महात्मा बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद यह बताया कि-दुनिया में दुःख है। दुःख का कारण है। दुःख का निवारण भी संभव है। दुःख निवारण के उपाय भी हैं।
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उन्होंने योग का परम्परागत ज्ञान प्राप्त कर इस 'ज्ञानपरम्परा ' को 'हठ प्रदीपिका' नामक ग्रंथ में निबद्ध किया है।
हठयोग के चार सोपान हैं- आसान, कुम्भक, मुद्राबंध और नादानुसंधान। इन चार सोपानों के द्वारा चित्त की पूर्णरूपेण शुद्धि होती है, यह सिद्धि ही राजयोग है।
इसके अलावा भी योग परम्परा की कई पद्धतियां भारत में प्रचलित रही हैं। मन्नोयोग, लययोग, कुंडलिनीयोग, कर्म-ज्ञान-भक्तियोग, जैन -बौद्ध परम्पराओं में प्रचलित योग।
योग का अष्टांगिक मार्ग
योग का अष्टांगिक मार्ग आज भी योग की सर्वोत्कृष्ट पद्धति मानी जाती है। महात्मा बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद यह बताया कि, दुनिया में दुःख है। दुःख का कारण है, दुःख का निवारण भी संभव है। दुःख निवारण के उपाय भी हैं।
अष्टांगिक मार्ग को ही महात्मा बुद्ध ने दुनिया में व्याप्त दुःख निवारण के रूप में प्रस्तुत किया। इस अष्टांगिक मार्ग का पहला सोपान है- ध्यान। मतलब 'ध्यानं निर्विषयं मन:' मन का निर्विषयी होना ही ध्यान है। किसी विषय का मन में न होना ध्यान है।
धारणा- ध्यान और समाधि ये तीनों अंतरंग योग कहलाते हैं। इस अष्टाङ्ग रूपी वृक्ष के यम-नियम दो जड़े हैं, जिन पर यह टिका है। प्राणायाम छोटी-छोटी शाखाएं हैं। प्रत्याहार उन डालियों से निकली कपोलें हैं। धारणा पुष्प और ध्यान फल की तरह है। जब यह फल परिपक्व होता है, तो वहीं स्थित समाधि की अवस्था होती है।
इस समाधि की अवस्था में पहुंचे ऋग्वेद काल के ऋषि 'दीर्घतमस्' योगदृष्टि से यह बताने में सक्षम होते हैं कि-
शकमयं धूमम् आराद् अपश्यम् ,
विषूवता पर एनावरेण ।
ऋषि दावा करते हैं कि मैंने योगदृष्टि से देखा है कि सूर्य के चारों ओर दूर-दूर तक शक्तिशाली गैस फैली हुई है। गौरतलब है कि तब सूर्य की सतह तक देखने में सक्षम किसी 'टेलिस्कोप' का आविष्कार नहीं हुआ था। योग दृष्टि ही सूर्य तक यात्रा करने में ऋषिजन सक्षम थे।
आज दुःख इस बात का है कि योग शिक्षक गुरू ध्यान-समाधि की अवस्था तक योग साधना से पहुंचने के बजाय योग को केवल दो अंगों आसन और प्राणायाम तक ही विशेष ध्यान देते हैं। आज योग साधना कुल मिलाकर शरीर स्वास्थ्य तक ही सीमित हो गया है। जब कि 'योगशिखोपनिषद्' में आष्टांग योग के बारे में स्पष्ट बताया गया है कि-
समाधि: समतावस्था साष्टांगो योग उच्च्यते।।
प्रत्याहारो धारणा च ध्यानं भ्रूमध्यमे हरिम्।
यमष्च नियमष्चैव आसनं प्राणसंयम:।
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