30 दिसम्बर 1943 को अंडमान निकोबार में पहली बार सुभाषचन्द्र बोस ने आजाद हिन्द सरकार का तिरंगा फहराया।
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भारत पूर्ण स्वराज के साथ दुनिया से नजरें मिलाए यह सपना नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का था। ऐसे कई मौके आए जब नेताजी ने भारत की गुलामी की जंजीरों को पिघलाने की कोशिश की। कभी जेल गए तो कभी ब्रिटिश हुकूमत को आसानी से चकमा देकर अपने सीक्रेट मिशन को पूरा करने में सफल रहे। वो जब तक रहे अंग्रेजी हुकूमत को चैन से सोने न दिया। भारत में आजादी का दिन 15 अगस्त 1947 के दिन के रूप में दर्ज है लेकिन आजादी के इस दिन से लगभग 4 साल पहले ही नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने हिन्दुस्तान की पहली सरकार का गठन कर दिया था।
21 अक्टूबर सन 1943 का दिन इतिहास कभी न भुला पाएगा, जब भारत पर अंग्रेजी हुकूमत थी और नेताजी ने सिंगापुर में आजाद हिंद सरकार की स्थापना कर डाली थी। नेताजी का यह कदम अंग्रेजी सरकार को यह बतलाने के लिए पर्याप्त था कि भारत में उनकी सरकार का कोई अस्तित्व नहीं रह गया है भारतीय अपनी सरकार चलाने में सक्षम है। आजाद हिंद फौज के सर्वोच्च सेनापति के तौर पर सुभाष चन्द्र बोस ने स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार बनायी। जिसे 9 देशों ने मान्यता दी जिसमें जर्मनी, फिलीपींस, जापान जैसे देश शामिल थे। जापान के द्वारा अंडमान और निकोबार द्वीप आजाद हिंद सरकार को दे दिए गए जिनका सुभाषचन्द्र बोस ने नामकरण किया।
अंडमान को शहीद द्वीप और निकोबार को स्वराज द्वीप के नाम से संबोधित किया। 30 दिसम्बर 1943 को अंडमान निकोबार में पहली बार सुभाषचन्द्र बोस ने आजाद हिन्द सरकार का तिरंगा फहराया। आजाद हिन्द सरकार ने अपना बैंक, अपनी मुद्रा, अपना डाक टिकट और अपना गुप्ततंत्र स्थापित कर ब्रिटिश हुकूमत को भारतीयों की शक्ति का आभास कराया। नेताजी ने लोगों को संगठित होकर एकजुटता के साथ अंग्रेजी सूरज को अस्त करने की राह सुझाई।
सुभाषचन्द्र बोस ने आजाद हिन्द सरकार के द्वारा राष्ट्रीय ध्वज के रूप में तिरंगे को और राष्ट्रगान के रूप में जन-गण-मन को चुना और अभिवादन के लिए ’जय हिंद’ का प्रयोग करने की परम्परा का आगाज किया। उनके द्वारा दिए गए उद्बोधन में ’दिल्ली चलो’ के नारे ने आज भी लोगों में जोश भरने का काम जीवित रखा है। ’तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ के नारे को बुलन्द करने वाले भारत के महान क्रान्तिकारी योद्वा नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के जीवन से जुडे कई प्रेरणादायक किस्से हैं जिन्हें देख उनकी क्रान्तिमय जीवन का अनुमान लगाया जा सकता है।
कहते हैं एक बार बचपन में सुभाष अपनी माता के साथ मां काली के मन्दिर गए थे उनकी मां पूजा के लिए घर से सिंदूर लाना भूल गयी तभी उनकी मां को ध्यान आया और उन्होने सुभाष से घर जाकर सिंदूर लाने के लिए कहा लेकिन घर दूर था तभी सुभाष ने सोचा घर से सिंदूर लाने में काफी वक्त लगेगा और तभी पास पडे एक चाकू से अपने अंगूठे पर चीरा लगा कर अपनी मां से कहा कि वह उनके रक्त को सिंदूर मानकर मां काली के चरणों में अर्पित कर दें। उनके साहस का बाल्यकाल में ऐसा उदाहरण उनके साहस एवं पराक्रमी जीवन को दर्शाता है।
भारत नेताजी सुभाषचन्द्र बोस जी के जन्मदिन को पराक्रम दिवस के रूप में मनाता है। निसंदेह सुभाषचन्द्र बोस भारत के नव युवकों के रियल हीरों हैं। उनका जीवन साहस, शक्ति और पराक्रम की ऐसी प्रेरणादायक गाथा है जिसने भारत ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व को अपने अधिकारों के लिए संगठित होकर लड़ने के लिए प्रेरित करने का काम किया है। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का जीवन स्वतंत्रता, समानता, साहस से भरपूर आपसी सौहार्द्र को बनाये रखने में एक मिशाल है। ऐसे हीरो सदैव जीवित रहकर अपने राष्ट्र के युवाओं को राष्ट्रसेवा के लिए सदैव प्रेरित करते रहते हैं जैसे नेताजी सुभाषचन्द्र बोस करते हैं।
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