संभल के कल्कि धाम में पीएम मोदी, सीएम योगी समेत अन्य लोग भी साथ में मौजूद रहे।
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इस्लाम के अहमदिया सम्प्रदाय ( जो पाकिस्तान में गैर मुस्लिम घोषित है तथा जिस पर हज यात्रा करने पर प्रतिबंध है) के संस्थापक मिर्जा गुलाम अहमद ने दावा किया था कि वो कल्कि के अवतार हैं, जिन्हें मेहदी कहा गया। इसी तरह बहाई धर्म ( ईरान में प्रतिबंधित) में कल्कि को ईश्वर का दूत माना गया है।
भव्य होगा मंदिर
इस कल्कि मंदिर का निर्माण 11 फीट ऊंचे चबूतरे पर होगा और इसके शिखर की ऊंचाई 108 फीट होगी। मंदिर में 68 तीर्थों की स्थापना होगी। मंदिर पत्थरों से ही बनेगा। ये गुलाबी पत्थर राजस्थान के भरतपुर जिले में स्थित बंशी पहाड़पुर से लाए जाएंगे। मंदिर में भगवान विष्णु के 10 अवतारों के लिए दस अलग-अलग गर्भगृह बनाए जाएंगे। पूरा मंदिर पांच एकड़ में पांच वर्ष में बनकर तैयार होगा। वैसे विष्णु का दसवां अवतार होने के बाद भी देश में कल्कि के मंदिर नाम मात्र को हैं। उनका एक प्राचीन मंदिर जयपुर में है।
कब लेंगे अवतार कल्कि
इसके अनुसार 4320 वीं शती में कलियुग के अन्त समय कल्कि अवतार लेंगें। वे जन्म से ही 64 कलाओ से युक्त होंगे। यह सन 2585 ई में ही यह संभव होगा, जब गुरु व शनि अपनी उच्च राशियों में एक ही साथ हो।
विष्णु पुराण के अनुसार हिंदू धर्म में कलियुग को 4 लाख 32 हजार सौर वर्ष का बताया गया है। अगर कलियुग समय की आधुनिक गणना की जाए तो इसकी शुरुआत 3120 ईसा पूर्व हुई थी, जब मंगल, बुध, शुक्र, बृहस्पति और शनि पांच ग्रह मेष राशि पर 0 डिग्री पर थे। कलियुग की इस महाअवधि में से अब तक (3102+2023) यानी 5125 साल बीत चुके हैं। 4 लाख 26 हजार 875 वर्ष अभी बाकी हैं। वर्तमान समय कलियुग का प्रथम चरण है। इसका अर्थ यह है कि कल्कि का मंदिर भले ही अभी बन रहा हो, लेकिन उनका पृथ्वी पर अवतरण सवा 4 लाख साल बाद होगा।
राजनीतिक गणित
यहां तर्क दिया जा सकता है कि कल्कि धाम करोड़ों हिंदुओं की आस्था का विषय है और इसे राजनीतिक आख्यान के संदर्भ में ही नहीं देखा जाना चाहिए। हालांकि भगवान कल्कि का जन्म जब होगा, तब मानव सभ्यता किस दौर में होगी, होगी भी या नहीं, हमारी पृथ्वी भी कायम रहेगी अथवा नहीं, यह कहना अभी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के लिए भी बताना मुश्किल है। लेकिन वर्तमान राजनीतिक संदर्भ में भाजपा के लिए धार्मिक आस्था के साथ उसका राजनीतिक महत्व जरूर है और भगवान कल्कि कम से कम संभल सीट भाजपा को जिताने में मदद कर सकते हैं।
हालांकि, जातीय समीकरण को देखते हुए उसे कल्कि मंदिर का कोई खास लाभ होता नहीं दिखता। क्योंकि कल्कि देवता ब्राह्मण जाति से हैं। भगवान राम की तरह क्षत्रिय या कृष्ण की तरह यादव नहीं। वैसे संभल सीट ज्यादातर सपा के पास ही रही है, क्योंकि इस सीट पर मुस्लिम 55, यादव 10 फीसदी और दलित वोट 17.45 फीसदी हैं। यहां सीधा हिंदू-मुसलमान ध्रुवीकरण भाजपा को नहीं जिता सकता। होता। मुस्लिम वोटों के विभाजन पर ही भाजपा की जीत का गणित टिका है।
सपा ने इस बार फिर जिन शफीकुर्रहमान को टिकट दिया है, वो 94 साल के हैं और अपने विवादास्पद बयानों के लिए जाने जाते हैं, इससे वहां के दूसरे मुस्लिम नेता भी खफा है। 2019 में यहां से सपा के डॉ. शफीकुर्रहमान अपने निकटतम भाजपा प्रत्याशी परमेश्वरलाल सैनी को पौने 2 लाख वोटों से हराकर जीते थे। उस चुनाव में सपा- बसपा का गठबंधन था। इसलिए मुस्लिम वोटों का विभाजन नहीं हुआ। लेकिन यही शफीकुर्रहमान 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के सत्यपाल सैनी से मात्र 5 हजार वोटों से हार गए थे।
तब बसपा के मुस्लिम प्रत्याशी ने 23.9 फीसदी वोट काट लिए थे। उसी चुनाव में कांग्रेस के आचार्य प्रमोद कृष्णम 1.5 फीसदी वोट लेकर पांचवे नंबर पर रहे थे। इस बार बसपा द्वारा अलग चुनाव लड़ने की घोषणा से भाजपा प्रत्याशी के फिर से जीतने की स्थिति बन सकती है। चूंकि भाजपा ने यूपी की सभी 80 सीटों पर जीतने का प्लान बनाया है, इसलिए मुमकिन है कि वह संभल से आचार्य प्रमोद कृष्णम को ही टिकट दे दे।
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