महावीर त्यागी एक घटना के बाद कांग्रेस के बड़े दिग्गजों की नजर में वो सीधे आ गए।
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कैसे बनें कांग्रेस के दिग्गज नेता
हालांकि उस वक्त उन पर इतनी यातनाओं की वजह किसी एक अंग्रेज मजिस्ट्रेट की व्यक्तिगत नाराजगी थी, जिसने उन पर देशद्रोह का केस लगा दिया था और पूरी कोशिश थी कि महावीर त्यागी की अकड़ को खत्म कर सके, लेकिन एक सैन्य अधिकारी रहने वाले महावीर त्यागी को ना झुकना कुबूल था और ना ही माफी मांगना। वैसे भी वो सब कुछ कुर्बान करने की मंशा के साथ तो देश की आजादी की इस जंग में उतरे थे। हालांकि बाद में अंग्रेजी सरकार ने भी इस मामले से खुद को अलग कर लिया था। वो मजिस्ट्रेट बुलंद शहर का था और त्यागी की पकड़ उस वक्त पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में काफी तगड़ी थी।
मजिस्ट्रेट के साथ उनकी तनातनी और होने वाले अत्याचारों के चलते ना केवल जनता की सुहानुभूति उनके साथ हुई बल्कि कांग्रेस के बड़े दिग्गजों की नजर में वो सीधे आ गए। 1921 में गांधी ने उनको लेकर अपनी आवाज उठाई। त्यागी को उस वक्त बुलंद शहर में चार हजार लोगों की एक सभा को सम्बोधित करते वक्त गिरफ्तार कर लिया गया था।
भरी संसद में इसलिए बोल पाए नेहरू से
जेल में ही उनकी मुलाकात पंडित मोतीलाल नेहरू से हुई और जब एक बार बाप-बेटे के बीच कोई गलतफहमी हुई तो वो महावीर त्यागी ने ही दूर की थी। इसी के चलते नेहरू उन्हें मानते थे और वो भरी संसद में नेहरू के मुंह पर उन्ही के खिलाफ बोल पाए। असहयोग आंदोलन के बाद महावीर त्यागी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन में भी जोर शोर से हिस्सा लिया, ढाई साल जेल में रहे, नतीजतन वो कांग्रेस की चुनावी राजनीति में भी हिस्सा लेने लगे।
चुनावी राजनीति में होने के बावजूद महावीर के रिश्ते कांग्रेस के विरोधी क्रांतिकारियों के साथ भी थे, उनके सबसे करीबी थे सचिन्द्र नाथ सान्याल, जिनके संगठन हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (एचआरए) में ही चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त और सुखदेव जैसे क्रांतिकारियों को आगे बढ़ाया था।
उन दिनों अक्साई चिन चीन के कब्जे में चले जाने को लेकर विपक्ष ने हंगामा काट रखा था।
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कालाधन लाने की सबसे पहले पहल
देश की आजादी के बाद वो लोकसभा के लिए चुने गए और नेहरू केबिनेट में उन्हें मिनिस्टर ऑफ रेवेन्यू एंड एक्सपेंडीचर बनाया गया और सबसे दिलचस्प है इस पद पर रहते उनकी एक खास उपलब्धि। हर सरकार कालाधन वापस लाने के लिए वोलंटरी डिसक्लोजर स्कीम लेकर आती है, आपको जानकर हैरत होगी कि वो स्कीम पहली बार देश में महावीर त्यागी ही लेकर आए थे। त्यागी ही वो पहले व्यक्ति थे, जिसने धारा 356 लगाने पर केरल की ईएस नम्बूरापाद की सरकार गिराने का विरोध किया था। त्यागी को वो बयान भी काफी चर्चा में रहा था, जिसमें उन्होंने कहा था कि अगर कांग्रेस जाति या संप्रदाय की राजनीति में पड़ती है तो वो अपनी कब्र खुद ही खोद लेगी।
बहरहाल, बाद में त्यागी को पांचवे फाइनेंस कमीशन का अध्यक्ष भी बनाया गया, वित्त और अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में उन्होंने कई सुधार किए। आखिरी समय तक वो राजनीतिक व्यवस्थाओं में सुधार के लिए बयान जारी करते रहे। उन्होंने एक कांग्रेसी होने के नाते ना केवल जयप्रकाश नारायण के आंदोलन पर सवाल उठाए बल्कि इंदिरा गांधी द्वारा थोपी गई इमरजेंसी पर भी जमकर निशान साधा। आज कांग्रेस में ऐसे नेता कम हैं जो सोनिया या राहुल की भरी महफिल में गलत बात पर खुलकर मुखालफत कर सकें।
विष्णु शर्मा वरिष्ठ पत्रकार हैं। 2016 में अपने ऐतिहासिक विषयों पर लिखे गए ब्लॉग के लिए उन्हें एबीपी न्यूज की ओर से बेस्ट ब्लॉगर एवॉर्ड से सम्मानित किया गया है। यह लेख उनके ब्लॉग संग्रह से साभार लिया गया है।
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