संगीत सिर्फ साधना से मिल सकता है, और साधना सिर्फ हमारे जमाने के लोगों ने ही नहीं की। मैं अब भी तमाम ऐसे बच्चों से मिलता हूं जिन्होंने संगीत की साधना में ही अपना पूरा समय लगा रखा है। हमारे समय में भी बहुत सारे बच्चे संगीत की तरफ झुकाव रखते थे लेकिन तब शायद उनको अपनी प्रतिभाएं दिखाने के इतने अवसर नहीं मिलते थे।
हम लोगों ने कई मर्तबा ऐसे बच्चों को ढूंढा है। सालों पहले तो हमें कोई बच्चा गाते हुए अगर रास्ते में या स्टेशन पर भी मिल जाता था तो हम रुककर उसके साथ वक्त बिताते थे और उसका मन हुआ तो उसे आगे बढ़ने का हौसला औऱ मदद भी देते थे।
पिताजी से मिले संस्कार
यह संस्कार हमें अपने पिताजी (रामप्रसाद शर्मा) से मिले। वह अक्सर रेलवे प्लेटफॉर्म से बच्चों को अपने साथ ले आते थे और फिर उन्हें महीनों संगीत की तालीम दिया करते थे। हमारी तालीम भी बचपन में ही शुरू हो गई। तब मैं शायद 12 साल का था तब पहली बार मैंने किसी फिल्म के लिए कोई वाद्य यंत्र बजाया।
दरअसल, यह मैं बड़े और गुणी संगीतकारों का आशीर्वाद ही समझता हूं कि हम इतना कुछ हिंदी फिल्मों में कर पाए। लक्ष्मी (लक्ष्मीकांत) और मेरी उम्र में ज्यादा फर्क नहीं था। वह मुझसे तीन साल बड़े थे और 18 के होने के पहले ही हम स्टूडियो स्टूडियो काम तलाशने लगे थे। वैसे सच पूछें तो ये फिल्मों में संगीत देने का आइडिया उन्हीं का था मैं तो कहीं ऑस्ट्रिया जाकर कायदे से वायलिन सीखने के सपने देखता था और सोचता था कि एक दिन बड़ा वेस्टर्न वायलिन प्लेयर बनकर वहीं कहीं सेटल हो जाऊंगा। पर शायद हम पर हमारे बुजुर्गों और ईश्वर की कृपा रही कि हम संगीतकार बन गए।
कला की साधना जीवन में काम आती है
कला की साधना और हुनर की हौसलामंदी के अलावा सबसे बड़ी चीज जो जीवन में काम आती है वह है उस अदृश्य शक्ति का आशीर्वाद। अगर हम सही, सार्थक और सकारात्मक ऊर्जा के साथ प्रयास करते हैं तो सफलता निश्चित है। किसी काम को छोटा या बड़ा नहीं समझना चाहिए। हर काम पूजा है। और पूजा छोटी या बड़ी कैसे हो सकती है।
साधक का काम है साधना करना। साधना से ही सिद्धि प्राप्त होती है। दूसरी जो सबसे बड़ी बात है, वह है अपने आसपास नकारात्मक विचारों को फटकने भी नहीं देना। हमने और आर डी बर्मन ने साथ-साथ ही करियर शुरू किया लेकिन हमने कभी एक दूसरे के बारे में कभी किसी से अंतरंग बातचीत में भी उल्टा सीधा नहीं कहा।
हमारे बीच में एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा चलती रहती थी। हम एक दूसरे के बनाए गानों में भी वाद्ययंत्र बजाया करते थे। हमारी फिल्म दोस्ती के सारे गानों में आर डी बर्मन ने ही माउथ ऑर्गन बजाया। उनके जैसा माउथ ऑर्गन बजाने वाला बाद में फिर दूसरा नहीं हुआ।
संगीत के किसी भी साधक को चाहे वह गाता हो, लिखता हो या धुनें बनाता हो, जीवन में सच्चा होना बहुत जरूरी है। अपना साथ देने वालों को सम्मान देना, अपना हाथ थामने वालों के लिए जीवनपर्यंत ऋणी रहना और अपने लिए भलाई का एक भी काम करने वाले के लिए जितना भी संभव हो प्रतिफल देने के लिए तैयार रहना ही जीवन की असली पूंजी है।
समय बदल चुका है लेकिन हमारे मूल्य नहीं बदलने चाहिए। तकनीक ने संगीत की संगत पर भी काफी असर डाला है, लेकिन तकनीक के दौर में भी पश्चिम में अब भी फुल पीस ऑर्केस्ट्रा गानों में बजता है। हमारे यहां भी लोग फुल पीस ऑर्केस्ट्रा देखने सुनने आते हैं और मेरा मन कहता है कि अगर हिंदी सिनेमा में अब भी सारे साजिंदे एक साथ बैठकर कोई धुन बजाएं तो कोई दो राय नहीं कि वह गाना लोगों के दिल में सदियों तक बजता रहेगा।
आप जिस भी क्षेत्र में हैं, अगर उसे क्षेत्र में आने वाले नए हुनरमंदों का आप सहारा नहीं बनते हैं या नए कलाकारों का हौसला नहीं बढ़ाते हैं तो आपकी साधना अधूरी ही मानी जाएगी। किशोर कुमार जब सुपरस्टार बन चुके थे तो हमने उन्हें मिस्टर एक्स इन बॉम्बे के मशहूर गाने, मेरे महबूब कयामत होगी,की धुन सुनाई थी। धुन सुनते ही वह इतने खुश हुए कि उन्होंने अपने बंगले का पूरा स्टाफ बुला लिया औऱ सबके सामने हमारी तारीफ की। वह लम्हा हम कभी नहीं भूले। एक कलाकार का सबसे बड़ा सम्मान यही होता है कि कोई उसका काम देखकर उसकी तारीफ करे।
(अमर उजाला से हुई बातचीत पर आधारित)
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