मोहम्मद रफी और उनके कालजयी गीत
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यूं बॉलीवुड में देशभक्तिपूर्ण गीतों का सिलसिला 1971 के बाद भी चला है, लेकिन अभिव्यक्ति और सृजनात्मकता के स्तर पर उनमें वो पीड़ा, वो संघर्ष का जज्बा और मर मिटने का पहले जैसा भाव नजर नहीं आता। मसलन रफी साहब की आवाज में ही ‘मेरे देश में पवन चली पुरवाई फिल्म ‘जिगरी दोस्त।‘(1969) ताकत वतन की हमसे है’ फिल्म ‘प्रेम पुजारी (1970)। वर्दी है भगवान, फौजी मेरा नाम’, फिल्म फौजी (1976) और ‘चना जोर गरम’ फिल्म क्रांति (1981)। 1980 में रफी साहब का निधन हो गया था।
मोहम्मद रफी के कला अवदान का आकाश बहुत विराट है। वो नव रसों को पूरी शिद्दत से अपने सुरों में अभिव्यक्त करने वाले महान गायक थे। फिर चाहे वो प्रेम गीत हो, भजन हों, नात हो कव्वाली हो, शांत रस और रौद्र रस से भरे गीत हों या हास्य रस से भरे गीत हों। शुद्ध शास्त्रीय गीत हो या पश्चिमी धुनों पर आधारित गीत हों, लोक संगीत से सजे गीत हो या फिर सितारों की ऊंचाई से स्पर्द्धा करते गीत हों, मोहम्मद रफी का कहीं कोई मुकाबला नहीं है।
महान गायक के साथ महान इंसान भी थे रफी साहब
न सिर्फ महान गायक बल्कि एक महान इंसान के रूप में भी लोग मोहम्मद रफी को शिद्दत से याद करते हैं। अपनी कला की बदौलत मिली शोहरत, इज्जत और पैसे को वो केवल ईश्वर की कृपा मानते थे। घमंड उन्हें छू भी नहीं गया था। गायकों को रॉयल्टी देने को लेकर लताजी से जो मतभेद उनके हुए थे, वो सैद्धांतिक थे।
देश प्रेम रफी के लिए सबसे ऊपर रहा। कम ही लोग जानते हैं कि उनकी दो शादियां हुई थीं। उनकी पहली पत्नी का नाम बशीरा बानो था। लेकिन 1947 में देश के बंटवारे के बाद बशीरा ने भारत आने से इंकार कर दिया और रफी साहब ने नवोदित पाकिस्तान जाने से इंकार कर दिया। जबकि उस दौर में कई नामी मुस्लिम कलाकार बेहतर भविष्य की आस में पाकिस्तान चले गए थे। उनमें से ज्यादातर गुमनामी में खो गए। यह भारत का ही सौभाग्य था कि रफी के रूप में राष्ट्रप्रेम के सप्तस्वर इसी देश में रहे और फले फूले। रफी साहब की दूसरी शादी बिल्किस बानो से हुई।
लेकिन रफी साहब ने अपने बच्चों को संगीत के क्षेत्र में आगे नहीं बढ़ाया। इस बारे में रोचक किस्सा है कि रफी साहब के दो बेटों में गायन की प्रतिभा थी। जिनके साथ बैठकर रफी कई बार रियाज किया करते थे। जब एक पत्रकार ने उनसे पूछा कि फिल्म इंडस्ट्री में जब सभी अपने बेटों-बेटियों को प्रमोट करते हैं तो आपने भी यह काम क्यों नहीं किया?
