फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस: मानसिक स्वास्थ्य का मतलब मनोचिकित्सा ही नहीं, अब इससे ऊपर उठकर देखने की जरूरत

विज्ञापन
मानसिक स्वास्थ्य को लेकर भारत में चुनौतियां - फोटो : Amarujala graphics
विज्ञापन

मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को इस दशक के लिए बड़ी चुनौती के तौर पर देखा जा रहा है। विशेषकर कोरोना महामारी के बाद यह और व्यापक होती नजर आ रही है। आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि वैश्विक स्तर पर साल 2020 के बाद से  मनोरोगियों का आंकड़ा काफी तेजी से बढ़ा है। कुछ अध्ययन बताते हैं, कई विकसित और विकासशील देशों में हर चार में से एक व्यक्ति किसी न किसी प्रकार के मनोरोग का शिकार है। चिंता-तनाव और अवसाद के केस तेजी से बढ़ रहे हैं, इस खतरे को देखते हुए विशेषज्ञों को चिंता है कि आने वाले 5-8 वर्षों में मानसिक स्वास्थ्य चिकित्सा क्षेत्र पर बड़ा दबाव आ सकता है।

विज्ञापन


वैश्विक स्तर पर बढ़ती मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के बारे में लोगों को जागरूक करने और इस खतरे को कम करने के लिए हर साल 10 अक्तूबर को विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस मनाया जाता है। हालांकि मानसिक स्वास्थ्य के बढ़ते जोखिमों को देखते हुए विशेषज्ञों का कहना है कि इसे सिर्फ मनोचिकित्सा या इसके आसपास तक ही सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए, इस दिशा में अब जरूरत है कि जन-जन का प्रयास शामिल हो, जिससे हम स्वस्थ भारत की कल्पना को चरितार्थ कर सकें।

सबसे बड़ी बात, मन को स्वस्थ रखे बिना स्वस्थ भारत की कल्पना करना बेमानी होगी, और इससे बड़ी बेमानी होगी मानसिक स्वास्थ्य को एक दायरे में बांध कर रखना। अब समय आ गया है कि हम सभी इस विषय की गंभीरता को समझें, न सिर्फ समझें बल्कि इसके लिए प्रयास करें। देश के हर बच्चे से लेकर माता-पिता, शिक्षक, प्रशासन, नीति निर्माताओं और कानून व्यवस्था को मानसिक स्वास्थ्य की अहमियत के बारे में सोचने और इस दिशा में प्रयास करने की आवश्यकता है।
विज्ञापन


मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर रखने के लिए सामाजिक और पर्यावरणीय परिस्थितियों की भी विशेष भूमिका है। लंबे समय से चले आ रहे स्टिग्मा को तोड़कर लोग इलाज के लिए आगे आ रहे हैं, मानसिक स्वास्थ्य की आवश्यकताओं पर चर्चा हो रही है, सरकार की तरफ से भी प्रयास किए जा रहे हैं, यह निश्चित ही शुभ संकेत हैं पर यह तो पहला कदम है, इसे व्यापक बनाने की आवश्यकता है। यह तभी संभव हो पाएगा जब मनोचिकित्सा के साथ इसमें जन-जन का प्रयास शामिल होगा।

मानसिक स्वास्थ्य को लेकर बरतें सावधानी - फोटो : istock

मानसिक स्वास्थ्य, देश के समग्र विकास के लिए आवश्यक

किसी भी देश के समग्र विकास के लिए लोगों के क्वालिटी ऑफ लाइफ यानी कि गुणवत्ता पूर्ण जीवन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, इसका सीधा संबंध उत्पादकता से है जो आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण आयाम है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूली स्तर से ही बच्चों को मानसिक स्वास्थ्य के बारे में जागरूक किए जाने की आवश्यकता है। इसे पाठ्यक्रम का विषय बनाया जाना चाहिए जिससे बच्चों में इसकी समझ को विकसित किया जा सके। स्कूली पाठ्यक्रम में मानसिक स्वास्थ्य को शामिल करके अगली पीढ़ी को इसके वैज्ञानिक पहलुओं के बारे में जागरूक करने में मदद मिल सकती है, जिससे इस दिशा में चले आ रहे कलंक के भाव को कम किया जा सके। इससे लोगों के लिए इस बारे में बात करना, इलाज प्राप्त करना सहज हो सकेगा, जिससे उत्पादकता को बढ़ाने में भी मदद मिल सकेगी। 

