पहाड़ों में बेहतर आधारभूत ढांचा और स्वास्थ्य सेवा एक बड़ा मुद्दा है।
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वहीं इंफाल हवाई अड्डे को विकसित कर अन्तर्राष्ट्रीय उड़ानों के अनुरूप बनाया गया है। अब ये गुहाटी के बाद पूर्वोत्तर का सबसे बड़ा विमान पत्तन है। बात अगर सड़क और रेलवे के आधारभूत ढांचे विकास की करें तो इस मोर्चे पर भी मणिपुर आगे है। मणिपुर में रेल लाने का श्रेय भाजपा सरकार को है। जीरीबाम तक चालू ट्रेन अब इम्फाल पहुंचने को है। वही इम्फाल से म्यांमार सीमा के मोरहे तक इस रेलवे को ले जाने का निर्णय भी लिया जा चुका है।
केंद्र सरकार की दरियादिली से यहां 16 राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माणाधीन हैं। जबकि भारत म्यांमार और थाईलैंड को जोड़ने वाली ट्रांस रोड योजना भी अब अंतिम चरण में है। इन सब के बीच यहां के नागा पहाड़ी जिले तामेंगलोंग तक पहली मालगाड़ी दौर चुकी है। यह नागा स्वाभिमान की प्रतीक रानी गाइदिन्ल्यू का गृह जिला है। जहां केंद्र सरकार के पहल से जनजातीय नायकों के स्मृति में एक संग्रहालय भी निर्माणाधीन है।
भाजपा और कांग्रेस के वादे
बात अगर मणिपुर चुनाव के अन्य मुद्दों की करे तो निश्चित ही बुनियादी जरूरतों के साथ पहाड़ों में बेहतर आधारभूत ढांचा और स्वास्थ्य सेवा एक बड़ा मुद्दा है। मणिपुर में पहाड़ क्षेत्रफल का 90% है। वहीं आबादी का 40% भी यही निवास करती है। ऐसे मे असमान विकास यहां सामाजिक विद्वेष का कारण भी हो सकती है। मैतेई बनाम नागा एवं कूकी जनजाती संघर्ष देखने को मिल सकता है।
इन चुनावों में कांग्रेस माउंटेन इकनॉमी नाम से पहाड़ों में समान विकास का वादा कर रही है। वहीं भाजपा नागा कुकी जनजाति बाहुल्य पहाड़ों में पहुंचाई गई सड़क और हालिया मालगाड़ी रेल लाने का हवाला दे वोट मांग रही है। वैसे जनजातीय समुदाय मे अपनी पहुंच को बढ़ाने के लिए भाजपा सरकार ने कई योजनाएं भी चलाई है।
गो टू हिल और गो टू विलेज के माध्यम से कल्याणकारी योजनाओं को सुदूर पहाड़ों में ले जाया गया है। मणिपुर चुनाव को अगर दलों के हवाले से समझें तो तस्वीर भाजपा बनाम कांग्रेस की बनती दिखती है। जहां क्षेत्रीय एवं अन्य दल सीटों की सेंधमारी मे लगे हैं। सीटों और मत के आधार पर विचार करे तो पहाड़ों में 31सीटें है जबकि घाटी में 29 सीटें आती है।
वहीं आरक्षित सीटों की संख्या 20 है, जिनमें से 19 केवल जनजाति के लिए आरक्षित है। जिस पर दावा केवल नागा एवं कुकी समुदाय का बनता है। बात घाटी की हो तो यह हिंदू मैतेई बाहुल्य है। वहीं पहाड़ नागा और कुकी जनजाति बाहुल्य है। दुर्योग से कुकी पूरी तो नागा जनजाति की बहुसंख्यक आबादी ईसाई मत मे परिवर्तित हो चुकी है। ऐसे में यहां के चुनावों पर इसका भी बड़ा असर होता है।
