जापान के ताइपेइ में कथित विमान दुर्घटना को 77 साल हो गए। इन सात दशकों में तीन जांच आयोग इस मुद्दे को किसी निष्कर्ष पर पहुंचाने में नाकाम रहे और पंडित जवाहरलाल नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक देश के हर प्रधानमंत्री ने यह गुत्थी अपने उत्तराधिकारी को सौंपी जिसे सुलझाने का प्रयास नरेन्द्र मोदी ने अवश्य किया मगर पहेली अब भी जहा की तहां है।
स्वयं अंग्रेजों ने भी जाते-जाते अपने तरीके से नेताजी की स्थिति की गोपनीय जांच कराई। इस विषय को लेकर काफी राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी हुए और शोधकर्ताओं में काफी परस्पर तकरारें भी हुईंं। लेकिन भारत के राजनीतिक इतिहास की इस सबसे बड़ी पहेली को कोई भी प्रमाणिक तौर पर नहीं सुलझा सका। यहां तक कि 7 दशकों तक अत्यन्त गुप्त रखी गई फाइलों को भी सार्वजनिक कर दिया गया फिर भी रहस्य जहां का तहां पड़ा रहा।
मातृभूमि की आजादी की खातिर द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान मित्र राष्ट्रों के विपरीत जापान से जा मिलने और भारत सरकार के खिलाफ युद्ध शुरू करने पर उन्हें अंग्रेजों ने युद्ध अपराधी घोषित कर दिया था। इसलिए भी नेताजी गुमशुदगी का रहस्य गहराता गया।
जांच पर जांच बैठी मगर सच्चाई पर पर्दा बरकार
जापान ने सबसे पहले 23 अगस्त 1945 को घोषणा की थी कि नेताजी की मृत्यु 18 अगस्त 1945 को एक विमान दुर्घटना में हो गई। लेकिन टोकिया और टहैकू के विरोधाभासी बयानों पर संदेह उत्पन्न होने पर प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने 3 दिसम्बर 1955 को 3 सदस्यीय जांच समिति का गठन करने की घोषणा की जिसमें संसदीय सचिव और नेताजी के करीबी शाहनवाज खान, नेताजी के बड़े भाई सुरेश चन्द्र बोस और आइसीएस एन.एन. मैत्रा शामिल थे।
इस कमेटी के शाहनवाज खान और मैत्रा ने नेताजी के निधन की जापान की घोषणा को सही ठहराया तो सुरेश चन्द्र बोस ने असहमति प्रकट की। इसलिए विवाद बरकार रहा। इसके बाद 11 जुलाई 1970 को जस्टिस जी.डी. खोसला की अध्यक्षता में जांच आयोग बैठाया गया तो आयोग ने विमान दुर्घटना वाले पक्ष को सही माना, मगर नेताजी के परिजनों, जिनमें समर गुहा भी थे, ने इसे अविश्वसनीय करार दिया।
इसी दौरान कलकत्ता हाइकोर्ट ने भी मामले की गहनता से जांच करने का आदेश भारत सरकार को दिया तो 1999 में वाजपेयी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के जज मनोज मुखर्जी की अध्यक्षता में एक और जांच आयोग बिठाया गया। 7 वर्ष की जांंच के बाद 6 मई 2006 को आयोग ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। इसमें आयोग ने पाया कि नेताजी की मृत्यु विमान दुर्घटना में नहीं हुई थी। लेकिन मुखर्जी आयोग ने यह भी माना कि नेताजी अब जीवित नहीं हैं, परन्तु वह 18 अगस्त, 1945 में ताईपेई में किसी विमान दुर्घटना का शिकार नहीं हुए थे।
आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि ताईवान ने कहा-18 अगस्त, 1945 को कोई विमान दुर्घटना नहीं हुई थी और रेनकोजी मंदिर (टोक्यो) में रखीं अस्थियां नेताजी की नहीं हैं। आयोग की जांच में यह भी पाया गया कि गुमनामी बाबा के नेताजी होने का कोई ठोस सबूत नहीं। नेताजी के परिवार के दो सदस्यों ने नेताजी की रहस्यमय मौत की जांच के लिए बने मुखर्जी कमीशन की रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए थे।