दूसरा, ऐसी घटनाओं से यह संदेश भी जाता है कि राज्यपाल परोक्ष रूप से स्वयं ही मुख्यमंत्री बनकर काम करना चाहते हैं, जबकि उनकी भूमिका प्रदेश के संरक्षक की है न कि कार्यकारी प्रमुख की। राज्यपाल ऐसा संवैधानिक पद है और जिसका काम राज्य की लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार के फैसलों का सम्मान और विवेकपूर्ण तरीके से अनुमोदन करना है। यदि राज्य सरकार अलोकतांत्रिक तरीके से काम करती है तो राज्यपाल के पास उसे बर्खास्त करने का अधिकार भी है।
महाराष्ट्र का विमान प्रकरण यूं तो बहुत छोटा है। सरकारी विमान पर राज्य सरकार का अधिकार होता है। लेकिन वह पद का सम्मान करते हुए और सौहार्दपूर्ण रिश्तों को ध्यान में रखते हुए राज्यपाल को सरकारी विमान से आने जाने की इजाजत दे देती है। हालांकि अभी तक गवर्नरों को अपना विमान रखने देने की इजाजत देने की मांग नहीं उठी है, लेकिन कोश्यारी प्रकरण के बाद यह मुद्दा भी उठ सकता है कि जब मुख्यधमंत्री के पास शासकीय विमान हो सकता है तो यही सुविधा राज्यपालों को क्यों नहीं? हो सकता है कि ‘तुम डाल-डाल तो हम पात-पात’ की तर्ज पर केंद्र सरकार भविष्य में कोई ऐसा प्रावधान कर भी दे।
लेकिन महाराष्ट्र में जो हुआ, उससे ऐसा लगता है कि यह राज्यपाल और सीएम ठाकरे के बीच जारी टकराव को और हवा देने की कोशिश है। लोकतांत्रिक सदाशयता के हिसाब से सरकारी प्लेन उपलब्ध कराते समय यह बारीकी से नहीं देखा जाता कि वह शासकीय कार्य से मांगा गया है या अथवा निजी काम के लिए। अमूमन कोई भी मुख्यमंत्री महज एक सरकारी प्लेन की वजह से राज्य के संवैधानिक प्रमुख से टकराव बढ़ाने की शायद ही सोचता है। लेकिन शिवसेना ने भाजपा के आरोपों का जवाब जिस अंदाज में दिया है, उसके पीछे लगता है कि राजनीतिक मंशाएं और बदले की कारवाई ज्यादा है।
शिवसेना के संजय राउत ने एक तरफ राज्यपाल पद के सम्मान की बात कही तो दूसरी तरफ राज्यपाल पर कैबिनेट के अपमान का आरोप भी लगा दिया। राउत ने कहा कि 'राज्यपाल ने एक साल से 12 नाम (विधान परिषद में मनोनयन के लिए) रोककर रखे हैं, जोकि गैर कानूनी है, संविधान के खिलाफ है। यह 10 मिनट का काम है, फाइल खोलो और साइन कर दो।
आपको 15 मिनट फ्लाइट में बैठना पड़ा तो आपको लगता है कि यह ठीक नहीं हुआ, यह अपमान हुआ, लेकिन यदि कैबिनेट ने एक प्रस्ताव भेजा हुआ है तो आप रोककर रखे हैं, यह भी कैबिनेट का अपमान है।'' गौरतलब है कि जो नाम राज्यपाल ने रोक रखे हैं, उनमें एक नाम भाजपा छोड़ पिछले दिनो एनसीपी मे गए नेता एकनाथ खडसे का भी है। जो अब एनसीपी के टिकट पर विधान परिषद जाना चाहते हैं। खडसे और फडणवीस का छत्तीस का आंकड़ा जगजाहिर है।
यह भी सही है कि राज्यपाल कोश्यारी ने कई कदम ऐसे उठाए, जिससे ठाकरे सरकार तिलमिलाई हुई है और जिनको लेकर कई प्रश्नचिह्न हैं। उधर पश्चिम बंगाल के राज्यपाल धनखड़ भी अपने बयानों से मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी और उनकी सरकार को कटघरे में खड़े करते रहते हैं। ऐसे विवादित और विवादप्रिय राज्यपालों के नामो की सूची और भी लंबी हो सकती है, क्योंकि ऐसा पहले भी होता रहा है। हालांकि शीतयुद्ध के बाद भी ज्यादातर राज्यपाल और मुख्यमंत्री लक्ष्मण रेखाओं का पालन करते रहे हैं। यही उनसे अपेक्षित भी है।
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