विश्व सिनेमा और कैमरे का कमाल
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‘मधुमति’ में कैमरे का कमाल
‘मधुमति’ में उन्होंने रहस्य और सौंदर्य का अनोखा तालमेल बैठाया है। तूफान, बारिश, बिजली की कड़क, बादलों की गड़गड़ाहट को फिल्माने में वे माहिर थे। ‘मधुमति’ का क्लाइमेक्स सीन झाड़-फानुस के साथ है। अभिनेता दिलीप कुमार हवेली में प्राण का चित्र बना रहे हैं। तेज हवा चल रही है, परदे उड़ रहे हैं। बिजली कड़क रही है। दिलीप कुमार बातों से प्राण के मन में भय उत्पन्न कर रहे हैं।
वे पेंटिंग देखने के लिए प्राण को बुलाते हैं, झाड़-फानुस नीचे करते हैं, ताकि चित्र पर रोशनी पड़ सके। मगर चित्र पर खून है। अपने चित्र पर खून देख कर प्राण दहशत से भर जाता है। इसके बाद झाड़-फानुस पैन्डुलम की तरह हिलने लगता है। हिरोइन, जिसे प्राण मरी हुई मानता था, वहां आती है। ज्यों ही प्राण उस पर गोली चलाना चाहता है, झाड़-फानुस टूट कर नीचे गिर पड़ता है, चूर-चूर हो जाता है और धुप्प अंधेरा हो जाता है। दर्शक रोमांच से भर जाता है।
लाइटिंग और साउंड से सृजित इस सीन के लिए दिलीप गुप्ता को काफी मेहनत करनी पड़ी। बिजली कड़कने पर अचानक खिड़की चमक उठती है, हिलते परदे पर प्रकाश परिवर्तित होता जाता है। हिलती-डुलती छायाएं हवेली के बाहर और चरित्रों के भीतर, उनके मन में चल रहे तूफान को दिखाती हैं। तब दिलीप कुमार कमरे के दूसरी ओर जा कर झाड़-फानुस नीचे करते हैं। दिलीप गुप्ता का कैमरा दर्शक में रहस्य, भय, रोमांच की सृष्टि करता है।
ज्यों-ज्यों दिलीप कुमार झाड़-फानुस नीचे करते हैं, छायाएं परिवर्तित होती जाती हैं। फानुस हिलता है, छायाएं हिलती हैं। फानुस टूटने से अंधेरा हो जाता है, ठीक उसी समय वैजयन्ती माला आती हैं। चरित्रों की धुंधली छायाएं दिखती हैं। फानुस की रोशनी बंद होने पर चरित्र अंधेरे में घूमते हुए दीखते हैं।
डेब्री कैमरे का प्रयोग
कैमरामैन के रूप में उन्होंने सबसे पहले डेब्री कैमरे का प्रयोग किया। डेब्री के बाद वे मिचेल को काम में लाने लगे। ‘मधुमति’ के लिए उन्होंने आउटडोर के लिए आर्टेफ्लैक्स तथा मिचेल दोनों का प्रयोग किया। हर कैमरे के साथ इमेज की गुणवत्ता बदल जाती है। डेब्री सॉफ्टनेस की अनुभूति देता है, पिक्चर में शार्पनेस नहीं आती है।
दिलीप गुप्ता को सॉफ्टनेस चाहिए होती तो वे इसे लाइटिंग तथा डिफ्यूजर की सहायता से उपलब्ध कर लेते। काली पट्टी तथा एमपी डिफ्यूजर का उपयोग करते। कभी-कभी शार्पनेस के लिए वे काली पट्टी में छेद कर देते। इसे वे खासतौर से हिरोइन के लिए प्रयोग करते।
‘मधुमति’ का उनका सबसे मनपसंद गीत ‘आजा रे...’ है, इसे खास ट्रीटमेंट दिया है। पहले दूर से गाना केवल सुनते हैं। कोई दिखता नहीं है, कौन गा रहा है, यह पता नहीं चलता है। हीरो और दर्शक के मन में उत्सुकता जगती है। फिर जब हीरो इस आवाज को सुनता है, तो वह का पीछा करता है, साथ-साथ दर्शक भी। जब भी हीरो और दर्शक आवाज को सुनते हैं, लड़की की झलक पाते हैं, वह दूर है, कभी पेड़ों की ओट में, कभी मात्र उसकी छाया दीखती है, कभी वह धुंध में लिपटी हुई नजर आती है। वायवी स्वर और लुकती-छिपती आकृति मिल कर वास्तविकता और कल्पना का अद्भुत निर्माण करती है।
1936 में दिलीप गुप्ता ने नीलिमा (लिली) से शादी की। रत्ना, चंपा, दीपा, रीता व मानसी- इनकी पांच बेटियां हैं। पृथा सेन संपादित ‘ए पोर्ट्रेट ऑफ दिलीप गुप्ता: दि आर्टिस्ट हू पेंटेड विथ लाइट एंड सैडो’ केलिए चंपा राय ने सामग्री उपलब्ध कराई। बिमल राय मेमोरियल समिति ने 1997 में दिलीप गुप्ता को लाइफ टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड प्रदान किया। मद्रास में 1999 में दिलीप गुप्ता की मृत्यु हुई।
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