कांग्रेस ने शुरू की भारत जोड़ो यात्रा की मुहिम
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भाजपा की रणनीति
दूसरी तरफ, सबसे बड़ी पार्टी और 'सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास' की बदौलत 2 से 303 तक पहुंची भारतीय जनता पार्टी के लिए 2024 के चुनाव की चुनौतियां कम नहीं हैं। हालांकि चुनाव प्रबंधन के मामले में भाजपा अब भी आगे है। देश के 10,35,000 बूथों तक बूथ प्रबंधन से पन्ना प्रमुख तक की जिम्मेदारी पार्टी को मतदाताओं से सीधे जोड़ती है।
10 नवंबर 2020 को जब बिहार चुनाव के नतीजे आए तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस जनादेश के रेड कार्पेट पर ही बंगाल की चुनावी मुहिम का शंखनाद कर दिया था। अभी भाजपा के शीर्ष नेता उन चुनावी राज्यों में ही किसी न किसी बहाने एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं, जहां लोकसभा चुनाव के पहले विधानसभा चुनाव होने वाले हैं।
2024 लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा की रणनीति का आलम यह है कि अभी भाजपा ने उन 144 संसदीय सीटों पर नजर टिका रखी है, जो 2019 के चुनाव में उसकी झोली से खिसक गई थीं। गठबंधन से कुछ साथियों के खिसकने के बाद नई सीटों पर भी नजरें टिक गई हैं।
2014 में जीत के बाद जिन सीटों पर भाजपा की हार हुई थी, उनकी 30 फीसदी सीटें जीतने का लक्ष्य 2019 में तय किया गया था। 2019 में हारी 144 सीटों में इस बार यह लक्ष्य बढ़ाकर 50 फीसदी सीटों पर जीत का तय किया गया है। इसके लिए बकायदा मंत्रियों और दिग्गज नेताओं को जिम्मेदारी सौंप दी गई है।
भाजपा के सामने इस बार एनडीए के बजाय अपने बूते ही पुराने प्रदर्शन को बरकरार रखने की चुनौती है। पंजाब में अकाली दल, महाराष्ट्र में शिवसेना, बिहार में जदयू से नाता टूट चुका है। बिहार ने लोकसभा चुनाव में बंपर कमल खिलाया था, जिसे इस बार दोहराना आसान नहीं होगा। सबका साथ, सबका विकास की बात करने वाली भाजपा को सहयोगियों का साथ भले छूट गया है लेकिन फर्स्ट टाइम वोटर व महिला मतदाताओं का साथ मिलना तय है।
नरेंद्र मोदी की इन मतदाताओं में सीधी पैठ है। चुनाव प्रबंधन का आलम यह है कि भाजपा हैदराबाद के निगम चुनावों से लेकर बीएमसी के चुनावों तक में शीर्ष नेतृत्व को झोंक देती है। ऐसे में कोरोना काल की वजह से भाजपा अध्यक्ष के कार्यकाल को भी विस्तार मिल जाए तो कोई हैरानी नहीं होगी। भाजपा निगम-निकाय चुनाव से लेकर राष्ट्रपति के चुनाव तक को उतनी ही शिद्दत से लड़ती है।
विपक्षी कुनबों को जोड़ने की कवायद
सबसे बड़ी और सबसे पुरानी पार्टी की चुनावी जंग के बीच क्षेत्रीय दलों और कुनबों को जोड़ने की कवायद भी जारी है। बिहार में पलटने के बाद नीतीश कुमार इस अभियान के अगुआ बनकर उभरे हैं। विपक्षी कुनबों को जोड़ने की कवायद में भले नीतीश कुमार की खिचड़ी न पक पाए, तब भी इतना तय माना जा रहा है कि ताजा दिल्ली दौरे में क्षेत्रीय क्षत्रपों से भेंट-मुलाकात कर सभी को साधने की कोशिश से विपक्ष को ऑक्सीजन जरूर मिला है।
राजनीतिक पंडित तो यह भी मान रहे हैं नीतीश बिहार विधानसभा चुनाव में खंजर के अपने जख्म को भरने में कामयाब हो जाएंगे। भाजपा को सत्ता से नहीं भी रोक पाएं तो जिस तरह विधानसभा चुनाव में जदयू को नुकसान झेलना पड़ा, उसी तरह वह भाजपा को भी इस बार बिहार में कुछ कम सीटों पर समेट कर हिसाब बराबर कर सकते हैं। इसका अंदेशा भाजपा को भी है।
यही वजह है कि अब खुद अमित शाह बिहार, राजस्थान का मिजाज भांपने और अगले मैच की पिच तैयार करने के लिए क्यूरेटर की भूमिका में पहुंचने वाले हैं।
2024 लोकसभा चुनाव का फर्स्ट लुक भले सबके सामने है, विधानसभा चुनावों का ट्रेलर-टीजर आने वाला है लेकिन असली सियासी पिक्चर (2024) अभी बाकी है। देखना यह दिलचस्प है कि 2024 में रिलीज होने वाली सियासी (सत्ता की) पिक्चर भाजपा को बॉक्स ऑफिस (बहुमत या जनादेश) पर 300 करोड़ (सीटों) के क्लब से ऊपर ले जाती है या नीचे लाती है। पिक्चर अभी बाकी है...
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