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मोदी मंत्रिमंडल का विस्तार और नीतीश कुमार का सियासी गणित

सार

मंत्रिमंडल विस्तार के बाद नीतीश का बी प्लान तैयार है। जाहिर है एक व्यक्ति, एक पद के सिद्धांत पर अब आरसीपी सिंह से जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी वापस ली जा सकती है।

केंद्रीय मंत्रिमंडल में यदि आरसीपी और ललन सिंह फिट हो जाते तो राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए उपेंद्र कुशवाहा को साधकर लव-कुश का फॉर्मूला तैयार होता। अब जदयू राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी पर ललन सिंह की ताजपोशी हो सकती है।
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नीतीश कुमार, नरेंद्र मोदी और चिराग पासवान - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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बिहार के सियासी गलियारे में सवाल है कि मोदी मंत्रिमंडल के इस विस्तार में नीतीश कुमार के हाथ क्या लगा? मोदी-2 के पहले मंत्रिमंडल में एक पद का ऑफर जदयू को था, तब नीतीश ने उसे ठुकरा दिया था। आखिर अब ऐसी क्या नौबत आई कि जदयू को एक ही मंत्री पद पर नीतीश मान गए? क्या नीतीश कमजोर पड़ गए या यह कोई नया दांव है। चर्चा तो यह है कि जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष आरसीपी सिंह ने एक पद पर हामी भर दी। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह नीतीश का फैसला नहीं था ? क्या आरसीपी सिंह ने नीतीश की मर्जी के बगैर मंत्री बनने का फैसला कर लिया ? ऐसी चर्चाओं के पीछे वजह यह बताई जा रही है कि शपथ के बाद आरसीपी सिंह को नीतीश ने बधाई तक नहीं दी।

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नीतीश ने यूं किया समझौता
हालांकि अंतर्कथा कुछ और है। लोक जनशक्ति पार्टी की टूट के बाद जब नीतीश दिल्ली आंख दिखाने पहुंचे थे, तभी यह साफ हो गया था कि जदयू न केवल इस विस्तार में मोदी मंत्रिमंडल का हिस्सा होने वाला है बल्कि चिराग को बूझाकर पशुपति पारस को चमकाने की मंशा से नीतीश दिल्ली दौरे पर हैं।

नीतीश दिल्ली टू प्लस वन का फॉर्मूला लेकर पहुंचे थे। वह चाहते थे कि जदयू से उनके करीबी आरसीपी सिंह और ललन सिंह मंत्री बनें तो लोजपा से पशुपति पारस। जदयू को दो सीटों पर स्वीकृति बन गई। तीसरी आरएसी बर्थ कन्फर्म नहीं हुई। नीतीश के पाले में गेंद थी। नीतीश ने पशुपति पारस के लिए जदयू कोटे की एक कम सीट पर समझौता कर बी प्लान तैयार किया।
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चिराग उत्तराधिकारी के पहले दौर में अब तक तीन लड़ाई हार चुके हैं। - फोटो : अमर उजाला
चिराग चित, पारस चमके
नीतीश के इस दांव से चिराग चित हो गए। पारस चमक गए। संदेश गया कि नीतीश ने चिराग को कहीं का नहीं छोड़ा। पारस को रामविलास पासवान वाला मंत्रालय ही मिला। इससे भी संदेश गया कि लोक जनशक्ति पार्टी और परिवार में रामविलास पासवान के उत्तराधिकारी अब पशुपति पारस हैं, न कि चिराग पासवान।

