फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

India vs Bharat: भारत के नामकरण की कहानी, वेद, पुराण और ग्रंथों की जबानी

सार


वैदिकधारा के ग्रंथों में प्रजापति ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र भरत को ही यद्यपि इस देश के नाम 'भारतवर्ष' का मूलाधार माना गया है, किंतु कुछ ऐसे विरोधात्मक उल्लेख भी मिलते हैं जिनके संदर्भ से कतिपय विद्वानों ने दौष्यन्ति भरत के नाम को मूलाधार स्वीकार किया है। परंतु प्राचीन साहित्य से इस तथ्य की पुष्टि नहीं होती। उसके अनुसार तो ऋषभ पुत्र भरत 'भारत' नाम के आधार सिद्ध होते हैं।

विज्ञापन
भारतं कुलम् (आदिपर्व 74/131) कुछ लोग मानते हैं, इसी शकुंतला पुत्र भरत से ही इस भूखंड का नाम भारत हुआ। - फोटो : Amar Ujala
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

हमारा देश भारत एक अकेला ऐसा देश है जिसपर जब जिसने राज किया उसका नाम अपने हिसाब से रख दिया इसी कारण वो हिंदुस्तान कहलाया, इंडिया कहलाया किंतु हमारे देश का वास्तविक नाम "भारत "सदियों से अनवरत चला आ रहा है। यह नाम और हमारे देश की आन बान शान सदैव बनी रहेगी यह सर्वविदित है।

विज्ञापन


किंतु क्या आप जानते हैं कि हमारे देश का नामकरण "भारत" वास्तव में कौन से "भरत "के नाम पर हुआ? प्रमाण क्या कहते हैं?
 

हमारे देश में चर्चित भरत हुए-आदिब्रह्मा आदिनाथ एवं यशस्वती पुत्र चक्रवर्ती सम्राट भरत, अभिज्ञान शाकुन्तलम् में वर्णित दुश्यंत एवं शंकुतला पुत्र भरत, रामचरितमानस के दशरथ एवं कैकेई पुत्र भरत एवं नाट्यशास्त्र प्रणेता भरत। हालांकि बार-बार दुश्यंत, शकुंतला पुत्र भरत को भारतवर्ष नामकरण का आधार बताया जाता रहा है और इस निराधार संदर्भ को लगभग आरोपित किया जाता रहा है, पढ़ाया और प्रचारित किया जाता रहा है किंतु सत्य कुछ और ही है।


भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित अपनी पुस्तक "भारतनामा " जो हमारे देश के नामकरण विषय पर ही है, उसके लिए इस विषय को परिमार्जित एवं प्रामाणिक संदर्भों सहित प्रस्तुत करने से पहले बहुत अध्ययन किया और जानबूझकर पुस्तक स्वयं ना लिखकर मैंने अपने शोध कार्य को संपादित कर पाठकों को सौंपा है। इसका तीसरा परिवर्धित संस्करण हाल ही में प्रकाशित हुआ है।

विज्ञापन

 


पुस्तक में इस विषय पर हिंदी भाषा के साथ संस्कृत, मराठी, गुजराती, कन्नड़, तामिल, पंजाबी एवं अंग्रेजी में भी प्रमाण पूरित लेख एवं वेद पुराण एवं उपनिषद् तथा अन्य ग्रंथों से उद्धृत संदर्भों एवं उद्धरणों के माध्यम से यह सिद्ध होता है कि हमारे देश का नामकरण "भारत" वास्तव में "अयोध्या अधिपति आदिनाथ ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र चक्रवर्ती सम्राट भरत के नाम पर हुआ है। "


विश्व धर्म संसद के अध्यक्ष डॉ. आचार्य प्रभाकर मिश्र , वासुदेव शरण अग्रवाल, सूर्यकांत बाली, डॉ श्रीभगवान सिंह ,भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के भूतपूर्व महानिदेशक एम सी जोशी, पद्मभूषण बलदेव उपाध्याय, डॉ.मुनि लाल रंगा, कैलाश वाजपेई, प्रोफेसर कुलदीप कुमार, डॉ.श्याम नारायण पांडे और कितने ही विचारकों लेखकों चिंतकों इतिहासकारों के लेख भारतनामा में संकलित हैं। बानगी के लिए कुछ संदर्भ प्रस्तुत कर रही हूं -

