शिवराज सिंह चौहान जिताएंगे मध्यप्रदेश
- फोटो : instagram/Shivraj Singh Chauhan
अब फिर सीएम रेस की बात। मान लीजिए कि यदि किसी तरह भाजपा फिर सत्ता में लौटी तो लाख टके का सवाल होगा कि ‘कौन बनेगा मुख्यमंत्री?
‘चूंकि पार्टी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चेहरे पर चुनाव में उतर रही है, इसलिए जीत का पहला श्रेय उन्हीं को जाएगा। चूंकि वो प्रधानमंत्री हैं और साथ में मुख्यमंत्री बनने से रहे तो संभव है कि राज्य में उन्हीं की पसंद का कोई चेहरा सरकार की कमान संभाले। यहां पेंच यह है कि अगर भाजपा जीती तो वो सकारात्मक जनादेश तो शिवराज सरकार के काम पर ही होगा। ऐसे में शिवराज फिर सीएम पद के स्वाभाविक उम्मीदवार होंगे।
उत्तराखंड का उदाहरण क्या कहता है?
हम उत्तराखंड का उदाहरण लें तो वहां मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी अपना चुनाव हार गए थे, लेकिन पार्टी जीत गई थी, लिहाजा जीत का श्रेय धामी और उनकी सरकार के काम को ही दिया गया। काम और जाति समीकरण के हिसाब से धामी को हार के बाद भी फिर से सीएम बना दिया गया। मप्र में भाजपा आला कमान अगर शिवराज का टिकट काटने की हिम्मत नहीं कर पाया तो इसका मुख्य कारण यह है कि वो प्रदेश में ओबीसी का सबसे प्रभावशाली चेहरा भी हैं।
भाजपा मप्र में दो दशकों से ओबीसी की राजनीति कर रही है, जिसमें कांग्रेस अब ओबीसी जनगणना की मांग उठाकर सेंध लगाने की कोशिश कर रही है। यह सेंध न लगे, इसलिए भी शिवराज को टिकट देना जरूरी था। वरना ओबीसी में गलत संदेश जाता। हालांकि जाति जनगणना का मुद्दा उठाने वाली कांग्रेस राज्य में ओबीसी मुख्यमंत्री बनाने की बात से पूरी तरह किनारा कर रही है। इस मुद्दे का लाभ उसे तब और ज्यादा मिलता, अगर वो किसी ओबीसी चेहरे को सीएम के रूप में प्रोजेक्ट करने की बात भी करती।
बहरहाल, यदि भाजपा जीती तो उसके सामने सीएम का नया चेहरा चुनना टेढ़ी खीर होगी, क्योंकि राज्य में कम से कम आधा दर्जन सीएम पद के दावेदार हैं। एक पर हाथ रखा जाएगा तो दूसरा नाराज होगा और इसमें जातीय समीकरण तो अंतर्निहित हैं हीं। उस परिस्थिति में शिवराज फिर ‘कम्प्रोमाइजिंग कैंडीडेट’ हो सकते हैं। दूसरा, भाजपा आलाकमान के लिए आज मप्र जीतने से भी ज्यादा अहम दिल्ली के तख्त पर काबिज रहने के लिए लोकसभा चुनाव जीतना है।
हिंदी राज्यों में भाजपा की परीक्षा
वर्तमान हालात में बिहार, महाराष्ट्र, दक्षिण व पूर्वोत्तर राज्यों में भाजपा की स्थिति अच्छी न होने से हिंदी प्रदेशों से ही उसे अधिकतम सीटें निकालनी होंगी। तब शिवराज ही सक्षम चेहरा दिखाई दे सकते हैं।
भाजपा की सारी कोशिश यही है कि मप्र में विपक्ष का जाति जनगणना का दांव उसके ओबीसी वोटों में ज्यादा सेंध न लगा पाए, इसलिए यहां गैर ओबीसी चेहरे अगर सीएम पद का ख्वाब देख भी रहे हैं तो इसके साकार होने की संभावना बहुत कम है। जातीय गणित इसकी इजाजत शायद ही दे।
हालांकि ये सारी बातें तभी संभव हैं, जब भाजपा विधानसभा चुनाव जीते। जीती तो मानकर चलिए कि पार्टी को शिवराज की जरूरत कम से कम अगले लोकसभा चुनाव तक तो पड़ेगी ही। उसी के बाद भाजपा में सीएम की रेस का दूसरा ट्विस्ट आएगा, जो राज्य में भाजपा की भविष्य की सियासत की नई दिशा भी तय करेगा।
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