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अमीन सयानी: बिनाका गीतमाला के प्रसारण के दिन ही प्रसारित हुई उनके जाने की खबर

सार

अग्रज हमीद भाई के आकस्मिक निधन के बाद बिनाका गीतमाला की ज़िम्मेदारी अमीन साहब पर आई और इस रेडियो प्रोग्राम ने प्रसारण की दुनिया में जो मुकाम हासिल किया वह ऐसा शिखर है जिसे छू पाना लगभग नामुमकिन है।
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भाई के आकस्मिक निधन के बाद बिनाका गीतमाला की ज़िम्मेदारी अमीन साहब पर आई - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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बुधवार यानी बिनाका गीतमाला, बुधवार यानी बहनों-भाइयों और बुधवार यानी अमीन सयानी।

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प्रसारण जगत के इतिहास में ऐसा कोई दूसरा नाम याद नहीं आता जिसका नाम किसी कार्यक्रम या संबोधन का पर्याय बन गया हो। 20 फरवरी की रात को अमीन सयानी ने मंबई में अंतिम सांस ली। 92 वर्ष के अमीन साहब बीते कुछ बरसों से अस्वस्थ थे। संयोग देखिए कि बुधवार के दिन ही मंज़र ए आम पर ये खबर फैली कि आवाज़ की दुनिया के जादूगर अमीन सयानी नहीं रहे। उसी दिन जो उनके करोड़ों प्रेमियों को बरसों उनकी याद दिलाता रहा। आवाज़ के माध्यम से कोई पचास बरस तक सयानी घर-घर का परिचित स्वर बने रहे।

गाँधीवादी परिवार में जन्में अमीन सयानी की मातुश्री कुलसुम और बड़े भाई हमीद से बालक अमीन को अपने घर में शब्द और स्वर का संस्कार मिला। आज़ादी के आंदोलन से लेकर साठ के दशक तक रहबर नाम का ये रिसाला हिन्दी, उर्दू और गुजराती में शाया होता रहा। रहबर ने ही अमीन साहब के मन आसान ज़बान या कहें हिंदुस्तानी जुबान के लिए काम करने का बीज रोपा। वही भाषा संस्कार जीवन भर उनके साथ रहा। खनकती आवाज़ तो उनकी ताक़त थी ही लेकिन उनके बनाए रेडियो प्रोग्राम्स, स्टेज शोज़ और इश्तेहारों की भाषा में सरल हिन्दुस्तानी ज़बान को हमेशा तरज़ीह मिलती रही। प्रसंगवश बता दूं कि उनकी स्वर्गीय पत्नी रमा भी अमीन सयानी के इश्तेहारों की कंटेंट राइटिंग में महत्वपूर्ण रोल निभाती रहीं।
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सिंधिया स्कूल, ग्वालियर के पूर्व छात्र युवा अमीन सयानी ने मुम्बई के सेंट ज़ेवियर्स से कॉलेज की पढ़ाई पूरी की। उनके अग्रज हमीद भाई के आकस्मिक निधन के बाद बिनाका गीतमाला की ज़िम्मेदारी अमीन साहब पर आई और इस रेडियो प्रोग्राम ने प्रसारण की दुनिया में जो मुकाम हासिल किया वह ऐसा शिखर है जिसे छू पाना लगभग नामुमकिन है। इसी कार्यक्रम ने उन्हें एक स्टार ब्रॉडकास्टर का दर्जा दिया। तक़रीबन अस्सी के दशक तक फ़िल्म इण्डस्ट्री के लगभग सभी कार्यक्रमों के प्रस्तोता अमीन सयानी ही होते। विदेशों में भी भारतीय श्रोताओं और संगीत प्रेमियों में उनकी लोकप्रियता का कोई सानी नहीं था।

रेडियो की दुनिया और अमीन सयानी की ज़िन्दगी में बिनाका गीतमाला एक कल्ट शो बन गया था। और तो और श्रीलंका का पूर्णकालिक रेडियो स्टेशन बिनाका गीतमाला के नाम से ही प्रतिष्ठित हुआ। बुधवार की रात सीलोन रेडियो से जैसे ही सिग्नेचर ट्यून के बाद बहनों – भाइयों का संबोधन गूँजता, पूरा हिन्दुस्तान थम सा जाता। फ़िल्मी संगीत की आमद का ये शो किसी रोमांच से कम नहीं था। बेशक संगीतकारों, गीतकारों और गायक-गायिकाओं के अथक परिश्रम से ही कोई गीत श्रोताओं के बीच लोकप्रिय होता लेकिन यह भी निर्विवाद सत्य है कि फ़िल्मी पत्रिकाओं, टीवी, सोशल मीडिया से पहले बिनाका गीतमाला ही वह प्लेटेफ़ॉर्म थी जो चित्रपट गीतों को जन-जन में पहुँचाने में कारगर होती थी।