भाजपा पिछले चुनावों में सर्वाधिक मत 36.28% लेकर भी यहां के पहाड़ों में कमाल दिखाने में असफल रही थी। वहीं कांग्रेस, एनपीएफ और एनपीपी जैसे दल पहाड़ों के नाते ही जीतकर आए थे। कांग्रेस तो मत प्रतिशत मे भाजपा से कम होकर भी सीटों में आगे थी। ऐसे में अगर भाजपा को सरकार बनानी है तो उसे हिंदू मैतेई मतदाताओं के साथ ही नागा एवं कुकी मतदाताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता को सिद्ध करना होगा। बात अगर वयोवृद्ध नेता ईबोबी सिंह के नेतृत्व में उतरी कांग्रेस की करें तो वो अब मैतेई मतदाताओं की पहली पसंद नहीं रही।
वही नागा बाहुल्य सीटों पर भी वो पहले की तरह प्रभावशाली उपस्थिति नहीं रखती है। ईबोबी सिंह के कार्यालय और तत्कालीन गृहमंत्री गायखंगम के तौर तरीकों को लेकर नागा समुदाय में कांग्रेस का विरोध है। उसे यहां कुकी समुदाय का पक्षधर मान हितों पर चोट करने वाला समझा जा रहा है।
ऐसे में नागा बाहुल्य सीटों पर मुख्य मुकाबला एनपीएफ बनाम भाजपा का बनता दिख रहा है। ऐसे में 41.29% ईसाई और करीब 8.4% मुस्लिम आबादी वाले राज्य मे कांग्रेस निश्चित ही अल्पसंख्यक मतों का ध्रुवीकरण चाहेगी। चुनावों में वो अलगाववादी विचारों का समर्थन भी कर सकती है। जिसकी बानगी उसके चुनाव घोषणा-पत्र में है।
भाजपा पिछले चुनावों में सर्वाधिक मत 36.28% लेकर भी यहां के पहाड़ों में कमाल दिखाने में असफल रही थी। वहीं कांग्रेस, एनपीएफ और एनपीपी जैसे दल पहाड़ों के नाते ही जीतकर आए थे।
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कांग्रेस आफस्पा हटाने के साथ ही सरकारी हिरासत में रहे मीडियाकर्मियों को मुआवजे देने की बात कर रही है। जबकि इनकी गतिविधियां संदिग्ध रही है। वहीं हिंदू बनाम मुस्लिम का विवाद भी यहां पहली बार देखने को मिल रहा है। चुनाव तिथियों के आने के बाद का एक गोकशी वीडियो बेहद चौकाने वाला है।
यहां गणतंत्र दिवस पर मुस्लिम युवक समूह द्वारा एक गाय को भाजपाई झंडे मे लपेटकर बेरहम तरीके से काटा गया। इस विभत्स सार्वजनिक घटना में शीर्षस्थ भाजपा नेतृत्व और महिलाओं के लिए अपमानजनक बोला गया।
ऐसी घटनाओं पर चुप्पी और आफस्पा हटाने का जोर शोर से नारा निश्चित ही कांग्रेस के अलगाववादी संगठन एवं चर्च, मौलवियों के समर्थन हेतु एक प्रयास है। फिलहाल मणिपुर के मसले पर कांग्रेस का रुख कुछ ऐसा ही है। वही भाजपा मणिपुर में तेजी से पसरते राष्ट्रवाद के सहारे इन चुनावों में खड़ी है।
हाल के दिनों में तेज गति विकास, शांति और उग्रवादी समूहों के कमर तोड़ कार्यवाही के बाद वो यहां की घाटी में पहली पसंद बन कर उभरी है। वही पहाड़ों में भी करीब आधे दर्जन सीटों पर उसकी दमदार उपस्थिति है। किंतु टिकट बंटवारे के बाद हुए असंतोष ने भाजपा के लिए चुनौतियों को बढ़ाया है।
दरसल निर्दलियों की जीत और क्षेत्रीय दलों के पनपने के लिए मणिपुर की मिट्टी बेहद मुफीद है। पुराने चुनाव कुछ ऐसा ही बताते है। ऐसे में भाजपा के असंतोष और कांग्रेस में कटी टिकटों ने यहां कई नए दलों को भी उभरने का मौका दिया है।