पर क्या वास्तव में मौजूदा समय में इस दिशा में हम अपेक्षित कार्य कर रहे हैं? शायद नहीं, मानसिक स्वास्थ्य को लेकर फिलहाल भारत में किए जा रहे प्रयासों के स्तर में विशेष सुधार की आवश्यकता नजर आ रही है।

मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं पर गंभीरता से विचार किए जाने की जरूरत - फोटो : istock

भारत में मानसिक स्वास्थ्य विकारों की स्थिति और खर्च


आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि वैश्विक स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य के कुल मामलों में भारत से 15 फीसदी केस हैं। हालांकि देश में इस स्तर पर खर्च और प्रयास अभी प्रारंभिक स्तर के ही दिख रहे हैं। भारत सरकार ने साल 2022 के लिए 39.45 लाख करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया था, इसमें स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग को 83,000 करोड़ रुपये आवंटित किए। साल 2021-22 में 71,269 करोड़ रुपये के बजट की तुलना में इस साल लगभग 16.5 प्रतिशत की वृद्धि की गई थी।
 
मानसिक स्वास्थ्य की दिशा में प्रयास करते हुए सरकार की तरफ से गुणवत्तापूर्ण मानसिक स्वास्थ्य काउंसलिंग और देखभाल सेवाओं तक बेहतर पहुंच प्रदान करने के लिए ‘राष्ट्रीय टेली मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम’ की घोषणा की गई। इसमें 23 टेली-मानसिक स्वास्थ्य उत्कृष्टता केन्द्रों का एक नेटवर्क शामिल होने की बात कही गई थी।
 
दुर्भाग्य से भारत अन्य देशों की तुलना में मानसिक स्वास्थ्य की दिशा में किए जा रहे प्रयासों में अभी पीछे है। दुनिया के ज्यादातर देश अपने सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 5-18% मानसिक स्वास्थ्य पर खर्च करते हैं, जबकि भारत का इस दिशा में खर्च 0.05 फीसदी ही है। इसके अलावा भारत में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की कमी भी बड़ी चुनौती है। 1.3 बिलियन (130 करोड़) की आबादी के लिए मात्र 10,000 ही मान्यताप्राप्त मनोचिकित्सक हैं, इनमें भी ज्यादातर लोग शहरी क्षेत्रों में हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में उचित मानसिक स्वास्थ्य सुविधाओं का भारी अभाव है। जिला स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम तो तैयार किए गए हैं लेकिन वहां की स्थिति 'राम भरोसे' ही है। आलम यह है कि तमाम राज्यों में ग्रामीण क्षेत्रों से लोगों को मनोचिकित्सा के लिए राज्य की राजधानी या दिल्ली का रुख करना पड़ रहा है। 

मनोचिकित्सकों का कहना है, कोरोना महामारी के बाद से देश में मानसिक स्वास्थ्य विकारों के केस में 15-20 फीसदी की बढ़ोतरी आई है, हालांकि सुविधाओं में इस स्तर पर कोई खास सुधार नहीं हुआ है। टेलीकंसल्टेंसी जैसे तकनीक ने लोगों के लिए दूर बैठकर भी परामर्श लेना आसान जरूर बनाया है पर अब भी ग्रामीण क्षेत्रों में अशिक्षा और जागरूकता की कमी के चलते, ये सेवाएं शहरी आबादी के इर्द-गिर्द ही घूमती ही नजर आ रही हैं।