भारतं कुलम् (आदिपर्व 74/131) कुछ लोग मानते हैं, इसी शकुंतला पुत्र भरत से ही इस भूखंड का नाम भारत हुआ। इसी कारण यह कौरववंश भारत वंश के नाम से प्रसिद्ध हुआ जो इस वंश में बाद के राजा हुए भारत (भरतवंशी) कहलाए। पर यह निश्चय ही परवर्ती मत है। दुष्यंत पुत्र भरत 6 मन्वन्तर और 426 दिव्य युगों के बाद हुए।

इधर, इससे बहुत वर्ष पूर्व ही देश का नाम 'भारत' हो चुका था। महान कवि कालिदास ने अपने प्रसिद्ध 'अभिज्ञानशाकुंतल' में भी शकुंतला- पुत्र भरत के नाम पर भारतवर्ष देश का नामकरण नहीं हुआ उल्लेख किया है। निश्चय ही ऋषभ-पुत्र भरत के नाम पर ही 'भारतवर्ष' देश नाम रखा गया। ( भारतनामा पृष्ठ 127)
 

विज्ञापन

भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित अपनी पुस्तक "भारतनामा " जो हमारे देश के नामकरण विषय पर ही है। - फोटो : Amar Ujala
ऋषभ पुत्र भरत का वर्णन ऐसे तो जैन परंपरा तथा ब्राह्मण परंपरा- दोनों में मिलता है, किंतु दोनों परंपराओं में उनके जीवन का चित्रण अपनी- अपनी दृष्टि के अनुसार अलग-अलग रीति से किया गया है। इसी कारण, जैन धर्म-ग्रंथों तथा ब्राह्मणीय धर्मग्रंथों में वर्णित जीवन-चरित्रों में बहुत कुछ समानता होते हुए भी कुछ तथ्यात्मक अंतर भी मिलते हैं।

जैन परंपरा में उनका वर्णन शलाका-पुरुषों के अंतर्गत प्रथम चक्रवर्ती के रूप में हुआ है और उनका सारा जीवन पिता से प्राप्त शिक्षा के अनुरूप है। वे निवृत्ति धर्म के अनुगामी हैं और यही स्वाभाविक निवृत्ति धर्म है, किंतु इसमें कहीं-कहीं चारित्र लेखकों द्वारा प्रवृत्ति धर्म का रंग भी चढ़ा दिया गया है।

वैदिकधारा के ग्रंथों में प्रजापति ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र भरत को ही यद्यपि इस देश के नाम 'भारतवर्ष' का मूलाधार माना गया है, किंतु कुछ ऐसे विरोधात्मक उल्लेख भी मिलते हैं जिनके संदर्भ से कतिपय विद्वानों ने दौष्यन्ति भरत के नाम को मूलाधार स्वीकार किया है। परंतु प्राचीन साहित्य से इस तथ्य की पुष्टि नहीं होती। उसके अनुसार तो ऋषभ पुत्र भरत 'भारत' नाम के आधार सिद्ध होते हैं।
 
'अग्नि पुराण' (10/10-11); 'मार्कण्डेय पुराण' (पृ. 39-42 ); 'नारद पुराण' (पूर्वखंड, अध्याय 48 ); 'लिंग पुराण' (47/19 -13 ); 'स्कंद पुराण' (माहेश्वर खंड कौमार खंड, 37/57); 'वायु पुराण' (द्वितीयमांश, अध्याय 1); 'ब्राह्मांड पुराण' (पूर्व 2/14); 'कूर्म पुराण' (अध्याय 1 ) ; 'वाराह पुराण' (अध्याय 76); 'मत्स्य पुराण' (114- 5-6) आदि पुराणों के अतिरिक्त श्रीमद्भागवत में तो स्पष्ट रूप से कहा गया है कि ऋषभ के ज्येष्ठ पुत्र भरत महायोगी थे और उन्हीं के नाम पर यह देश 'भारतवर्ष' कहलाया : येषां खलु महायोगी भरतो ज्येष्ठः श्रेष्ठगुण आसीद्येनेदं वर्ष भारतमिति व्यापदिशन्ति (5/4/9)। उक्त के अतिरिक्त जैन धर्म के प्रायः सभी पुराण-ग्रंथ एवं अन्य साहित्य इस तथ्य के साक्षी हैं। (भारतनामा/ 147)