क्योंकि बड़े होने पर उनकी तुलना में मेरे से होती और वो इसमें असफल रहते तो फ्रस्ट्रेशन का शिकार होते- रफी साहब का जवाब था।
यह अफसोस की बात है कि देशभक्ति गीतों के लिए भी हम आज भी अपने अतीत पर ही निर्भर हैं। हाल के वर्षों में जो भी देशभक्ति गीत बने हैं, वो भी ‘मेड इंड इंडिया’ या फिर ‘आई लव माई इंडिया’ टाइप के हैं। विडंबना ये कि फिल्मी गीतों का यह इंडिया, अब राजनीतिक नारे में तब्दील हो चुका है। जिसकी मोहम्मद रफी जैसे कलाकार को कभी जरूरत नहीं पड़ी।
रफी साहब का हिंदी फिल्मी गीतों का सफर 1945 में गाए पहले गीत ‘ऐ दिल हो काबू में’ (फिल्म ‘गांव की गोरी’) से हुआ। उसके बाद उन्होंने मुड़कर नहीं देखा। आरंभ में रफी स्वयं उस जमाने के महान गायक अभिनेता के.एल.सहगल को अपना आदर्श मानते थे। लेकिन जल्द ही रफी की अपनी गायकी खिली और सिने संगीत में गायकी का रफी स्कूल ही बन गया, जिसे आज भी कई लोग फॉलो करते हैं।
देशभक्ति गीतों से हटकर रफी द्वारा 1961 में ( फिल्म ‘ससुराल’) गाया गया ‘बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है’ तो ऐसा अमर विवाह गीत है, जिसके बिना उत्तर भारत पश्चिमी में कोई शादी पूरी नहीं होती।
गायक मोहम्मद रफी की याद में देश में कई संग्रहालय बने हैं। देश के कानून राज्य मंत्री अर्जुनराम मेघवाल ने पिछले साल पंजाब में अमृतसर के पास मोहम्मद रफी के पैतृक गांव कोटला सुल्तान सिंह में रफी साहब के याद में संग्रहालय स्थापित करने की घोषणा की थी। निजी तौर पर ऐसा संग्रहालय रफी साहब के सबसे छोटे बेटे शाहिद रफी ने अपने निवास मुंबई में स्थापित किया है। इसका नाम मोहम्मद रफी अकादमी है।
‘मोहम्मद रफी वायस ऑफ नेशन’
शाहिद ने अपने मरहूम पिता मोहम्मद रफी पर एक किताब ‘मोहम्मद रफी वायस ऑफ नेशन’ भी लिखी है। शाहिद रफी के पुत्र फुजैल रफी ने अपने दादा की याद में अनूठा ‘वर्चुअल 3 डी रूमऐ के रूप में स्थापित किया है। उनकी याद में एक संग्रहालय केरल के कोझिकोड में मोहम्मद रफी फाउंडेशन स्थापित किया है। निजी तौर पर दिल्ली में अरुण गौतम और भोपाल में रफी की आवाज के दीवाने मंसूर अहमद फारूकी का भी रफी के रिकॉर्डों का अनूठा संग्रहालय है।
मोहम्मद रफी जितने बड़े गायक थे, उस तुलना में सरकार ने उन्हें वैसे सम्मान से नहीं नवाजा, जिसके वो सही मायनों में हकदार थे। रफी साहब जनता के दिलों पर राज करने वाले कलाकार रहे। उन्हें भारत रत्न जैसा सबसे बड़ा अवॉर्ड बहुत पहले ही मिल जाना चाहिए था। लेकिन इसके लिए कभी किसी ने राजनीतिक लॉबिंग नहीं की। अकेले रामविलास पासवान ऐसे नेता थे, जिन्होंने सार्वजनिक रूप से मोहम्मद रफी को भारत रत्न देने की मांग की थी।
हालांकि, उन्हें 1967 में पद्मश्री सम्मान और 6 बार फिल्म फेयर अवॉर्ड सहित कई पुरस्कार मिले। लेकिन रफी साहब का अवदान इससे कहीं बहुत ज्यादा है। समय इस बात का गवाह है कि आज 43 बरस बाद भी वो रूहानी आवाज हरदम हमारे साथ है। हर दुख में हर सुख में।
जिस दौर में रफी की प्रतिभा परवान चढ़ी, वह हिंदी सिने संगीत का सुनहरा दौर था। उम्र के महज 55वें साल में इस महान कलाकार ने ह्रदयाघात के कारण हमेशा की लिए आंखें मूंद लीं। लेकिन उनकी आवाज आज भी उसी तरह अंतरिक्ष में उसी तरह से तैरती है।
खुद लता जी ने अपने समकालीन मोहम्मद रफी को श्रद्धांजलि देते हुए कहा था- ‘रफी भैया न केवल भारत के महानतम पार्श्वगायक थे बल्कि वो लाजवाब इंसान भी थे। उनकी आवाज की रेंज उनके समय के किसी दूसरे गायकों से बढ़कर थी, फिर चाहे वो मैं हूं, आशा हों मन्ना दा हो या किशोर भैया।‘
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