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मुडा केस: मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के लिए 'रास्ता बंद है', अब क्या-क्या हैं विकल्प?

सार

अब सिद्धारमैया की अगली रणनीति अपने राजनीतिक करियर और मुख्यमंत्री पद की रक्षा करने के इर्द-गिर्द केंद्रित होगी। सिद्धारमैया के पास कानूनी विकल्पों का सहारा लेने का मौका है। वे  उच्चतम न्यायालय में राज्यपाल द्वारा दी गई जांच की मंजूरी को चुनौती दे सकते हैं।
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सीएम सिद्धारमैया - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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मुडा  (मैसूरु अरबन डेवलपमेंट अथॉरिटी) केस में कर्नाटक के सीएम फंसे हैं। उन पर ईडी का शिकंजा कसा है। झारखण्ड के मुख़्यमंत्री हेमंत सोरेन और और दिल्ली  मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के बाद वे तीसरे विपक्षी मुख्यमंत्री हैं, जो ईडी की जांच में  फंसे हैं।   वे केजरीवाल की राह नहीं अपना सकते, क्योंकि वे अपनी पार्टी के सर्वोच्च नेता नहीं है।  इस जमीन घोटाले का मामला इसलिए भी गरमाया हुआ है कि इसके तार सीधे राज्य के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया से जुड़े हैं।

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यह घोटाला 3.2 एकड़ जमीन से जुड़ा है, जिसे मुख्यमंत्री की पत्नी पार्वती को उनके भाई मल्लिकार्जुन स्वामी ने 2010 में उपहार में दिया था। मैसूरु अर्बन डेवलपमेंट अथॉरिटी ने इस  जमीन का अधिग्रहण किया था। उसके बाद पार्वती ने मुआवजे की मांग की और फिर उन्हें 14 प्लॉट आवंटित किए गए।  

कहा जाता है कि ये प्लॉट मूल भूमि के टुकड़े से काफी अधिक कीमत के हैं। अब उनकी पत्नी पार्वती की ओर से मुडा को 14 विवादित प्लॉट वापस लौटाने के फैसले पर सियासत गरमा गई है।
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सीएम सिद्धारमैया का कहना है कि उनकी पत्नी ने उनके (सिद्धारमैया) खिलाफ चल रही 'नफरत की राजनीति' का शिकार होकर यह निर्णय लिया है। पार्वती  के इस निर्णय से मैं भी हैरान हूँ।  

सिद्धारमैया की पत्नी बीएन पार्वती ने  मुडा के कमिश्नर को पत्र में लिखा कि  'मुझे कसाबा होबली के केसारे गांव में मेरे 3 एकड़ और 16 गुंठा जमीन के बदले मैसूर में विजयनगर के तीसरे और चौथे फेज में 14 वैकल्पिक प्लॉट आवंटित किए गए थे। मैं सेल डीड कैंसिल करके 14 साइटों को वापस करना चाहती हूं। मुडा ने उनकी अपील मान ली है।

सरल शब्दों में गांव में जमीन अधिग्रहण किया गया।  बदले में शहर के पॉश इलाके में 14 प्लॉट दे दिए गए। आरोप है कि इस डील से प्लॉट पाने वालों को करीब 55 करोड़ 80  लाख का फायदा हुआ। प्लॉट पार्वती और उनके अन्य रिश्तेदारों के नाम थे।

इलाके के आरटीआई कार्यकर्ता सक्रिय हुए। जांच की मांग गई। कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने इस मामले की जांच की अनुमति दी थी, जिसे सिद्धारमैया ने हाई कोर्ट में चुनौती दी। उन्होंने तर्क दिया कि यह निर्णय संवैधानिक प्रक्रियाओं का उल्लंघन करता है और राज्यपाल ने मंत्रिपरिषद की सलाह को नजरअंदाज किया। हालांकि, कर्नाटक हाई कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी, यह कहते हुए कि मामले में जांच जरूरी है क्योंकि इसमें मुख्यमंत्री के परिवार का प्रत्यक्ष लाभ है।

अब इस केस में लोकायुक्त पुलिस ने उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी, जिसमें कई गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था, जिनमें भारतीय दंड संहिता (IPC) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत कई सेक्शन्स शामिल हैं। मामला ईडी यानी प्रवर्तन डिपार्टमेंट को सौंप दिया गया है जिसने इसे मनी लॉन्ड्रिंग के मामले के रूप दर्ज कर छानबीन शुरू कर दी है।

क्या होगी अगली रणनीति?

