तमाम कैलेंडर और उसके आधार पर नया साल
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हिंदू कैलेंडर की जड़ें वैदिक परंपराओं-खगोल विज्ञान में
संविधान सभा द्वारा ग्रगोरियन पंचांग को अपनाए जाने के बावजूद भारत में अपने प्राचीन पंचांग की उपयोगिता समाप्त नहीं हुई थी। हिंदू कैलेंडर प्राचीन परंपराओं, धार्मिक मान्यताओं और खगोलीय टिप्पणियों में गहराई से निहित है।
हिंदू कैलेंडर, जिसे ‘‘पंचांग‘‘ भी कहा जाता है, एक प्राचीन समय निर्धारण प्रणाली है जो सदियों से विकसित हुई है। इसकी उत्पत्ति का श्रेय किसी एक व्यक्ति या विशिष्ट प्रारंभिक बिंदु को नहीं दिया जा सकता, क्योंकि इसका विकास प्राचीन भारत में विभिन्न क्षेत्रीय और सांस्कृतिक प्रभावों से हुआ है। माना जाता है कि हिंदू कैलेंडर की जड़ें वैदिक परंपराओं और खगोल विज्ञान में हैं।
इसी तरह विक्रम संवत (जिसे विक्रमी संवत या बिक्रम संबत के नाम से भी जाना जाता है) भारत और नेपाल में उपयोग की जाने वाली एक पारंपरिक हिंदू कैलेंडर प्रणाली है। इसकी वर्ष-गणना 57 ईसा पूर्व से शुरू होती है, जो शकों (सीथियन) पर राजा विक्रमादित्य की महान जीत और विक्रम युग की स्थापना का प्रतीक है।
जबकि ग्रेगोरियन कैलेंडर एक मानकीकृत प्रणाली है जिसका उपयोग मुख्य रूप से नागरिक उद्देश्यों के लिए विश्व स्तर पर किया जाता है। दोनों कैलेंडर अपनी-अपनी सांस्कृतिक, धार्मिक और व्यावहारिक जरूरतों को पूरा करते हैं। जिस तरह ग्रगोरियन कैलेंडर रोमन साम्राज्य का अतीत को वर्तमान तक लाता है।
पंचांग सुधार समिति की सिफारिश
प्राचीन भरतीय पंचांग के महत्व को देखते हुए भारत सरकार ने वरिष्ठ भारतीय खगोल वैज्ञानिक मेघनाद साहा की अध्यक्षता में बनी पंचांग सुधार समिति की सिफारिश पर 22 मार्च 1957 को ग्रेागोरियन के साथ ही राष्ट्रीय कैलेंडर भी जारी कर दिया जिसमें अन्य खगोलीय डेटा के साथ-साथ हिंदू धार्मिक कैलेंडर तैयार करने के लिए समय और सूत्र भी शामिल थे, ताकि इसे सुसंगत बनाया जा सके।
दरअसल पंचांग कमेटी के अध्यक्ष वरिष्ठ भारतीय खगोल वैज्ञानिक मेघनाद साहा वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद के तत्वावधान में कैलेंडर सुधार समिति के प्रमुख थे। समिति के अन्य सदस्य ए.सी. बनर्जी, के.के. दफ्तरी, जे.एस. करंदीकर, गोरख प्रसाद, आर.वी. वैद्य और एन.सी. लाहिरी थे।
समिति के सामने वैज्ञानिक अध्ययन पर आधारित एक सटीक कैलेंडर तैयार करने का काम था, जिसे पूरे भारत में समान रूप से अपनाया जा सके। यह एक बहुत बड़ा काम था। समिति को देश के विभिन्न हिस्सों में प्रचलित विभिन्न कैलेंडरों का विस्तृत अध्ययन करना था। समिति के समक्ष तीस अलग-अलग कैलेंडर थे। यह कार्य इस तथ्य से और भी जटिल हो गया था कि कैलेंडर के साथ धर्म और स्थानीय भावनाएं भी जुड़ी हुई थीं।
भारत के पहले प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 1955 में प्रकाशित समिति की रिपोर्ट की प्रस्तावना में लिखा था कि “वे (विभिन्न कैलेंडर) देश में पिछले राजनीतिक विभाजनों का प्रतिनिधित्व करते हैं। अब जब हमने स्वतंत्रता प्राप्त कर ली है, तो यह स्पष्ट रूप से वांछनीय है। हमारे नागरिक, सामाजिक और अन्य उद्देश्यों के लिए कैलेंडर में एक निश्चित एकरूपता होनी चाहिए और यह इस समस्या के वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर किया जाना चाहिए।
आधिकारिक तौर पर उपयोग में चैत्र 1, 1879 शक संवत, या 22 मार्च, 1957 को शुरू हुआ। हालांकि, सरकारी अधिकारी धार्मिक कैलेंडर के पक्ष में इस कैलेंडर के नए साल के दिन को काफी हद तक नजरअंदाज करते हैं।
कुछ देशों के अपने कैलेंडर
विश्व में चीन जैसे कुछ देश हैं जिनका अपना कैलेंडर है। जैसे हिजरी नववर्ष कई इस्लामी देशों में मनाया जाता है, जो इस्लामी चंद्र कैलेंडर की शुरुआत का प्रतीक है। तारीख हर साल बदलती रहती है और ये चंद्र चक्र पर आधारित होती है। फारसी नव वर्ष नौरोज ईरान, अफगानिस्तान और कई अन्य देशों में मनाया जाता है। यह आमतौर पर 21 मार्च को होता है और वसंत की शुरुआत का प्रतीक है।
यहूदी नव वर्ष रोश हशनाह इजराइल और दुनिया भर में यहूदी समुदायों द्वारा मनाया जाता है। यह आमतौर पर सितंबर या अक्तूबर की शुरुआत में पड़ता है। थाई नव वर्ष सोंगक्रान थाईलैंड और दक्षिण पूर्व एशिया के कुछ हिस्सों में मनाया जाता है। यह आमतौर पर अप्रैल के मध्य में होता है। माओरी मातरिकी नया साल न्यूजीलैंड में मनाया जाता है, आमतौर पर मई के अंत और जून की शुरुआत के बीच। इथियोपिया में नव वर्ष एनकुटाटाश मनाया जाता है।
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