कोविड-19 ने हर एक व्यक्ति को मानसिक तौर पर प्रभावित किया है, चाहे वे संक्रमित हुए हों या नहीं। मानसिक स्वास्थ्य की बढ़ती इस तरह की चुनौतियों को लेकर चिंता जाहिर करते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एक बयान में कहा-

''नो हेल्थ विदाउट मेंटल हेल्थ''।

आत्महत्या के मामलों की रोकथाम के लिए संगठनात्मक व्यवस्था की जरूरत - फोटो : Pixabay
आत्महत्या के बढ़ते मामले और रोकथाम

मानसिक स्वास्थ्य विकारों के बढ़ते आंकड़ों का एक दुष्प्रभाव यह भी देखने को मिला है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत में आत्महत्या के रिपोर्ट मामलों में भी बढ़ोतरी आई है।

 
भारत, दुनिया में सबसे ज्यादा आत्महत्या के मामले वाला देश है, दस साल पहले चीन शीर्ष पर था, लेकिन अब भारत में सबसे ज्यादा लोग आत्महत्या कर रहे हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के डेटा के अनुसार, साल 2021 में 1.64 लाख से अधिक लोगों ने आत्महत्या की, 2020 में यह आंकड़ा 1.53 लाख था।
 
आत्महत्या रोकथाम के लिए कानून की जरूरत को ध्यान में रखते हुए हाल ही में मध्यप्रदेश सरकार ने एक सार्थक पहल की है। मनोरोग विशेषज्ञ (मेंबर सुसाइड प्रिवेंशन टास्क फोर्स) डॉ सत्यकांत त्रिवेदी की पहल 'जीवन को कहें हां' और उनके सुझावों पर विचार करते हुए राज्य सरकार ने देश की पहली आत्महत्या रोकथाम नीति तैयार करने की दिशा में काम करना प्रारंभ किया है। डॉ सत्यकांत त्रिवेदी कहते हैं, देश में बढ़ते आत्महत्या के मामलों की रोकथाम के लिए संगठनात्मक व्यवस्था की जरूरत है जिसके माध्यम से लोगों को जागरूक करके आत्महत्या रोकथाम की दिशा में प्रयास किए जा सकें।

एक बातचीत में डॉ सत्यकांत कहते हैं, मानसिक स्वास्थ्य सुधार के लिए हमें व्यवस्थित रणनीति पर काम करने की जरूरत है। जन जागरूकता अभियान के साथ हमें लोगों को मानसिक स्वास्थ्य की आवश्यकताओं को लेकर जागरूक करने, मानसिक स्वास्थ्य को लेकर वर्षों से चले आ रहे कलंक के भाव को दूर करने पर जोर देना होगा। इसके साथ स्कूली पाठ्यक्रम में मानसिक स्वास्थ्य को विज्ञान के एक विषय के तौर पर शामिल करने की आवश्यकता है जिससे बच्चों को मानसिक स्वास्थ्य के वैज्ञानिक पहलुओं को लेकर शिक्षित किया जा सके। ऐसा करके अन्य बीमारियों की तरह हम मानसिक स्वास्थ्य विकारों को भी एक रोग के रूप में प्रस्तुत कर पाएंगे जिससे लोग इसके इलाज के लिए सामने आएं और वर्षों से चले आ रहे स्टिग्मा को दूर किया जा सके। 

डॉक्टर सत्यकांत कहते हैं, मध्यप्रदेश सरकार ने आत्महत्या रोकथाम नीति की पहल की है, देश के अन्य राज्यों को भी इस दिशा में साथ आने की आवश्यकता है। मैं खुद को सौभाग्यशाली समझता हूं कि इस महत्वपूर्ण विषय पर सरकार ने मेरे सुझावों को गंभीरता से लिया और पहल की।

