चंद ही सालों में उनकी बांसुरी की धुनें दुनिया के तमाम देशों में गूंजने लगीं
1952 में पहली बार आकाशवाणी के साथ बाकायदा अपना करियर शुरु करने वाले पंडित जी को इस बात की तकलीफ है कि अब आकाशवाणी से बांसुरी या संगीत कहीं किनारे हो गया है, संगीत के नए कार्यक्रम नहीं बनते और पुराने रिकॉर्ड ही गाहे बगाहे चला करते हैं। पहले संगीत ही आकाशवाणी की खास पहचान होती थी, लेकिन अब उसका चेहरा भी बदल गया है, लेकिन फिर भी लगता है कि आकाशवाणी मेरा घर है।
एक जुलाई 1938 को प्रयागराज में जन्मे हरिप्रसाद चौरसिया को उनके पिता छेदीलाल चौरसिया अपनी तरह पहलवान बनाना चाहते थे। लेकिन पांच साल की नन्हीं उम्र में मां के गुजर जाने के बाद से उनके भीतर का अकेलापन उन्हें संगीत की तरफ खींच लाया। उनके घर में संगीत का कोई माहौल भले ही न रहा हो, लेकिन उनके पड़ोस से आने वाली संगीत की धुन हमेशा उनके कानों में गूंजती और उन्हें रोमांचित करती।
उनके पड़ोसी थे उस वक्त के संगीतप्रेमी राजाराम जी। नन्हे हरिप्रसाद जी के लिए राजाराम जी की शागिर्दी से बढ़कर कुछ नहीं था। उनसे ही संगीत की बारीकियां सीखीं और बाद में बनारस चले गए और पंडित भोलेनाथ प्रसन्ना जैसे मशहूर बांसुरीवादक ने उनके हुनर को तराशा। आखिरकार उनकी जिद और लगन ने उनके भीतर एक ऐसे कलाकार को आकार देना शुरु किया जिसका कोई सानी नहीं था।
चंद ही सालों में उनकी बांसुरी की धुनें दुनिया के तमाम देशों में गूंजने लगीं। बाद के दिनों में संतूर के सबसे बड़े कलाकार पंडित शिवकुमार शर्मा के साथ उनकी जोड़ी ने शिव हरि के नाम से सिलसिला, चांदनी, लम्हे जैसी फिल्मों में संगीत दिया और फिल्म संगीत में नए शास्त्रीय प्रयोग किए।
लेकिन उन्हें वो दुनिया कुछ रास नहीं आई और लगने लगा कि फिल्मवाले जाने किस तरह का संगीत चाहते हैं, जिसका संगीत की मूल आत्मा से कोई खास सरोकार नहीं होता। वहां तो साउंडट्रैक का अपना संसार है। बहरहाल शास्त्रीय संगीत की तो अपनी ही दुनिया होती है और उसके पारखी भी अलग ही होते हैं। सम्मानों की लंबी फेहरिस्त तो पंडित जी के साथ है ही, पद्मभूषण, पद्मविभूषण के अलावा देश विदेश के तमाम अहम सम्मान उन्हें मिले।
सबसे खास बात ये है कि अब भी उन्हें यही लगता है कि उनके लिए हर दिन एक नया दिन है, कुछ न कुछ नया सीखने और करने का दिन है। वो अब भी खुद को एक छात्र मानते हैं, लेकिन ये चाहते हैं कि नई पीढ़ी संगीत की आत्मा को, इसकी शुद्धता को समझे, इसे आत्मसात करे, हर हाथ में बांसुरी हो, जीवन का संगीत हो, और दुनिया के तमाम तनावों से दूर एक बेहतर खुशहाल दुनिया हो... ‘राग देस’ की गहराइयों की तरह...।
पंडित हरिप्रसाद चौरसिया को उनके 82वें जन्मदिन पर सादर शुभकामनाएं और हमेशा स्वस्थ, सक्रिय और दीर्घायु रहते हुए बांसुरी और संगीत को नई पीढ़ी के दिलों में उतार देने की कोशिश को हमारा नमन।
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