बच्चों में संस्कार ही उनकी परवरिश की सही दिशा तय करते हैं।
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खैर, बेटी को तो मैंने समझा दिया कि बेटे क्लास में सब दोस्त होते हैं और किसी के बारे में ऐसा नहीं कहते सब सिर्फ दोस्त हैं। मगर आज तो समझा दिया कल कुछ और ऐसी ही बात हुई तो किस तरह हैंडल करुंगी यही सोचकर परेशान रहती हूं।
आखिर क्यों और कैसे सीख रहे हैं बच्चे?
पहले जहां बड़ी क्लास में जाने पर बच्चों की संगत और उनके व्यवहार को लेकर चिंता करने की ज़रूरत पड़ती थी, अब तो पहली-दूसरी क्लास से ही उनकी हर हरकत, उनके हर व्यहार को बारीकी से परखने की ज़रूरत है, पता नहीं हमारी पीठ पीछे बच्चे क्या सीख रहे हैं।
हालांकि बच्चों के उम्र से पहले बड़े होने के इस ट्रेंड के लिए टीवी और सोशल मीडिया जितना ज़िम्मेदार है, शायद उतने ही ज़िम्मेदार हम पैरेंट्स भी हैं। बच्चे ने थोड़ा सा रोना शुरू किया नहीं कि उसके हाथ में स्मार्टफोन थमा देते हैं फिर उसके जो जी में आए वो देखे। बॉलीवुड के लटके-झटके वाले गानों पर किसी वयस्क की तरह ही उनकी अदाएं देखकर खूब खुश होते हैं... क्या ये सही है?
बच्चों को बहलाने के लिए उनसे बातें करें ना की उन्हें मोबाइल फोन थमा दिया जाए।
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मोबाइल से दूर रखें अपने बच्चों को
बच्चे को अव्वल तो मोबाइल से दूर रखने की कोशिश करें। और यदि दे रहे हैं तो इस बात पर नज़र रखें कि वह टीवी और मोबाइल पर किस तरह के कार्यक्रम यहां तक कि कार्टून देखता है। बच्चों को लेकर बॉलीवुड फिल्म देखने न ही जाएं तो अच्छा है। उन्हें उम्र के हिसाब से धीरे-धीरे चीज़ें समझाना शुरू करें।
प्यार का मतलब सिखाएं, मगर इन सबमें बहुत ज़्यादा इन्वॉल्व न करें, उससे कहें कि वह अभी बहुत छोटे हैं इसलिए पढ़ाई पर अपना पूर फोकस रखें और बेहतर होगा कि बच्चों को क्रिएटिव एक्टिविटी में बिज़ी रखें ताकि वह इंटरनेट और टीवी पर कम से कम समय बिताएं। सबसे महत्वपूर्ण है बच्चे का विश्वास आप पर बना रहे। इस बात का ध्यान रखें, क्योंकि ये विश्वास रहेगा तभी वह आपसे हर बात शेयर करेगा।
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