अब सिद्धारमैया की अगली रणनीति अपने राजनीतिक करियर और मुख्यमंत्री पद की रक्षा करने के इर्द-गिर्द केंद्रित होगी। सिद्धारमैया के पास कानूनी विकल्पों का सहारा लेने का मौका है। वे  उच्चतम न्यायालय में राज्यपाल द्वारा दी गई जांच की मंजूरी को चुनौती दे सकते हैं।

कर्नाटक हाई कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी, लेकिन वे सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकते हैं, यह दावा करते हुए कि राज्यपाल का आदेश नियमों का उल्लंघन करता है और उनके संवैधानिक अधिकारों का हनन करता है।

एफआईआर में सिद्धारमैया को प्रमुख आरोपी के रूप में नामित किया गया है, और उनके परिवार के अन्य सदस्य भी इसमें आरोपी हैं। इस मामले का राजनीति और कानून दोनों पर बड़ा प्रभाव हो सकता है, क्योंकि सिद्धारमैया इस समय कर्नाटक के मुख्यमंत्री हैं, और यह मामला उनकी छवि को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।

सिद्धारमैया और उनके परिवार के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने के बाद, वे लोकायुक्त की जांच में सहयोग करने का रुख अपना सकते हैं। यह कदम उनकी छवि को सुधारने और यह दिखाने के लिए हो सकता है कि वे किसी प्रकार की अनियमितताओं में शामिल नहीं हैं। 14 प्लॉट्स का लौटाना इसी प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है।

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मुख्यमंत्री सिद्धारमैया - फोटो : ANI
राजनीतिक रूप से, सिद्धारमैया अपनी पार्टी, कांग्रेस का समर्थन जुटाने पर ध्यान केंद्रित करेंगे। पार्टी के भीतर और बाहर, उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि इस केस के कारण उनके नेतृत्व और मुख्यमंत्री पद पर असर न पड़े। कांग्रेस आलाकमान और वरिष्ठ नेताओं का समर्थन प्राप्त करना उनकी प्राथमिकता होगी। वे जनता से संवाद और सहानुभूति का माहौल  कोशिश भी करेंगे कि कैसे उन्हें राजनीति का शिकार बनाया जा रहा है।

वे अपने समर्थकों के बीच यह संदेश फैलाने का प्रयास करेंगे कि यह मामला राजनीतिक प्रतिशोध का हिस्सा है। वे इसे अपने खिलाफ एक राजनीतिक साजिश के रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं, ताकि जनता की सहानुभूति प्राप्त कर सकें।

इसके अलावा वे इस विवाद के बीच अपने प्रशासनिक कार्यों और कर्नाटक सरकार द्वारा चलाए जा रहे विकास कार्यों को आगे बढ़ाने का प्रयास करेंगे। इससे वे अपनी छवि को सुधारने और यह दिखाने की कोशिश करेंगे कि वे अपने पद पर मजबूती से कायम हैं और राज्य के हित में काम कर रहे हैं। सिद्धारमैया इस मामले को कानूनी और राजनीतिक दोनों मोर्चों पर संभालने की कोशिश करेंगे, ताकि उनके खिलाफ उठने वाले आरोपों का प्रभाव कम हो सके और उनकी राजनीतिक स्थिति मजबूत बनी रहे।

कोर्ट से मिलेगी राहत?

