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Manipur: मणिपुर के आईने में भारतीय राष्ट्रवाद और इतिहास का सबसे बड़ा संकट

सार

Manipur: मणिपुर में जारी हिंसा में लगभग 155 लोग मारे जा चुके हैं। करीब 60,000 लोग बेघर हो गए हैं। 5000 से ज्यादा आगजनी की घटनाएं हुई हैं। राज्य भर में थाने लूटे गए हैं। हजारों की संख्या में हथियार और लाखों कारतूस संघर्षरत समुदायों के हाथ में पहुंच चुके हैं।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Social Media
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विस्तार
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लगभग तीन महीने से जातीय हिंसा में झुलस रहे मणिपुर में महिलाओं के साथ बर्बरता का एक वीडियो देख पूरा देश सन्न रह गया। जिन महिलाओं को निर्वस्त्र करके घुमाया गया, उनमें एक महिला फौजी की पत्नी है, जिसने कारगिल में युद्ध लड़ा था। मणिपुर के मुख्यमंत्री ने कहा कि ऐसी सैकड़ों घटनाएं हुई हैं। 

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मणिपुर में जारी हिंसा में लगभग 155 लोग मारे जा चुके हैं। करीब 60,000 लोग बेघर हो गए हैं। 5000 से ज्यादा आगजनी की घटनाएं हुई हैं। राज्य भर में थाने लूटे गए हैं। हजारों की संख्या में हथियार और लाखों कारतूस संघर्षरत समुदायों के हाथ में पहुंच चुके हैं। अब इस आग की लपटें मिजोरम तक पहुंचने लगी हैं। 
 

इतने संवेदनशील हालात के बाद भी केंद्र और राज्य सरकारों का रवैए पर कई लोग सवाल उठा रहे हैं। जब वह भयावह वीडियो वायरल हुआ तो प्रधानमंत्री ने चुप्पी तोड़ी, लेकिन इसके बाद मणिपुर के मुद्दे को सभी राज्यों में महिलाओं के खिलाफ अपराध से ढंकने की कोशिशें शुरू हो गईं। 

दुर्भाग्य से ऐसा प्रतीत हो रहा है कि मणिपुर में अब कोई “बीच का रास्ता” रह ही नहीं गया है। विभिन्न समुदाय अपने रुख को ज्यादा से ज्यादा कट्टर बनाते जा रहे हैं। नागरिक समाज का विलोप हो चुका है और दो संघर्षरत समुदायों के बीच बातचीत-समझौते के लिए अनिवार्य नैतिक प्रतिष्ठा राजनीतिक दल खो चुके हैं। इस बीच राहुल गांधी का मणिपुर दौरा काफी अहम था। उनके दौरे को पीड़ित समुदायों के घावों पर मलहम लगाने के प्रयास के तौर पर देखा जा सकता है। 
 

भारत एक महादेश है। यह अपने अंदर पूर्वोत्तर से लेकर सुदूर दक्षिण तक भौगोलिक, भाषाई, सांस्कृतिक और राजनीतिक स्तर पर स्थानीय अस्मिता की भावनाएं समेटे है। ये भावनाएं किसी समुदाय की पहचान, बोली, भाषा, धार्मिकता या संस्कृति से जुड़ी हो सकती हैं। इनकी अभिव्यक्ति अपने-अपने तरीके से होती है। कभी संगठन बनाकर, कभी अलग झंडों के जरिये या कभी सत्ता और संपत्तियों में सुरक्षित, उचित भागीदारी पाकर। ये अस्मिताएं मिलकर अखिल भारतीय अस्मिता के साथ जुड़ती हैं। इन्हीं पहचानों, इन्हीं अभिव्यक्तिओं से या कहें कि इन्हीं तमाम स्थानीय उप-राष्ट्रीयताओं से मिलकर अखिल भारतीय राष्ट्रीयता बनती है। भारत राष्ट्र का काम है इन सभी स्थानीय राष्ट्रीयताओं को भारतीय राष्ट्रवाद की बड़ी छतरी के नीचे लाना और उन्हें यह भरोसा देना कि हम सब मिलकर एक हैं। 
 

