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बच्चों की तस्करी में महिलाओं का शामिल होना चिंता का विषय

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छोटी और मासूम व भोली आयु के बच्चों की तस्करी तेजी से बढ़ी है। - फोटो : Social Media
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विश्व भर में इस सत्य को लेकर बहुत चिन्ता की जाती है कि छोटी और मासूम व भोली आयु के बच्चों की तस्करी होती है। उन्हें उनके अपनों से छुड़ाकर कहीं किसी ऐसी जगह भेज दिया जाता है जो न केवल उनके लिए अपरिचित होती है बल्कि उसकी भाषा व रहन-सहन से भी वह पूरी तरह अनजान होते हैं। इस नाजुक व कोमल उम्र में उन पर ऐसा जुल्म ढहाना पूरी तरह अमानवीय है।

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यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र संघ भी मानव तस्करी और उसमें से भी बच्चों की तस्करी को लेकर बहुत बार चिंता जता चुका है पर, यह अमानवीयता वैसे के वैसे जारी है। अभी पिछले दिनों भारत के पश्चिम बंगाल और आन्ध्र प्रदेश में 200 केस मानव तस्करी के सामने आए। आश्चर्य की बात है यह रही कि इनमें से अधिकांश केस में महिलाएं शामिल थीं।

सर्वेक्षण में पाया गया कि बच्चों और किशोरवय लड़के व लड़कियों की तस्करी में जो मुजरिम पकड़े गए उनमें से एक तिहाई महिलाएं शामिल थीं। इन महिलाओं की उम्र 25 वर्ष से लेकर 45 वर्ष की रही। इनमें कई बार परिवार की निकट संबंधी तो शामिल नहीं थी पर, परिवार की दूर-दराज की संबंधी अवश्य थीं जिनका परिवार में आना-जाना अच्छा खासा होता है।
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बहुत योजनाबद्ध तरीके से पूरी रेकी कर किसी परिवार के निकट घर ले लिया जाता है। - फोटो : फाइल फोटो
कई  बार मानव तस्करी के केस में यह सामने आया है कि पड़ोसी महिलाओं तथा परिवार की परिचित महिलाओं की इस मानव तस्करी में काफी हिस्सेदारी होती है। उस पड़ोसी महिला की कोशिश भी यही होती है कि वह परिवार से बहुत आत्मीय संबंध बना ले विशेषकर तो वह बच्चों के निकट होने की बहुत कोशिश करती है। जब ऐसे कुछ बच्चों को रेस्क्यू किया गया तो पता चला कि पड़ोस में रहने वाली काकी(चाची), बुआ या मौसी ही उन्हें इस प्रकार लेकर आईं थी।

ऐसा भी होता है कि बहुत योजनाबद्ध तरीके से पूरी रेकी कर किसी परिवार के निकट घर ले लिया जाता है। उसके बाद उस घर की महिला पड़ोस के परिवार से घुलने-मिलने लगती है जब उसे पूरा विश्वास हो जाता है कि वह परिवार का विश्वास जीत लेती है तब बच्चे या बच्ची को अपने साथ कहीं ले जाने के बहाने वह ले जाती हैं पर, बच्चा वापिस नहीं लौटता। इनमें से अधिकांशत: तो बच्चियां ही होती है। इस सारे कांड के बाद वह पड़ोसी महिला भी गायब हो जाती है।
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कई बार यह तस्कर महिलाएं पकड़ी जाती हैं - फोटो : फाइल फोटो
यहां तक कि यह पता चलता है कि घर-वर तो वह दो-चार दिन पहले ही समेट चुकी थी। कई बार यह तस्कर महिलाएं पकड़ी जाती हैं पर, प्राय: यही होता है कि पर्याप्त साक्ष्यों के अभाव में यह छूट जाती हैं।

दरअसल, इनका सारा समूह बहुत शातिर तरीकों से काम करता है। उनकी पहुंच भी बहुत तगड़ी होती है इसलिए सारे हथकंडे इस्तेमाल करने के बाद वह महिला छूट जाती है और मानव तस्करी के लिए नया स्थान, नया घर और नया परिवार ढूंढने के लिए तैयार हो जाती है।

इन महिलाओं के अपनत्व भरे संबोधन में एक संबोधन बहुत कॉमन है और वह है "मौसी" संबोधन! इस संबोधन से वह परिवार की महिला के साथ ऐसा बहनापा जोड़ती हैं कि महिला को लगता है कि यही बच्चों की असली मौसी है इसलिए ही इस मानव तस्कर का जाल इतना मजबूत और पक्का होता है।

मानव तस्करी का यदि यह पहलू सामने आया है और महिलाओं की इसमें इतनी महती भूमिका सामने आई है तो जरूरत है कि स्वयंसेवी संस्थाएं बस्तियों, रिहायशी इलाकों में कार्यशालाएं आयोजित कर महिलाओं को बताएं कि अपने बच्चों की सुरक्षा के लिए वह जागरुक हों और यूं ही बहनापे के फेर में पड़कर किसी भी महिला को बच्चों की मौसी, बुआ व मामी न बना दें। 
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।


 
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