जदयू यहां विधायक रहे 15 प्रत्याशियों के सहारे मैदान में हैं। वहीं शिवसेना मणिपुर विधानसभा के पूर्व उपाध्यक्ष भाजपा नेता टी थांगजालम के सहारे अपनी जमीन टटोल रही है। जबकी मणिपुर भाजपा सरकार की सहयोगी रही एनपीपी 42 सीटों पर तो एनपीएफ 10 सीटों पर चुनाव लड़ रही है।
इसमें एनपीएफ के 19 प्रत्याशी तो भाजपा के संभावित टिकटार्थी थे। ऐसे में इन दलों का उभार निश्चित ही भाजपा और कांग्रेस जैसे स्थापित दलों को नुकसान पहुंचायेगा। पूर्वोत्तर भारत के इस राज्य में प्रति विधानसभा क्षेत्र मतदाता का औसत करीब 30 से 35 हजार है। ऐसे में स्थानीय लोगो से जुड़ा कोई भी प्रत्याशी महज कुछ हजार मतों के सहारे चुनावी परिणाम बदल सकता है। पिछले चुनाव में यहां विधानसभा की आधी से अधिक सीटों पर जीत हार का अंतर दो हजार से भी कम मतों का रहा है।
ऐसे में यहां मतों का मामूली बिखराव भी सत्ता के दौर में खड़े दल विशेष पर भारी पड़ सकता है। अगर बात इस चुनाव में खड़े अन्य दलों के चुनावी रणनीति की करे तो इन्हें भी पता है ये अपने दम पर सरकार नहीं बना सकते। किंतु कुछेक सीटों की बदौलत नई सरकार का हिस्सा हो सकते है।ऐसे में यहां जदयू,लोजपा, एनपीएफ और एनपीपी पार्टी केंद्र से लेकर विभिन्न प्रान्तों में भाजपा की सहयोगी होने को भुना रही है।
दरसल पूर्वोत्तर राज्य के चुनावों में केंद्र सरकार से संबद्ध होना दल विशेष को फायदा पहुंचाता रहा है। एनपीएफ मणिपुर के साथ ही पड़ोसी राज्य नागालैंड मे भाजपा के साथ सरकार चला रही है। जबकि मेघालय के संगमा परिवार की एनपीपी पार्टी मणिपुर मे भाजपा की सहयोगी तो मेघालय मे भाजपा के सहयोग से सरकार चला रही है।
अगर बात इन दलों के चुनौती की करें तो जदयू तीन वही एनपीपी करीब नौ सीटों पर मुकाबले में दिखती है। जबकि नागा पहाड़ी क्षेत्र की 10 सीटों पर कांग्रेस और भाजपा को एनपीएफ से जूझना होगा। ऐसे में ये देखना बेहद दिलचस्प होगा की भाजपा और कांग्रेस पार्टी इनकी चुनौतियों से कैसे निपटती है। बहरहाल मणिपुर का चुनाव बेहद रोचक हो चला है। कभी चुनावों को लेकर उदासीन रहने वाले राज्य में अब चुनावी बयार बह रही है।
वही चुनाव बहिष्कार और चुनावी प्रक्रिया के विरोधी वाले प्रदेश में प्रत्याशी घोषित न किए जाने की सूरत में अब धरने प्रदर्शन हो रहे हैं। यहां की फिजाओं मे घोला गया हिंदी विरोध भी भारत विरोध की तरह काफूर सा हो गया है। कुछ दिल्ली की पहल और कुछ यहां के दमदार खिलाड़ियों के नाते ये सकारात्मक बदलाव दिख रहा है।
वास्तव में ये लोकतंत्र में बढ़ती आस्था,संघवाद मे दिखते भविष्य का दोतक है। वहीं यह भारतीयता में महसूस होते गर्व का भी सूचक है। जहाँ तक चुनावों की बात है तो फिलहाल यहां की नई सरकार का रास्ता इन दलबदलुओं के प्रदर्शन और प्रभाव पर निर्भर करता है। वैसे फिलहाल यहां की फिजाओं मे कमल फूल भगवा दल छाया है।
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