सोभिचिन्त्याथ ऋषभो भरतं पुत्रवत्सलः ।
ज्ञानवैराग्यमाश्रित्य जित्वेनद्रय महोरगान् ॥
हिमाद्रेर्दक्षिणां वर्ष भरतस्य न्यवेदयत्।
तस्मान्तु भारतं वर्ष तस्य नाम्ना विदुर्बुधाः ॥
(लिंगपुराण, अ. 35, श्लोक 21, 23-24)

अर्थात् श्री ऋषभदेव जी ने हिमालय का दक्षिण प्रांत भरत को दिया। इसलिए इस प्रांत का नाम भारतवर्ष हुआ ।

अग्निपुराण भारतीय विद्याओं का मुख्य विश्वकोश है। इसके 383 अध्यायों में नाना प्रकार के विषयों का सन्निवेश है। इस ग्रंथ में 'भरत और भारत' से संबंधित पंक्तियां हैं-

जरामृत्यभयं नास्ति धर्माधम युगादिकम्
नाधर्म मध्यमं तुल्या हिमादेशात्तु नाभितः ।
ऋषभो मरुदेव्यां च ऋषभाद् भारतोऽभवत्
ऋषभोऽदात् श्रीपुत्रो शाल्यग्रामे हरिं गतः ।
भरताद् भारतं वर्षं भरतात् सुमतिस्त्वभूत् ॥

(अग्निपुराण, अ. 10, श्लोक 10-12) अर्थात्- उस हिमवत् प्रदेश (भारतवर्ष को पहले हिमवत् प्रदेश कहते थे) में जरा (बुढ़ापा) और मृत्यु का भय नहीं था, धर्म और अधर्म भी नहीं थे।उनके मध्य समभाव था। वहाँ नाभिराज मरुदेवी से ऋषभ का जन्म हुआ । ऋषभ से भरत हुए। ऋषभ ने राज्यश्री भरत को प्रदान कर संन्यास ले लिया। भारत से इस देश का नाम भारतवर्ष हुआ। भरत के पुत्र का नाम सुमति था।

वेदांत केसरी में श्री ए. चिंतामणि ने अपने लेख 'ऋषभदेव और आदि शैवधर्म' में लिखा है कि प्राचीनता में उतिरए तो इक्ष्वाकुवंशी भगवान ऋषभ मिलते हैं, जो जैनों के प्रथम तीर्थंकर हैं और जिन्होंने आर्यों को अहिंसा धर्म का पाठ पढ़ाया था। ऋग्वेद में इन्हीं ऋषभ की प्रशंसा की गई है और भी श्रीमद्भागवत पुराण में इनको विष्णु का अवतार घोषित किया है।

ऋषभ का चरित्र हिंदू पुराणों में भी वैसा ही है जैसाकि जैन शास्त्रों में है। दोनों ही उनके पुत्र भरत बताते हैं, जिनके नाम से यह देश भारतवर्ष कहा जाने लगा था।

अनेकानेक ऐतिहासिक, पौराणिक, पुरातात्विक, धार्मिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक प्रमाण यही उल्लेख करते हैं। मुझे आशा है कि हमारे देश के वास्तविक नाम भारत के नामकरण के वास्तविक एवं प्रामाणिक आधार को संज्ञान में अवश्य लिया जाएगा एवं सत्यरुप में प्रतिष्ठित भी किया जाएगा।
 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकताु, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें