भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहां सभी को अपने विचार रखने और अपनी आस्था के अनुसार उपासना की पूरी छूट है।
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क्या देश में है एक कानून की जरूरत?
दरअसल, देश को एक सशक्त राष्ट्रीय कानून की जरूरत है। इस दिशा में केंद्र सरकार को झिझक तोड़ सबके विकास से पूर्व राष्ट्रीय अखंडता की सोचनी चाहिए।अन्यथा आज नूपुर की फांसी की मांग वाले कल किसी के लिए जेल और सरे राह फांसी की भी मांग उठा और गुंजाइश बना सकते हैं। मुस्लिम विरोधी बयान गुजरात दंगे और धारा 370 हटाए जाने के नाते ये सरकार के शीर्षस्थ नेतृत्व से लेकर संघ भाजपा नेताओं की भी हत्याओं का फतवा जारी कर सकते हैं। हालिया इस घटना के बाद कट्टरपंथियों और आतंकी संगठनों की ओर से ढेरों चेतावनी संदेश भी आए हैं।
अन्यथा हिंसक प्रदर्शन और किसी अप्रिय घटना की प्रतिक्रिया गुजरात दंगों जैसे दुखांत घटना में बदल सकती है। वहीं ऐसी हर प्रतिक्रिया देश के अमन शांति विकास और वैश्विक पहचान के लिए बुरा होगा। ऐसे में मुस्लिम समाज को अमन की पहल और सरकारों को भी दोषियों पर सख्ती बरतनी चाहिए। क्योंकि कई प्रादेशिक सरकार ने इसपे नरम रुख अपना रखा है।
वैसे इस घटना क्रम को लेकर केंद्रीय विदेश एवं गृह मंत्रालय के सक्रियता की भी समीक्षा हो। आखिर महज एक बयान को लेकर हमारे राजदूतों को तलब करना और सार्वजनिक रूप से भारत सरकार द्वारा माफी जैसी मांग भला कोई देश कैसे कर सकता है! इन सबके बीच जब बयानों को लेकर माहौल बिगड़ा तो गृह मंत्रालय क्या कर रहा था?
जबकि इससे सप्ताह दिन पूर्व ही ज्ञानवापी प्रकरण को लेकर पीएफआई जैसे संदिग्ध संगठनों ने देश व्यापी प्रदर्शन किए। जिसमें हिंदू और ईसाइयों के खिलाफ उत्तेजनक नारे लगाए गए। वहीं इसी समय मुस्लिम जमीयत के मुस्लिम उलेमाओं सम्मेलन मे हिंदुओं के देश छोड़ने के बारे में कहा गया। जमीयत के एक गुट के अध्यक्ष मिया मदनी ने कहा जिन्हें हमसे दिक्कत वो मुल्क छोड़ कर जा सकते हैं।
वैसे अब राहत भरी खबर भी आ रही है। कुवैत ने प्रदर्शनकारी गैर नागरिकों को मुल्क निकाला दिया है। वहीं भारत में जमीयते उलेमा के एक धरे ने मौलाना काजमी के नेतृत्व में आगे आकर इसके लिए मुस्लिम संगठन एवं मजहबी नेताओं को दोषी बताया है। इसके बीच संघ एवं भाजपा के नेताओं के बिगड़े बोल पर भी रोकथाम की जरूरत है। प्रचार माध्यमों से कोसों दूर रह गतिविधियों का संचालन वाला संघ अब व्यक्तिगत प्रचार वाला हो चला है। वहीं वैचारिक राजनीति वाली भाजपा संघर्षों की जगह बयानों एवं बोल पर आश्रित है।
ऐसे में संघ जहां अब संस्कृति की जगह डीएनए का बात कर रहा है। वही वे मुस्लिमों मे पैठ बना नई छवि की जुगत में भी है। बात भाजपा की करे तो यहां सफलता के सूत्र अटपटे और उत्तेजनक बोल हैं। जिसकी बानगी गिरिराज सिंह और साक्षी महाराज के वक्तव्य हैं। इस नाते हर कोई बग्गा सा ट्वीट और गिरिराज सा बयान दे सफलता प्राप्त करना चाहता है, जिसके नाते संघर्ष आंदोलन और जमीनी काम वाले संघ भाजपा मे अब विमर्श निष्कर्ष तक नही पहुंच पा रहे हैं।
आरक्षण को लेकर पुनर्विचार, एससी एसटी एक्ट, नागरिकता और कृषि सुधार कानून ऐसे तमाम मुद्दों पर ऐसा हो चुका है। भारतीय धर्म संस्कृति और मूल्यों के संरक्षनार्थ अखिल भारतीय कानून से देश अब भी वंचित है।
इसको लेकर कोई शासकीय पहल नहीं है। देशव्यापी संपर्क कार्यकर्ताओं की फौज के बावजूद इन विमर्शों को स्थापित करने और बढ़ाने में ये असमंज में दिख रहे हैं।
ऐसे में समस्याओं के फौरी हल की जगह ठोस निर्णय लेने की आवश्यकता है।
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