यह एक नाज़ुक काम है। इसमें दूरंदेशी, उदारता, गहरी समझ और बड़े भविष्य का खाका बनाने की क्षमता होनी चाहिए। यह चलताऊ तौर से नहीं किया जा सकता। इसे चुनावी लाभ या आर्थिक लाभ मात्र के दृष्टिकोण से किया जाना घातक हो सकता है। यहां समझने की जरूरत है कि राजनीतिक विचारधाराएं विभिन्न भारतीय अस्मिताओं को किस नजरिए से देखती हैं। हजारों वर्षों की सघन सामाजिक प्रक्रिया में पैदा हुई इन भारतीय अस्मिताओं को यदि चुनावी फायदे के लिए एक जरिया, एक औजार, ‘टूल’ मानकर राजनीतिक दल या सरकारें चलेंगी तो परिणाम मणिपुर जैसे ही आएंगे।
 

चुनावी लाभ और सत्ता के लिए भाजपा-आरएसएस ने हमेशा से भारतीय राष्ट्रवाद के महासागर को एक संकीर्ण रूप में दिखाने की कोशिश की है। सत्य यह है कि महान विविधताओं से भरे हमारे भारत देश, जहां संस्कृति, परंपरा और विभिन्न एथनिक समुदाय आपस में, एक दूसरे में गड्डमड्ड हैं, को आरएसएस के ‘हिंदू-गैर हिंदू’ नजरिए से देखने का परिणाम यही होगा कि अन्य अस्मिताएं ऐसे ही सरलीकृत ढंग से इसे आजमाने लगेंगी। जाहिराना भाजपा देश के अंदर मौजूद स्थानीय अस्मिताओं और उप राष्ट्रीयताओं को सुरक्षा और अपनेपन का भाव देने में असफल हो गई और इसका भारतीय समाज के हर एक समुदाय पर दूरगामी असर पड़ा है। सबसे बड़ी बात भाजपानीत केंद्र सरकार की इस बदली हुई भूमिका, संकीर्ण और आक्रामक राष्ट्रवाद के चलते तमाम छोटी-छोटी एथनिक, सांस्कृतिक, धार्मिक अस्मिताएं मजबूर होकर अपनी-अपनी पहचानों को लेकर और कट्टर हो गईं और किसी अनहोनी के लिए अपने को तैयार करने लगीं।  
 

मणिपुर का मौजूदा हाल बताता है कि चुनावी स्वार्थ वश किसी भी वर्ग/धर्म/कौम विशेष के खिलाफ चलाया गया कोई भी राजनीतिक अभियान अंत में भस्मासुर ही बनता है, क्योंकि धीरे-धीरे यह संकीर्ण नजरिया ही आपकी सोच बन जाता है। 
 
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पिछले कुछ सालों से भारत के संघीय ढांचे पर लगातार हमला हो रहा है। धर्म, भाषा और संस्कृति के आधार पर राज्य प्रायोजित विभाजन और हमले किए जा रहे हैं। मणिपुर, भारत के संघीय ढांचे पर हो रहे हमले का पहला पीड़ित है। गौरतलब है कि पूर्वी भारत में ही वंदे मातरम और जन गण मन की रचना हुई। पूर्वी भारत से नवजागरण की शुरुआत हुई। पूर्वी भारत ही हमारे राष्ट्रीय आंदोलन का प्रमुख केंद्र बना। जिस पूर्वी भारत से भारतीय राष्ट्रवाद का उदय हुआ था, आज उसी पूर्वी भारत में उसे चुनौती मिल रही है। भारतीय राष्ट्रवाद आज वाकई इतिहास के सबसे बड़े संकट का सामना कर रहा है।
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