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अंतरराष्ट्रीय योग दिवस विशेष: ऋषियों की अपार साधना से प्राप्त सिद्धि है योग

सार

योग का उद्भव वेदों से है। हिरण्यगर्भ को योग का आदि प्रवर्तक कहा गया है। श्रुति परम्परा के अनुसार भगवान शिव, योग परंपरा के आदि गुरु हैं।
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योग का उद्भव वेदों से है। हिरण्यगर्भ को योग का आदि प्रवर्तक कहा गया है। श्रुति परम्परा के अनुसार भगवान शिव योग परंपरा के आदि गुरु हैं। - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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भारतीय वैदिक परम्परा में हमारे ऋषियों ने जिस दिव्य ज्ञान और अलौकिक अंतरदृष्टि के बल पर वैदिक मंत्रों का साक्षात्कार किया, अपने शिष्यों को बताया तथा ग्रंथ रूप में प्रणयन किया, उसका आधार योग साधना से प्राप्त सिद्धि है। ये 'आर्षग्रंथ' ऋषियों के 'ध्यान योग' का प्रतिफल है। इन ग्रंथों में प्रणीत योग को  'आर्षयोग'  कहा गया है।

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यहां आर्ष शब्द का अर्थ है- 'ऋषि दृष्ट'। तात्पर्य यह कि जो 'ऋषि द्रष्ट योग' का प्रथम स्वरूप है, वही आर्ष योग है। इसकी साधना करने वाले योगी को 'आर्षयोगी' कहा जाता है।

प्राचीन भारतीय पद्धति

योग प्राचीन भारतीय पद्धति है। किसके द्वारा सर्वप्रथम 'योगविघा' के रूप में प्रकट किया गया, यह निर्विवाद नहीं है। पर महाभारत, भागवत् गीता, महापुराण में  'हिरण्यगर्भ' को योग का वक्ता कहा गया है -
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सांख्यस्य वक्ता कपिल:  परमर्षि स  उच्यते।
हिरण्यगर्भो योगस्य वक्ता नान्य: पुरातन:।।

 
योग का उद्भव वेदों से है। हिरण्यगर्भ को योग का आदि प्रवर्तक कहा गया है। श्रुति परम्परा के अनुसार भगवान शिव, योग परंपरा के आदि गुरु हैं। श्रीमद् भगवद्गीता में भगवान कृष्ण ने योग की परंपरा के बारे में बताया है कि- मैंने यह योग सूर्य को सूर्य ने मनु और मनु ने राजा इक्ष्वाकु को योग विघा से अवगत कराया, पुनः श्रीकृष्ण ने योग का उपदेश अर्जुन को दिया।

इस तरह परम्परा से चले आ रहे योग में आज अनेक परिवर्तन देखने को मिलता है। अब केवल आसान और प्राणायाम को ही योग कहा जाने लगा है। पातंजलि योगसूत्र योग, सर्वप्रथम योग की सुव्यवस्थित-साधनापरक दृष्टिकोण को प्रस्तुत करता है।

योगसूत्र में योग को परिभाषित करते हुए बताया गया है कि  "चित्तवृत्तिनिरोध: योग:" चित्त वृतियों का निरोध ही योग है। 'योगसूत्र' में चित्त की पांच भूमियां बतायी गयी हैं-

क्षिप्तमूढ विक्षिप्त एकाग्रा ग्निरुद्धमिति चित्तभूमय:। अर्थात् क्षिप्त, मूढ़,विक्षिप्त, एकाग्र, तथा निरूद्ध ये चित्त की पांच भूमिया हैं। इनमें एकाग्रता और  सात्विकता न होने पर योग सम्भव नहीं है।


महर्षि पतंजलि के बाद आदिनाथ की परम्परा में गोरक्षनाथ, मत्स्येंद्रनाथ के अलावा अनेक आचार्यों, सिद्ध योगी, योग के कालदंड के साथ जुड़कर ब्रह्मांड में विचरण कर रहे हैं। इस परम्परा के आचार्यों में स्वात्माराम सूरी का नाम सर्वोपरि है।

