अंडमान निकोबार द्वीपसमूह देश का वो हिस्सा है जहां दिल्ली से पहले राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया था।
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अंडमान निकोबार द्वीपसमूह देश का वो हिस्सा है जहां दिल्ली से पहले राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया था। तब सुभाष बाबू के नेतृत्व वाली गठित सरकार यहाँ भी प्रभावी थी। आजाद हिंदुस्तान के पहले अंतरिम सरकार का गठन 21 अक्टूबर 1943 को सिंगापुर में तिरंगा फहराने के साथ घोषणा की गई थी। इस हुकूमत को दुनिया के दर्जन भर के करीब देशों ने मान्यता दी थी। इनमें तत्कालीन वैश्विक शक्ति जर्मनी जापान इटली से लेकर आस पड़ोस के थाईलैंड फिलीपींस और कोरिया भी थे।
द्वितीय विश्वयुद्ध में भारत सहायक शक्तियों की पराजय हुई। वहीं अंडमान निकोबार द्वीपसमूह से लेकर नागालैंड के कोहिमा मोर्चे तक आजाद हिंद फौज आजाद हिंद फौज को पीछे हटना पड़ा। इस बीच सुभाष बाबू का लापता होना और अंग्रेजों का इन स्थानों पर पुनः नियंत्रण एक नई स्थिति ले कर आया। आजाद हिंद फौज के सेनानीयों को कैद कर दिल्ली लाया गया।
इसमें आइएनए के तीन प्रमुख कमांडर कर्नल सहगल, ढिल्लन और जनरल शाहनवाज सहित हजारों सैनिक थे।यही लाल किले के ऐतिहासिक परिसर में इनके ऊपर देशद्रोह का अभियोग लगाया गया।वही इस सुनवाई और कैद के दौरान इनके साथ अमानवीय व्यवहार किये गए। वर्तमान की मोदी सरकार अब इसी परिसर में आजाद हिंद सरकार शहीदों स्मारक और स्तंभ का निर्माण करा रही है। बात अगर ऐसे प्रयासों के शुरुआत की करे तो निश्चित ही यह प्रधानमंत्री मोदी के स्टेच्यू ऑफ यूनिटी के साकार होने से शुरु हुआ है।
आधुनिक भारत के एकीकरण पुरोधा सरकार पटेल को ये एक सच्ची श्रद्धांजलि थी। अब जब स्वाधीनता संग्राम सेनानियों को समर्पित संग्रहालय देश भर में बन रहे है, जिसकी शुरुआत पिछले वर्ष मणिपुर में रानी गाइदिन्ल्यू के जन्मस्थान पर बनने वाले रानी गाइदिन्ल्यू आदिवासी संग्रहालय से हो चुकी है।
26 जनवरी रानी गाइदिन्ल्यू का जन्म दिवस भी है। वे नागा जनजाति की आध्यात्मिक नेतृत्वकर्ता और प्रखर स्वतंत्रता सेनानी रही है।ऐसे में वर्तमान सरकार कुछ विशेष घोषणा करे तो कोई आश्चर्य नही होगा। वैसे भी रानी गाइदिन्ल्यू नागालैंड, बर्मा से लेकर मणिपुर के पहाड़ों तक भारत भक्ति का बयार बहाने को पर्याप्त है। वही इन सब के बीच सर्वाधिक आवश्यक है की देश को वास्तविक नायक और उनके योगदान से अवगत कराया जाए।
अब दस्तावेजों में दबे छुपे वास्तविकताओ को सामने लाने की आवश्यकता है। तभी देश का वास्तविक इतिहास मूर्त रूप ले पायेगा। अब जब नेताजी सुभाषचंद्र बोस से संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक हुई है तो उनके अदम्य साहस और सोच की कई कहानी हमारे सामने है। नेताजी सुभाष बोस की एक ऐसी ही कथा का जिक्र प्रख्यात साहित्यकार और प्रखर स्वतंत्रता सेनानी रामवृक्ष बेनीपुरी करते है।
वे अपनी चर्चित रचना मुझे याद है में करते है। बेनीपुरी कहते हैं कि-
त्रिपुरी कांग्रेस के बाद परिस्थितियां बिलकुल बदल गई थी, जिस कांग्रेस को एक नया कलेवर तेवर सुभाष बाबू ने दिया था वही अब उनके लिए नफ़रत चरम पर थी।ऐसे में नेताजी जब पटना आये तो उनकी सभाओं को रोका गया। उनके विरुद्ध घृणित क्षेत्रवादी और भाषावाद के आरोप जड़े गए। कांग्रेस कार्यालय सदाकत आश्रम में तो उनपे चप्पल तक उछाले गए।
इसका जिक्र तत्कालीन पटना कांग्रेस अध्यक्ष बेनीपुरी मर्माहत मन से करते है। इसका जिक्र वो अपने क्रांतिकारी समाचार पत्र जनता में भी करते है। इस घटना से मर्माहत बेनीपुरी और दंडी सन्यासी सहजानंद ने सुभाष बाबू की करीब अस्सी सभाएं बिहार भर में कराई थी, जिसकी खबरें बिहार के तत्कालीन समाचारपत्रों की सुर्खियाँ बनी थी।तब जहानाबाद जैसे छोटे केंद्र से प्रकाशित बागी जैसे पत्रों ने भी इसको छापा था।
वहीं नेताजी और दंडी सन्यासी सहजानंद ने मिलकर मिलिशिया के गठन की योजना बनाई थी।किसान मजदूर और युवाओं के बाहुल्यता वाला यह सैन्य दस्ता युद्ध छिड़ते ही जगह जगह विद्रोह कर देता। ऐसे में धुरी राष्ट्र से युद्धरत हुकूमते ब्रितानिया पर सुभाष बाबू दो तरफ से हमला करते। युद्ध के मोर्चे पर आजाद हिंद फौज तो भारत के गाँव कस्बों में उनकी मिलिशिया इनके पांव उखाड़ती।
इसका जिक्र उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर लेखक राघव शरण शर्मा करते है। इन्होंने अपनी पुस्तक इंडियाज़ वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस थ्रू किसान डाक्यूमेंट्स मे किया है। उन्होंने इसके तीन खंडों में इससे संबंधित कई दृष्टांतों को सविस्तार रखा है। अब जब नेताजी से संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक हुए हैं तो देश को ऐसे हर हकीकत से रूबरू होना चाहिए।
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