अगर कुछ देर के लिए एग्जिट पोल के नतीजों पर गौर करें तो ये साफ हो जाता है कि जिस तरह आप के बंपर जीत और भाजपा की बुरी तरह हार की भविष्यवाणियां की गई थी, वह गलत साबित हुईं।
- फोटो : अमर उजाला
आखिर क्या है कांग्रेस की हालत?
राहुल गांधी बेशक अपनी यात्रा से भारत को जोड़ने का दावा कर रहे हों, देश की नब्ज़ को टटोलने की कोशिश कर रहे हों, लेकिन अभी उनकी इस यात्रा को कहीं से भी पार्टी का फायदा होता नहीं दिख रहा। अपनी निजी छवि बनाने की उनकी ये कोशिश सियासी तौर पर आने वाले दिनों में कितना असर दिखाएगी, यह तो 2024 के चुनावों में पता चलेगा, लेकिन फिलहाल उसका नतीजा कहीं नजर नहीं आ रहा।
वैसे भी गुजरात या दिल्ली में कांग्रेस ने पहले ही हथियार डाल रखे हैं और हिमाचल में अलग वह कांटे की टक्कर में है तो यह हिमाचल की जनता की मजबूरी कह सकते हैं और जयराम ठाकुर के गिरते ग्राफ का असर या फिर वहां का ‘सियासी रिवाज़’। लेकिन दिल्ली के नतीजे एक ऐसे मजबूत विकल्प और मजबूत विपक्ष का संकेत देते हैं जो कहीं न कहीं कांग्रेस के लिए एक राष्ट्रव्यापी खतरे के अंदेशे से भरा हुआ लगता है।
आप को भाजपा की बी टीम बताने वाली पार्टियां ये मानती रही हैं कि केजरीवाल कहीं न कहीं भाजपा की ही उपज हैं और उन्हें बढ़ाने के पीछे भाजपा की दूरगामी रणनीति है ताकि कांग्रेस को खत्म किया जा सके। लेकिन इन सियासी अटकलों के बावजूद ये देखने वाली बात है कि आखिर जनता का मूड क्या है और कैसे वह एक बेहतर विकल्प की तलाश में बेचैन है। उसे वह विकल्प आम आदमी पार्टी के रूप में दिखाई दे रहा है। उसे लगता है कि केजरीवाल की बातों में दम है और कम से कम दिल्ली की जनता को पिछले सात आठ सालों में केजरीवाल सरकार ने जो सहूलियत दी हैं, वह किसी सरकार ने नहीं दीं।
मुफ्त और सस्ती बिजली, मुफ्त इलाज और बेहतर अस्पताल और मोहल्ला क्लिनिक के साथ सरकारी स्कूलों के कायाकल्प और महिलाओं को बसों में मुफ्त सफर की सुविधा देकर केजरीवाल ने लोगों का दिल जीता है। बेशक आबकारी घोटाला या शराब की उनकी नीति ने उन्हें ज़रूर कठघरे में खड़ा किया हो लेकिन जनता ने उन्हें कम से कम नगर निगम में भाजपा से बीस ही माना है।
ये अलग सवाल है कि अब वो जिस कूड़े के पहाड़ को हटाने के नाम पर, यमुना की सफाई के नाम पर और एक स्वच्छ दिल्ली देने के नाम पर वह चुनाव जीते हैं, उसे व्यावहारिक तौर पर वह कैसे पूरा करते हैं। लेकिन अब तक प्रदूषण कम करने को लेकर की गई उनकी कोशिशें या जनता को दी जाने वाली अन्य सहूलियतों का ही असर है कि उन्हें सीधे तौर पर उसका फायदा मिला है।
जाहिर है चुनौतियां तमाम हैं, और भाजपा के साथ उनका सियासी टकराव भी उनके लिए इस खेल का हिस्सा बना रहेगा, उपराज्यपाल के साथ नए समीकरणों में उनके रिश्तों पर भी नजर बनी रहेगी, लेकिन ये तय है कि आम आदमी पार्टी ने जनता की नजर में खुद को एक मजबूत विकल्प के तौर पर पेश कर दिया है। बाकी तो सियासत है, चलती रहेगी।
----------------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।