अंततः सवा साल से कांग्रेस में ठगा सा महसूस कर रहे सतत् उपेक्षित ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेसी से भाजपाई हो ही गए, साथ ही कमलनाथ सरकार की विदाई की पटकथा भी आगे के एपिसोड की तरफ़ बढ़ गई। राहुल गांधी के नवाचार और खुद राहुल को फेल करने में कामयाब रही कांग्रेस की बुजुर्ग टीम को जोर का झटका जोर से लगा होगा, लेकिन वे इससे सबक लेंगे ऐसा लग नहीं रहा है। लगता है अभी इस तरह के एपिसोड कुछ और राज्यों में लग सकते हैं। भाजपा की राज्यसभा में भी लोकसभा की तरह ताकतवर बनने की मुहिम परवान चढ़ाना भी इसका बड़ा हिस्सा है।
अब आगे क्या संभव
भाजपा सिंधिया को राज्यसभा भेजकर महत्वपूर्ण मंत्रालय दे सकती है। इसके अलावा मप्र में सिंधिया समर्थक विधायक को उप मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है। पौने चार साल बाद विधानसभा चुनाव में सिंधिया भाजपा का सीएम चेहरा हो सकते हैं। जिस ग्वालियर चंबल में भाजपा को 2018 के चुनाव में सर्वाधिक नुकसान हुआ था, वहां कांग्रेस सर्वाधिक कमजोर हो सकती है और भाजपा ताकतवर। इसके अलावा मालवा में अपनी ताकत कम होने की भरपाई भी भाजपा कर सकेगी। विंध्य में भाजपा की ताकत बरकरार है ही।
अस्वीकार्यता का खतरा नहीं
ज्योतिरादित्य की दादी विजयाराजे सिंधिया जनसंघ को ताकतवर और भाजपा स्थापित करने वाले शीर्ष नेताओं में पूजनीय दर्जे पर हैं। बुआ वसुंधराराजे राजस्थान में दो दफा सीएम रह चुकी हैं। यशोधरा राजे सिंधिया दो बार मप्र में मंत्री और दो बार सांसद रही हैं।
भाजपा कार्यकर्ताओं में ज्योतिरादित्य की स्वीकार्यता राजमाता के पोते के रूप होगी। उनके पिता माधवराव सिंधिया पहली दफा 1971 में जनसंघ के टिकट पर ही सांसद बने थे। कांग्रेस में तो वे 1980 में आए। उन्होंने 1996 में कांग्रेस छोड़कर मप्र विकास कांग्रेस बनाई थी, जिसके दो सांसद और वोट प्रतिशत भी था।
दिग्विजय सिंह- ज्योतिरादित्य सिंधिया
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इतिहास बहुत कुछ कहता है
विजयाराजे सिंधिया को कांग्रेस तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारका प्रसाद मिश्र के कारण छोड़नी पड़ी थी। मिश्रा के शिष्य अर्जुन सिंह के कारण माधवराव सीएम और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नहीं बन सके। अर्जुन के शिष्य दिग्विजय सिंह के कारण ज्योतिरादित्य सिंधिया का वही हश्र हुआ।
महाराष्ट्र और राजस्थान में असर संभव
कांग्रेस की महाराष्ट्र और राजस्थान की सियासत पर सिधिया के भाजपा गमन का असर पड़ेगा। महाराष्ट्र में तो सिंधिया प्रत्याशी चयन की स्क्रीनिंग कमेटी के प्रमुख थे। कांग्रेस के सहयोग से चल रही शिवसेना के नेतृत्व वाली उद्धव सरकार पर इसके असर की प्रतीक्षा रहेगी ही, लेकिन मिलिन्द देवड़ा का कांग्रेस से मोहभंग किसी परिणित पर पहुंच सकता है। राजस्थान में कांग्रेस को सिंधिया के मित्र सचिन पायलट को सहेजने के जतन करना पड़ेंगे।
भाजपा की यूथ ब्रिगेड मजबूत
कांग्रेस में बार-बार रही यूथ ब्रिगेड और कमजोर हो सकती है। भाजपा में और मजबूत होने के आसार हैं। भाजपा राष्ट्रीय स्तर पर तो युवा नेतृत्व विकसित कर ही रही है, मप्र में 50 साल के विष्णुदत्त शर्मा को हाल ही में अध्यक्ष बनाया गया है।
वे एक साल में ही प्रदेश महामंत्री से सांसद और प्रदेश अध्यक्ष बन गए। दूसरी तरफ 75 साल के कमलनाथ मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष एक साथ हैं। सिधिया की बगावत की जड़ कांग्रेस में बुजुर्गों का हावी होना है। इसमें 70 पार वाले दिग्विजय प्रमुख किरदार हैं।
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