देश में मानसिक स्वास्थ्य मंत्रालय बनाए जाने की आवश्यकता है जिससे इस विषय पर राष्ट्रीय स्तर पर संरचित तरीके से काम हो सके। मानसिक स्वास्थ्य मंत्रालय बनने से कमेटी और प्रबुद्ध लोग इस दिशा में मिलकर काम करेंगे इससे जन-जन तक जागरूकता फैलाना और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर कलंक के भाव को दूर करना अपेक्षाकृत आसान होगा। ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, आयरलैंड और यूनाइटेड किंगडम में पहले से ही मानसिक स्वास्थ्य के लिए विशेष मंत्रालय की व्यवस्था है।
विज्ञापन

मानसिक स्वास्थ्य को बनाएं प्राथमिकता - फोटो : Pixabay
अन्य बीमारियों जैसे ही है मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं

देश में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के बढ़ते गंभीर मामलों के लिए लोगों को समय पर इलाज न मिल पाना एक प्रमुख कारण माना जा सकता है। चूंकि लोगों के मन में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर अब भी रूढ़िवादी सोच है, जैसे- लोग क्या सोचेंगे, कहीं मुझे पागल न समझ लिया जाए, मानसिक स्वास्थ्य का इलाज काफी महंगा है, मनोचिकित्सकों से मिलने का मतलब मेरा दिमाग काम नहीं कर रहा है, आदि के चलते लोग समय पर डॉक्टर के पास नहीं जाते हैं, ऐसे में समस्या समय के साथ बढ़ती चली जाती है। मानसिक स्वास्थ्य को लेकर व्याप्त भ्रम औऱ स्टिग्मा के चलते लोग अपनी समस्याएं दूसरों के साथ शेयर नहीं करना चाहते, इस तरह की सोच को बड़ी चुनौती के तौर पर देखा जा रहा है। 

मानसिक स्वास्थ्य की दिशा में आगे का रास्ता संभवत: यह है कि लोगों को इस बारे में जागरूक किया जाए कि मानसिक स्वास्थ्य किसी भी अन्य शारीरिक स्वास्थ्य समस्याओं की तरह ही है। इसलिए यह प्राथमिक स्वास्थ्य प्रणाली का एक अभिन्न अंग होना चाहिए। यही कारण है कि मानसिक स्वास्थ्य को मनोचिकित्सा तक ही सीमित करके देखना फिलहाल बेमानी होगी।

मानसिक स्वास्थ्य मौजूदा समय की प्राथमिकता भी है, और इससे संबंधित विकार बड़ी चुनौती भी। इन दोनों पर बेहतर तरीके से ध्यान देने के लिए आवश्यक है कि इसमें जन-जन की भागीदारी सुनिश्चित की जाए। सोशल मीडिया, एनजीओ, जागरूकता अभियानों आदि के माध्यम से लोगों को मानसिक स्वास्थ्य की आवश्यकताओं के बारे में जागरूक किए जाने की जरूरत है, जिससे लोगों के लिए सहजता से इसका इलाज प्राप्त कर पाना आसान हो, लोग एक दूसरे से अन्य बीमारियों की तरह इस बारे में भी खुल कर बात कर पाएं। क्योंकि ध्यान रहे, स्वस्थ समाज-स्वस्थ भारत का निर्माण तभी किया जा सकेगा जब देश का बच्चा-बच्चा मानसिक रूप से स्वस्थ होगा। 


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक को ट्विटर (@mediabhii) पर फॉलो कर सकते हैं। यह लेख स्वास्थ्य विशेषज्ञों के सुझाव और साझा की गई जानकारियों के साथ मेडिकल रिपोर्ट्स/अध्ययनों के आधार पर तैयार किया गया है। संबंधित अध्ययनों की कॉपी और विशेषज्ञों का परिचय साथ में संलग्न है। लेख का उद्देश्य आत्महत्या रोकथाम को लेकर जागरूकता बढ़ाना है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें