भारत से पाकिस्तान जाने के बाद मेहंदी हसन पूरी दुनिया में अपनी पहचान बना चुके थे।
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मेहदी हसन कहते थे
बुलबुल ने गुल से,
गुल ने बहारों से कह दिया,
एक चौदहवीं के चांद ने तारों से कह दिया,
दुनिया किसी के प्यार में जन्नत से कम नहीं,
एक दिलरूबा है दिल में, तो हूरो से कम नहीं।
उनके गले से निकले यह शब्द हर प्यार करने वाले की आवाज बन जाते हैं।
उनकी गजलों ने जैसे लोगों के अन्दर का खालीपन पहचान कर बड़ी खूबी से उस खालीपन को भर दिया। न किसी की आंख का नूर हूं, न किसी की दिल का करार हूं। जो किसी के काम न आ सके, मैं वो एक मुश्ते-गुबार हूं।
कहते-कहते मेहंदी हसन साहब एक बड़ी बात कह जाते हैं
तन्हा-तन्हा मत सोचाकर,
मर जाएगा, मर जाएगा,
मत सोचा कर..।
उनके जाने के बाद हम कह देते हैं कि लो,अब हम नहीं सोचेंगे। पर आपने तो हमे जिन्दगी भर सोचने का सामान दे दिया।
भारत से पाकिस्तान जाने के बाद मेहंदी हसन पूरी दुनिया में अपनी पहचान बना चुके थे। 1978 में मेहदी हसन जब अपनी भारत यात्रा पर आए तो उस समय गजलों के एक कार्यक्रम के लिए वे राजकीय मेहमान बन कर जयपुर आए थे। तब उनकी इच्छा पर प्रशासन द्वारा उन्हें उनके पैतृक गांव झुंझुनू जिले के लूणा ले जाया गया था।
कारों का काफिला जब गांव की ओर बढ़ रहा था तो रास्ते में उन्होंने अपनी गाड़ी रुकवा दी। गांव में सड़़क किनारे एक टीले पर छोटा-सा मंदिर बना था, जहां वे रेत में लोटपोट होने लगे। उस समय जन्म भूमि से ऐसे मिलन का नजारा देखने वाले भी भाव विभोर हो उठे थे। ऐसा लग रहा था जैसे वे मां की गोद में लिपटकर रो रहे हों।
उन्होंने लोगों को बताया कि बचपन में यहां बैठ कर वे भजन गाया करते थे। जिन लोगों ने मेहदी हसन को नहीं देखा, वे भी उन्हें प्यार और सम्मान करते है। शायद ऐसे ही वक्त के लिए मेहदी हसन ने यह गजल गाई है-मौहब्बत करने वाले कम न होंगे, तेरी महफिल में लेकिन हम न होंगे।
मेहदी हसन को गजल का राजा माना जाता है।
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शायर अहमद फराज की गजल- रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिये आ- से मेहंदी हसन को पहली बार अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। उसके बाद उन्होंंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। इस गजल को मेहंदी हसन ने शास्त्रीय पुट देकर गाया था।
मेहदी हसन ध्रुपद,ख्याल,ठुमरी व दादरा बड़ी खूबी के साथ गाते थे। इसी कारण लता मंगेशकर कहा करती हैं कि मेहंदी हसन के गले में तो सरस्वती बसती हैं।
पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा हाल हमारा जाने हैंं। जैसी मध्यम सुरों में ठहर-ठहर कर धीमे-धीमे गजल गाने वाले मेहंदी हसन केसरिया बालम आओ नी पधारो म्हारे देश जैसी राजस्थान की प्रसिद्ध मांड को भी उतनी ही शिद्दत के साथ गाया है। उनकी राजस्थानी जुबान पर भी उर्दू जुबान जैसी पकड़ थी।
मेहदी हसन को गजल का राजा माना जाता है। उन्हें खो साहब के नाम से भी जाना जाता है। वैसे तो गजल के इस सरताज पर पाकिस्तान गर्व करता है, मगर भारत में भी उनके मुरीद कुछ कम नहीं हैं। मेहदी हसन को कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।
जनरल अयूब खान ने उन्हें तमगा-ए इम्तियाज, जनरल जिया उल हक ने प्राइड ऑफ परफॉर्मेंस और जनरल परवेज मुशर्रफ ने हिलाल-ए- इम्तियाज पुरस्कार से सम्मानित किया था। इसके अलावा भारत ने 1979 में सहगल अवॉर्ड से सम्मानित किया।
मेहंदी हसन की झुंझुनू यात्राओं के दौरान उनसे जुड़े रहे नरहड़ दरगाह के पूर्व सदर मास्टर सिराजुल हसन फारूकी बताते थे कि मेहंदी हसन साहब की झुंझुनूू जिले के नरहड़ स्थित हाजिब शक्करबार शाह की दरगाह में गहरी आस्था थी।
वो जब भी भारत आए तो नरहड़ आकर जरूर जियारत करते रहें हैं। मशहूर कब्बाल दिलावर बाबू का कहना है कि यह हमारे लिए बड़े फक्र की बात है कि उन्होंंने झुंझुनू का नाम पूरी दुनिया में अमर किया। उन्होंंने गजल को पुनर्जन्म दिया।
दुनिया में ऐसे हजारों लोग है जो उनकी वजह से गजल गायक बने। उन्होंंने गजल गायकी को एक नया मुकाम दिया। अन्तर्राष्ट्रीय गजल गायक राजकुमार रिजवी उनकी पत्नी इंद्रानी रिजवी व उनकी पुत्री मेहदी हसन साहब की विरासत को आगे बढ़ा रहें हैं। राजकुमार रिजवी मेहदी हसन के परिवार से हैं तथा दुनियाभर में अपनी कला को प्रदर्षित करते रहते हैं।
वक्त के साथ उनके सभी साथी इस दुनिया को छोडकर जा चुके हैं। लेकिन गांव के दरख्तों, कुओं की मुंडेरों और खेतों में उनकी महक आज भी महसूस की जा सकती है। लूणा गांव की हवा में आज भी मेहदी हसन की खुशबू तैरती है मगर उसे महसूस करने वाले लोग अब नहीं रहें है।
मेहंदी हसन की मृत्यु होने की खबर सुनकर लूणा सहित पूरे देष में शोक की लहर दौड़ गई थी। मेहंदी हसन को चाहने वाले खुदा से दुआ करते रहतें हैं कि हसन साहब को जन्नत नसीब हो।
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