इस कार्यक्रम की अपार लोकप्रियता के भय ने ही विविध भारती की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। सन 1957 तक आकाशवाणी ही अस्तित्व में था जहाँ से बमुश्किल दस मिनिट का एक कार्यक्रम फ़िल्म संगीत पर प्रसारित होता था। तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री बी. वी. केसकर फ़िल्मी गीतों के इस छोटे से प्रसारण को बेहूदा कह के बंद करवा दिया। ये वही केसकर थे जिन्होंने आकाशवाणी पर हारमोनियम भी यह कह कर प्रतिबंधित किया था कि वह एक विदेशी वाद्य है। 

बहरहाल फ़िल्म संगीत के श्रोता छटपटा उठे और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अपने कवि सहयोगी पं. नरेन्द्र शर्मा को मुम्बई भेजा, जहाँ सुगम और फ़िल्म संगीत के विविध मनोरंजन वाले पंचरंगी केन्द्र विविध भारती की स्थापना हुई। लेकिन तब तक बिनाका गीतमाला का परचम पूरे भारत में लहरा चुका था। पचास से सत्तर के दशक तक यदि किसी फ़िल्मी गीत की टीआरपी जैसी कोई चीज़ होती तो निर्विवाद रूप से उसका आधार बिनाका गीतमाला की पहली पायदान होती।


 
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आईपीएस पुलिस अधिकारी को हर बुधवार की रात पुलिस फोर्स लगवानी पड़ती - फोटो : Twitter/@PandaJay
बिनाका गीतमाला के बारे में मैंने फ़िलिप्स रेडियो के नीमच के डीलर और कविवर बालकवि बैरागी के बालसखा भानु दवे से बात की। उन्होंने बताया कि बुधवार को साठ और सत्तर के दशक में मेरे शो-रूम के सामने ऐसी भीड इकट्ठी होती कि मेनरोड पर अफरा-तफरी मच जाती। तब नये-नये पदस्थ हुए आईपीएस पुलिस अधिकारी स्वराज पुरी ने दवे जी दुकान पर हर बुधवार की रात को पुलिस फोर्स लगवानी शुरु कर दी। दवे जी ने बताया कि बिनाका गीतमाला में गीत आते ही मेरी दुकान पर एच.एम.वी. रेकॉर्ड्स की बिक्री में इजाफा हो जाता था। बॉबी के गीत झूठ बोले कौवा काटे के बिनाका गीत्माला के पहली पायदान पर आते ही अगले हफ़्ते 300 ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड बिके जो तब का एक रेकॉर्ड था। 

नीमच जिले के जनपदीय अंचल से लोग सपरिवार रेडियो खरीदने आते और उनकी मांग रहती कि अगले बुधवार के पहले हमारे घर रेडियो सेट लग जाना चाहिए। ग्राहक इस बात की खातरी करवाते कि उनके पसंदीदा सेट में बिनाका गीतमाला सुनाई देनी चाहिए नहीं तो माल वापस करना होगा! दवे जी बताते हैं बुधवार की शाम मुझे अपनी दुकान पर एक टेक्नीशियन रखना ही पड़ता था क्योंकि यदि बिनाका गीतमाला नहीं सुनाई देती तो उसे ग्राहक के घर भेज कर एरियल ठीक करवाना पड़ता था।ये था बिनाका और अमीन साहब का जलवा।

अमीन सयानी का अवसान आवाज की दुनिया से एक युग का विदा हो जाना है। उनके प्रोफ़ेशनली निष्क्रिय होने के उपरांत तकनीकी रूप से प्रसारण की दुनिया में बहुतेरे परिवर्तन आए। वे हमेशा आशावादी थे। भारत में एफ़.एफ़. स्टेशन्स की शुरूआत का उन्होंने पुरज़ोर समर्थन किया था। वे हमेशा उम्मीद से भरे रहे कि इंटरनेट के आने के बाद रेडियो की प्रासंगिकता कभी कम नहीं होगी। दुनिया तेज़ रफ़्तार से दौड रही है, जब-जब भी किसी व्यक्ति को आप भाइयों और बहनों बोलता सुनेंगे तो जाहिर है अमीन सयानी साहब की ताजा हो उठेगी। शब्द और स्वर के इस महानायक को भावभीनी श्रद्धांजलि

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 

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