प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी।
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मायावती ने दलितों के नेता कांशीराम और शिवसेना ने बाला साहब ठाकरे को भारत रत्न देने की मांग कर दी है। इनके नामो की घोषणा हो भी सकती है बशर्ते ये सब एनडीए के शामियाने में अपना राजनीतिक स्टॉल लगा लें। दूसरे शब्दों में कहें तो अब किसी विशिष्ट क्षेत्र में अन्यतम योगदान के जरिए देश सेवा के लिए भारत रत्न देकर राष्ट्रीय कृतज्ञता जताने का दौर धुंधला चुका है। यह असंभव नहीं कि भारत रत्न अब जातीय/ सामुदायिक अथवा क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व या फिर राजनीतिक लामबंदी की योग्यता के आधार पर ही दिए जाने लगें।
इसमें शक नहीं कि लोकसभा चुनाव में चार सौ पार का आंकड़ा हासिल करने के लिए भाजपा अपना एनडीए कुनबा बढ़ाने की हर संभव कोशिश कर रही है। पहले जदयू का लौटना, अब रालोद का एनडीए में शामिल होना, पंजाब में अकाली दल को लौटाने की कवायद इसी का हिस्सा है। उधर दक्षिण में पी.वी. नरसिंहराव को भारत रत्न देने का स्वागत पूर्व सत्तारूढ़ रही भारत राष्ट्र समिति के अ्ध्यक्ष केसीआर ने किया है। केसीआर की पार्टी ने तीन साल पहले पी.वी. नरसिंहराव की जन्मशती धूमधाम से मनाई थी और उन्हें ‘तेलंगाना का गौरव’ और ‘भारतमाता का परम प्रिय पुत्र’ कहा था। तब कांग्रेस खामोश ही रही थी।
हालांकि, अब नरसिंहराव को भारत रत्न देने की घोषणा के बाद कांग्रेस यह कह रही है कि उन्हें प्रधानमंत्री तो हमने ही बनाया था। पी.वी. नरसिंहराव अविभाजित आंध्र के मुख्यमंत्री थे। ऐसे में आंध्र में भी इसका कुछ तो संदेश गया ही है। खासकर तब कि जब भाजपा और चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी फिर साथ आने की बात चल रही है। इसी तरह वर्तमान संदर्भों में महान कृषि वैज्ञानिक एम.एस. स्वामीनाथन को भारत रत्न देना विज्ञान प्रतिभा के सम्मान से ज्यादा तमिलनाडु की जनता को राजनीतिक संदेश देना ज्यादा है। हालांकि वहां की द्रविड राजनीति में अभी भी भाजपा के लिए कोई खास जगह नहीं है, लेकिन यह रेत में घरौंदा बनाने की कोशिश जरूर है।
एक बात साफ है कि भाजपा चुनाव जीतने के लिए केवल राम लहर, हिंदुत्व और सुनहरे आर्थिक सपनो के भरोसे नहीं है। वह इसी के समानांतर गरीब कल्याण, रेवड़ी कल्चर, सियासी गोलबंदी, धार्मिक ध्रुवीकरण, मोदी के वैश्विक नेता बनने, भारत के विश्व गुरू होने की दिशा में आगे कूच करने तथा युवाओं का सपना सच होने के दावों के टूल्स का भी भरपूर उपयोग कर रही है। इस शोर में गरीबी, बेरोजगारी, आर्थिक विकास में छिपी विषमता, जातीय और साम्प्रदायिक तनाव जैसे मुद्दे तूती की आवाज बनकर रह जाते हैं।
इसमें दो राय नहीं कि बीते एक दशक में भाजपा ने यह साबित कर दिया है कि चुनाव प्रबंधन में उसका कोई सानी नहीं है और उस पर राजनीतिक बढ़त हासिल करनी है तो विरोधी दलों को अब भी नए उपकरण, नए तरीके और जुमले अपनाने होंगे। भाजपा को भाजपा के पिच पर नहीं हराया जा सकता।
प्रधानमंत्री के दावे में एक पेंच भाजपा द्वारा 370 सीटें अपने दम पर जीतने का है। यह आंकड़ा कहां से और कैसे आया? यह केवल शोशेबाजी है या फिर इसके पीछे भी कोई रणनीति है? यह सवाल इसलिए भी मौजूं है क्योंकि हाल में हुए ओपिनियन पोल भाजपा और एनडीए को तीसरी बार सत्ता तो दिला रहे हैं, लेकिन भाजपा की सीटों में बेहद मामूली इजाफा दिखा रहे है। 2019 में भाजपा ने अकेले 303 सीटें जीती थीं। यानी 370 तक पहुंचने के लिए उसे 67 सीटें और चाहिए। ये कहां से आएंगी?
जिन राज्यों में भाजपा एक या दो नंबर पर है, वहां वह अधिकतम सीटें पहले ही जीत रही है। अर्थात 67 सीटें उसे उन राज्यों में जीतनी होंगी, जहां क्षेत्रीय दल सत्ता में हैं। यह तभी संभव है, जब मोदी और रामलला की जबर्द्स्त आंधी चले। ऐसा फिलहाल तो नहीं लग रहा है। लेकिन यदि ऐसा कोई अंडर करंट है तो वह नतीजों में ही झलकेगा। संभव है कि पीएम द्वारा 370 का आंकड़ा बताने के पीछे कश्मीर से धारा 370 हटाने का संदेश निहित हो। यह जताने की कोशिश भी हो सकती है कि हमने अपने कोर एजेंडे को पूरा कर दिया है। लिहाजा हम ही तीसरी बार भी सत्ता के दावेदार हैं।
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