सिद्धारमैया को कोर्ट से राहत मिलना फिलहाल मुश्किल दिख रहा है, क्योंकि कर्नाटक उच्च न्यायालय ने उनके खिलाफ चल रही लोकायुक्त की जांच को रोकने से इनकार कर दिया था। कोर्ट ने यह माना कि राज्यपाल द्वारा दी गई मंजूरीऔर मामले की जांच वैध हैं। सिद्धारमैया ने राज्यपाल के आदेश को चुनौती दी थी, लेकिन हाई कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया था। हालांकि, सिद्धारमैया के पास अभी भी सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का विकल्प है, जहां वे राज्यपाल के आदेश और उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती दे सकते हैं।

यदि सुप्रीम कोर्ट उनके पक्ष में कोई निर्णय देता है, तो उन्हें कुछ राहत मिल सकती है। लेकिन वर्तमान स्थिति में, हाई कोर्ट का निर्णय उनके खिलाफ है, और जांच भी तेजी से आगे बढ़ रही है।

इसलिए, जब तक सुप्रीम कोर्ट से कोई सकारात्मक निर्णय नहीं आता, उनके लिए कानूनी मुश्किलें बढ़ती हुई दिखाई दे रही हैं। जब उच्च न्यायालय का निर्णय किसी पक्ष के खिलाफ जाता है, तो वह पक्ष सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (एस  एल  पी ) दायर कर सकता है।

सिद्धारमैया के मामले में, यह याचिका राज्यपाल द्वारा लोकायुक्त जांच की मंजूरी को चुनौती देने के लिए हो सकती है।  वे सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगा सकते हैं कि हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी जाए और जांच पर रोक लगाई जाए।

लेकिन  सुप्रीम कोर्ट पहले यह तय करेगा कि विशेष अनुमति याचिका स्वीकार की जाए या नहीं। अगर कोर्ट मानता है कि मामला महत्वपूर्ण है और इसमें अपील का आधार है, तो इसे स्वीकार किया जाएगा। अगर  विशेष अनुमति याचिका स्वीकार कर ली जाती है, तो इसके बाद सुनवाई की तारीख निर्धारित की जाएगी। प्रारंभिक सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट यह तय कर सकता है कि हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगाई जाए या न लगाई जाए। यदि सुप्रीम कोर्ट प्राथमिक स्तर पर राहत देने के लिए तैयार होता है, तो वह जांच या अन्य कार्यवाही पर अस्थायी रोक लगा सकता है।

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में सिद्धारमैया के वकील यह दावा कर सकते हैं कि राज्यपाल का आदेश असंवैधानिक है या राजनीतिक द्वेष से प्रेरित है। अगर उच्चतम न्यायालय  सुनाने को तैयार  होता है तो सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट  किसे सही ठहराती है किसे नहीं।

अगर कोर्ट सिद्धारमैया के पक्ष में निर्णय आता  है, तो राज्यपाल के आदेश और जांच प्रक्रिया को रद्द किया जा सकता है।अगर कोर्ट उनके खिलाफ फैसला सुनाता है, तो जांच आगे बढ़ेगी और मामले में कानूनी कार्रवाई जारी रहेगी।

सिद्धारमैया ने कर्नाटक हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील करने की योजना बनाई है। हालांकि, अभी तक सुप्रीम कोर्ट में उनकी अपील की तारीख तय नहीं हुई है। कर्नाटक उच्च न्यायालय ने उनके खिलाफ जांच को  को रोकने से इनकार कर दिया था। इस फैसले के बाद, सिद्धारमैया की कानूनी टीम सुप्रीम कोर्ट से स्थगन आदेश या राहत प्राप्त करने के लिए प्रयास कर सकती है, लेकिन प्रक्रिया में कुछ समय लग सकता है।

जब तक सुप्रीम कोर्ट से कोई स्थगन आदेश नहीं मिलता, जांच रुकने की संभावना कम है। अगर उच्चतम न्यायालय  उनके पक्ष में फैसला सुनाता है, तो ही एफआईआर रद्द हो सकती है। अभी उसके रद्द होने की कोई स्पष्ट संभावना नहीं दिख रही है।  जाहिर है कि सिद्धारमैया के लिए रास्ता  बंद है।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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