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महात्मा बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद यह बताया कि-दुनिया में दुःख है। दुःख का कारण है। दुःख का निवारण भी संभव है। दुःख निवारण के उपाय भी हैं। - फोटो : istock
उन्होंने योग का परम्परागत ज्ञान प्राप्त कर इस 'ज्ञानपरम्परा ' को 'हठ प्रदीपिका' नामक ग्रंथ में निबद्ध किया है।
हठयोग के चार सोपान हैं- आसान, कुम्भक,  मुद्राबंध और नादानुसंधान। इन चार सोपानों के द्वारा चित्त की पूर्णरूपेण शुद्धि होती है, यह सिद्धि ही राजयोग है।

इसके अलावा भी योग परम्परा की कई पद्धतियां भारत में प्रचलित रही हैं।  मन्नोयोग, लययोग, कुंडलिनीयोग, कर्म-ज्ञान-भक्तियोग, जैन -बौद्ध परम्पराओं में प्रचलित योग।

योग का अष्टांगिक मार्ग

योग का अष्टांगिक मार्ग आज भी योग की सर्वोत्कृष्ट पद्धति मानी जाती है। महात्मा बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद यह बताया कि, दुनिया में दुःख है। दुःख का कारण है, दुःख का निवारण भी संभव है। दुःख निवारण के उपाय भी हैं।

अष्टांगिक मार्ग को ही महात्मा बुद्ध ने दुनिया में व्याप्त दुःख निवारण के रूप में प्रस्तुत किया। इस अष्टांगिक मार्ग का पहला सोपान है- ध्यान। मतलब 'ध्यानं निर्विषयं मन:' मन का निर्विषयी होना ही ध्यान है। किसी विषय का मन में न होना  ध्यान है।

धारणा- ध्यान और समाधि ये तीनों अंतरंग योग कहलाते हैं। इस अष्टाङ्ग रूपी वृक्ष के यम-नियम दो जड़े हैं, जिन पर यह टिका है। प्राणायाम छोटी-छोटी शाखाएं हैं। प्रत्याहार उन डालियों से निकली कपोलें हैं। धारणा पुष्प और ध्यान फल की तरह है। जब यह फल परिपक्व होता है, तो वहीं स्थित समाधि की अवस्था होती है।

इस समाधि की अवस्था में पहुंचे ऋग्वेद काल के ऋषि 'दीर्घतमस्'  योगदृष्टि से यह बताने में सक्षम होते हैं कि-

शकमयं  धूमम् आराद्  अपश्यम् ,
विषूवता पर एनावरेण ।


ऋषि दावा करते हैं कि मैंने योगदृष्टि से देखा है कि सूर्य के चारों ओर दूर-दूर तक शक्तिशाली गैस फैली हुई है। गौरतलब है कि तब सूर्य की सतह तक देखने में सक्षम किसी 'टेलिस्कोप' का आविष्कार नहीं हुआ था। योग दृष्टि ही सूर्य तक यात्रा करने में ऋषिजन सक्षम  थे।

आज दुःख  इस बात का है कि योग शिक्षक गुरू ध्यान-समाधि की अवस्था तक योग साधना से पहुंचने के बजाय योग को केवल दो अंगों आसन और प्राणायाम तक ही विशेष ध्यान देते हैं। आज योग साधना कुल मिलाकर शरीर स्वास्थ्य तक ही सीमित हो गया है। जब कि  'योगशिखोपनिषद्' में आष्टांग योग के बारे में स्पष्ट बताया गया है कि- 
 
समाधि: समतावस्था साष्टांगो योग उच्च्यते।।
प्रत्याहारो धारणा च ध्यानं  भ्रूमध्यमे हरिम्।
यमष्च नियमष्चैव आसनं  प्राणसंयम:।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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