मुख्यमंत्री सिद्धारमैया
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राजनीतिक रूप से, सिद्धारमैया अपनी पार्टी, कांग्रेस का समर्थन जुटाने पर ध्यान केंद्रित करेंगे। पार्टी के भीतर और बाहर, उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि इस केस के कारण उनके नेतृत्व और मुख्यमंत्री पद पर असर न पड़े। कांग्रेस आलाकमान और वरिष्ठ नेताओं का समर्थन प्राप्त करना उनकी प्राथमिकता होगी। वे जनता से संवाद और सहानुभूति का माहौल कोशिश भी करेंगे कि कैसे उन्हें राजनीति का शिकार बनाया जा रहा है।
वे अपने समर्थकों के बीच यह संदेश फैलाने का प्रयास करेंगे कि यह मामला राजनीतिक प्रतिशोध का हिस्सा है। वे इसे अपने खिलाफ एक राजनीतिक साजिश के रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं, ताकि जनता की सहानुभूति प्राप्त कर सकें।
इसके अलावा वे इस विवाद के बीच अपने प्रशासनिक कार्यों और कर्नाटक सरकार द्वारा चलाए जा रहे विकास कार्यों को आगे बढ़ाने का प्रयास करेंगे। इससे वे अपनी छवि को सुधारने और यह दिखाने की कोशिश करेंगे कि वे अपने पद पर मजबूती से कायम हैं और राज्य के हित में काम कर रहे हैं। सिद्धारमैया इस मामले को कानूनी और राजनीतिक दोनों मोर्चों पर संभालने की कोशिश करेंगे, ताकि उनके खिलाफ उठने वाले आरोपों का प्रभाव कम हो सके और उनकी राजनीतिक स्थिति मजबूत बनी रहे।
कोर्ट से मिलेगी राहत?
सिद्धारमैया को कोर्ट से राहत मिलना फिलहाल मुश्किल दिख रहा है, क्योंकि कर्नाटक उच्च न्यायालय ने उनके खिलाफ चल रही लोकायुक्त की जांच को रोकने से इनकार कर दिया था। कोर्ट ने यह माना कि राज्यपाल द्वारा दी गई मंजूरीऔर मामले की जांच वैध हैं। सिद्धारमैया ने राज्यपाल के आदेश को चुनौती दी थी, लेकिन हाई कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया था। हालांकि, सिद्धारमैया के पास अभी भी सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का विकल्प है, जहां वे राज्यपाल के आदेश और उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती दे सकते हैं।
यदि सुप्रीम कोर्ट उनके पक्ष में कोई निर्णय देता है, तो उन्हें कुछ राहत मिल सकती है। लेकिन वर्तमान स्थिति में, हाई कोर्ट का निर्णय उनके खिलाफ है, और जांच भी तेजी से आगे बढ़ रही है।
इसलिए, जब तक सुप्रीम कोर्ट से कोई सकारात्मक निर्णय नहीं आता, उनके लिए कानूनी मुश्किलें बढ़ती हुई दिखाई दे रही हैं। जब उच्च न्यायालय का निर्णय किसी पक्ष के खिलाफ जाता है, तो वह पक्ष सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (एस एल पी ) दायर कर सकता है।
सिद्धारमैया के मामले में, यह याचिका राज्यपाल द्वारा लोकायुक्त जांच की मंजूरी को चुनौती देने के लिए हो सकती है। वे सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगा सकते हैं कि हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी जाए और जांच पर रोक लगाई जाए।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट पहले यह तय करेगा कि विशेष अनुमति याचिका स्वीकार की जाए या नहीं। अगर कोर्ट मानता है कि मामला महत्वपूर्ण है और इसमें अपील का आधार है, तो इसे स्वीकार किया जाएगा। अगर विशेष अनुमति याचिका स्वीकार कर ली जाती है, तो इसके बाद सुनवाई की तारीख निर्धारित की जाएगी। प्रारंभिक सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट यह तय कर सकता है कि हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगाई जाए या न लगाई जाए। यदि सुप्रीम कोर्ट प्राथमिक स्तर पर राहत देने के लिए तैयार होता है, तो वह जांच या अन्य कार्यवाही पर अस्थायी रोक लगा सकता है।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में सिद्धारमैया के वकील यह दावा कर सकते हैं कि राज्यपाल का आदेश असंवैधानिक है या राजनीतिक द्वेष से प्रेरित है। अगर उच्चतम न्यायालय सुनाने को तैयार होता है तो सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट किसे सही ठहराती है किसे नहीं।
अगर कोर्ट सिद्धारमैया के पक्ष में निर्णय आता है, तो राज्यपाल के आदेश और जांच प्रक्रिया को रद्द किया जा सकता है।अगर कोर्ट उनके खिलाफ फैसला सुनाता है, तो जांच आगे बढ़ेगी और मामले में कानूनी कार्रवाई जारी रहेगी।
सिद्धारमैया ने कर्नाटक हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील करने की योजना बनाई है। हालांकि, अभी तक सुप्रीम कोर्ट में उनकी अपील की तारीख तय नहीं हुई है। कर्नाटक उच्च न्यायालय ने उनके खिलाफ जांच को को रोकने से इनकार कर दिया था। इस फैसले के बाद, सिद्धारमैया की कानूनी टीम सुप्रीम कोर्ट से स्थगन आदेश या राहत प्राप्त करने के लिए प्रयास कर सकती है, लेकिन प्रक्रिया में कुछ समय लग सकता है।
जब तक सुप्रीम कोर्ट से कोई स्थगन आदेश नहीं मिलता, जांच रुकने की संभावना कम है। अगर उच्चतम न्यायालय उनके पक्ष में फैसला सुनाता है, तो ही एफआईआर रद्द हो सकती है। अभी उसके रद्द होने की कोई स्पष्ट संभावना नहीं दिख रही है। जाहिर है कि सिद्धारमैया के लिए रास्ता बंद है।
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