केंद्र सरकार को अफस्पा की तरफ फिर से देखना वक्त की जरूरत तो नहीं?
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पूर्वोत्तर में हिंसा का पुराना इतिहास रहा है। 1950 से अलगाववाद और हिंसा की जो आग सुलगी वो कई बार सेनाओं और सुरक्षाबलों की सख्ती की बदौलत ठंडी जरूर पड़ी, लेकिन अंदर ही अंदर सुलगती रही है। इसे सुलगाने में पड़ोसी देशों की भूमिका पर भी सवाल उठते रहे हैं। इसी कारण अफस्पा को कई राज्यों में लागू किया गया था।
अफस्पा हटाने के पीछे तर्क दिया जाता है कि जिन क्षेत्रों में हिंसा में कमी आई या हिंसा बंद हो गई वहां से इसे हटा लिया गया। 1980 के दशक में मिजोरम से इस कानून को पूरी तरह हटा दिया गया था। वहीं त्रिपुरा से 2015 और मेघालय से 2018 में इसे पूरी तरह हटा लिया गया था। इन तीनों राज्यों से कानून हटाने के पीछे वैध कारण थे और निश्चित तौर पर इन राज्यों में अलगाववाद की आग पूरी तरह बुझ चुकी है।
पर मणिपुर में परिस्थतियां दूसरे तरह की थी। भौगोलिक दृष्टि से भी यहां के हालात अन्य राज्यों से अलग हैं। ड्रग्स की आगोश में पूरा प्रदेश घिरा हुआ है। हाल ही में गृहमंत्री अमित शाह ने भी मणिपुर दौरे के दौरान बड़ा बयान दिया था कि जल्द ही प्रदेश को ड्रग्स मुक्त कर दिया जाएगा। राज्य सरकार ने भी हाल के दिनों में बड़ा अभियान छेड़ रखा है। सरकार अफीम की खेती को नष्ट कर रही है। माना जा रहा है कि इसकी मार म्यांमार के अवैध प्रवासियों पर भी पड़ रही है।
ये अवैध प्रवासी प्रदेश की कुकी-जोमी जनजाति से ताल्लुक रखते हैं। सरकार इन्हें सरकारी जमीन पर अफीम की खेती करने से रोक रही है और इनकी पहचान कर रही है। जंगलों में बसे अवैध प्रवासियों को बाहर निकालने की राज्य सरकार की कार्रवाई से सरकार विरोधी संगठन नाराज थे। ऐसे में हाईकोर्ट के निर्देश के बाद मैतेई समुदाय को अनुसूचित-जनजाति में शामिल करने की राज्य सरकार की पहल ने विरोधी संगठनों को एक मौका दे दिया।
मैतेई समुदाय का बड़ा हिस्सा हिन्दू है और बाकी मुस्लिम। प्रदेश के जिन 33 समुदायों को जनजाति का दर्जा मिला है, वे नगा और कुकी जनजाति से हैं। इन दोनों जनजातियां के लोग मुख्य रूप से ईसाई हैं। राज्य की अनुसूचित जनजाति समूहों को ही पहाड़ों में जमीन खरीदने और बसने का अधिकार है। ऐसे में सरकार के ताजा प्रयासों के बाद अगर मैतेई समुदाय को एसटी वर्ग में शामिल कर लिया गया तो उन्हें भी पहाड़ों में जमीन खरीदने का अधिकार मिल जाएगा।
राज्य सरकार सहित केंद्र सरकार भी इस सच्चाई से अच्छी तरह रूबरू थी कि वहां मैतेई समुदाय के साथ नगा और कुकी जनजातियों के रिश्ते किस तरह से हैं। ऐसे में अगर दो बड़े अभियान (ड्रग्स और एसटी कानून) चलाए जाने की रूपरेखा पहले से तैयार थी तो प्रदेश के अधिकतर इलाकों से अफस्पा जैसे सशक्त कानून को हटाने की जल्दी क्यों थी?
ऐसा तो होगा नहीं कि सरकार के पास विरोध और हिंसा के इनपुट नहीं रहे होंगे। फिर सुरक्षा के पुख्ता इंतजामों को क्यों नहीं परखा गया। विरोधी ताकतें हिंसा के दौरान जिस तरह से घातक हथियारों से लैस थी उसने कई सवालों को जन्म दे दिया है।
पूर्वोत्तर में उग्रवाद के पीछे चीन?
पूर्वोत्तर में चीन द्वारा उग्रवाद को बढ़ावा देने की तमाम संभावना हमेशा से मौजूद रही है। मणिपुर सहित पूर्वोत्तर में विद्रोही संगठनों के म्यांमार में अराकान आर्मी और यूनाइटेड व स्टेट आर्मी जैसे सशस्त्र समूहों के साथ संबंध हैं, जहां से चीनी हथियार पूर्वोत्तर में अपना रास्ता तलाशते रहे हैं। कई रिपोर्ट में यह बात भी सामने आ चुकी है कि चीन ने पूर्वोत्तर के उग्रवादी नेताओं को सुरक्षित आश्रय भी प्रदान किया है। इसमें यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) के कमांडर परेश बरुआ और नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड (आईएम) के फंटिंग शिमरंग शामिल हैं।
अलगवावादी संगठनों का यह इतिहास रहा है कि वो किसी स्थानीय मुद्दे की आड़ लेकर अपने हित साधने में लगे रहते हैं। ऐसे में मणिपुर की ताजा हिंसा की यह आग जल्द बुझने की संभावना कम है। ऐसे में केंद्र सरकार को अफस्पा की तरफ फिर से देखना वक्त की जरूरत तो नहीं?
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