीत के आयोजनों में सुने, सराहे और पसंद किए जाने वाले शिखर कलाकार थे।
पं. शिवकुमार शर्मा का अवसान भारतीय संगीत की ऐसी क्षति है जिसकी भरपाई कोई बंदिश, राग और सरगम या श्रुति नहीं कर सकती। शिव जी का जाना हमारे पूरे समय का कुछ और बेसुरा हो जाना है।
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