रामविलास पासवान की जयंती पर जब चिराग आशीर्वाद यात्रा निकालने पटना पहुंचे थे, तब पटना लोजपा कार्यालय के दोनों ओर समानांतर दो तरह के होर्डिग्स-बैनर लगे थे। दोनों तरह के होर्डिंग्स-पोस्टर में रामविलास पासवान की बड़ी-बड़ी तस्वीरें थींं, लेकिन एक पर पशुपति पारस नजर आ रहे थे, तो दूसरे पर चिराग। पार्टी और परिवार में दावेदारी के इस झगड़े में भले चिराग के प्रति सहानुभूति दिखी हो, लेकिन आशीर्वाद यात्रा में मिल रहे समर्थन को वोट में बदलना चिराग के लिए आसान नहीं।

चिराग उत्तराधिकारी के पहले दौर में अब तक तीन लड़ाई हार चुके हैं। पारस संसदीय दल के नेता और अध्यक्ष बन गए। मंत्री बन गए। पारस के संसदीय दल नेता बनने को चुनौती वाली चिराग की अर्जी भी दिल्ली हाईकोर्ट से खारिज हो गई। हालांकि, उनकी आपस की यह लड़ाई अब सियासत, सड़क और अदालत तक जारी है।
 
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मंत्रिमंडल विस्तार के बाद नीतीश का बी प्लान तैयार है। और यह प्लान क्या है यही समझ का फेर है। - फोटो : PTI
नीतीश का अगला दांव
मंत्रिमंडल विस्तार के बाद नीतीश का बी प्लान तैयार है। जाहिर है एक व्यक्ति, एक पद के सिद्धांत पर अब आरसीपी सिंह से जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी वापस ली जा सकती है। केंद्रीय मंत्रिमंडल में यदि आरसीपी और ललन सिंह फिट हो जाते तो राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए उपेंद्र कुशवाहा को साधकर लव-कुश का फॉर्मूला तैयार होता। अब जदयू राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी पर ललन सिंह की ताजपोशी हो सकती है।

नीतीश का यह प्लान बी हो सकता है। इसकी अपनी वजहें हैं। आरसीपी सिंह व ललन सिंह नीतीश के बेहद करीबी व विश्वसनीय माने जाते हैं। यूं भी आरसीपी सिंह के मंत्री बनने के बाद नीतीश जातीय सवालों में उलझ गए हैं। लोजपा की टूट में ललन सिंह की अहम भूमिका रही। ललन को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर नीतीश न केवल असंतोष शांत करना चाहेंगे बल्कि जाति विशेष (कोईरी-कुर्मी) के सवालों को भी दरकिनार करेंगे।

अगड़ों की जुगत
यहां बता दें कि ललन सिंह अगड़ी (भूमिहार) जाति से हैं। बिहार में सवर्ण विधायकों की संख्या 2015 में 52 थी। यह इस बार बढ़कर 64 हो गई। 12 का इजाफा। बिहार में 28 राजपूत, 21 भूमिहार, 12 ब्राह्मण, 3 कायस्थ विधायक हैं। 2015 के मुकाबले 2020 में 8 राजपूत, 3 भूमिहार, 1 ब्राह्मण विधायक बढ़ें। कायस्थ तीन ही रहें। पिछड़ा वर्ग के विधायक 117 से घटकर 101 पर सिमट गए। अगड़ी जाति की हिस्सेदारी 20 फीसदी से बढ़कर 26 फीसदी हो गई। 2020 के विधानसभा में भाजपा ने सर्वाधिक राजपूत उम्मीदवारों पर दांव खेला था। राजद के प्रदेश अध्यक्ष भी इसी जाति से हैं।

लालू राज में भूराबाल साफ करो का नारा गूंजा था। ऐसे में सोशल इंजीनियरिंग में मजबूत नीतीश के सामने अगड़ों को साधने की जुगत वाला बी प्लान तैयार है। आने वाला लोकसभा चुनाव इसका लिट्मस टेस्ट होगा। चिराग जमुई संसदीय सीट से सांसद हैं, तो पड़ोस के मुंगेर संसदीय क्षेत्र से ललन सिंह। ललन सिंह को साधकर नीतीश खुद मजबूत बने रहना चाहेंगे और चिराग को कमजोर। 


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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