भाजपा और कांग्रेस सहित कुछ राजनीतिक दलों के 18 वीं लोकसभा चुनाव के लिए घोषणा पत्र जारी हो चुके हैं। कुछ के होने वाले हैं और बाकी कुछ के लिए घोषणा पत्र जारी करने से ज्यादा चिंता अपना राजनीतिक वजूद बचाने की है। सरसरी तौर पर देखा जाए तो सभी पार्टियों के चुनाव घोषणा पत्र में रेवड़ी कल्चर का अधिकाधिक विस्तार और होड़ है। बल्कि यूं कहें कि अपने वैचारिक फ्रेम में रेवड़ी संस्कृति को फिट करने और उसके औचित्य को जताने की पुरजोर कोशिश है। अब तक के अनुभव को देखते हुए कहा जा सकता है कि जिस पार्टी का घोषणा पत्र जितना लोक लुभावन और ‘रेवड़ी पैक’ होता है, उसके सत्ता में आने की संभावना उतनी ही कम होती है।
इसका सीधा अर्थ यह है कि जिस पार्टी का राजनीतिक जनाधार जितना कम होता है, उसकी सियासी शिगूफेबाजी उतनी ही ज्यादा होती है। अगर आप इसी पैमाने पर सारे राजनीतिक दलों के घोषणा पत्रों की टेस्टिंग करें तो सचाई समझ आ जाएगी। इसी के साथ यह सवाल भी नत्थी है क्या चुनावों में मतदाता घोषणा पत्र देख-सुनकर भी वोट देता है या फिर मतदान का हरेक का अपना एक ईको सिस्टम होता है, जिसके अनुरूप वोटर वोट डालता है? वोटर के सामने बड़ी चुनौती यही है कि वह विवेकपूर्ण ढंग से मतदान कैसे करें?
देश के चुनाव नतीजों के ट्रेंड को समझें तो बीते कुछ वर्षों से मतदाता वैचारिक आग्रह- दुराग्रहो और शाब्दिक लफ्फाजी के झांसे में आए बगैर मतदान के लिए उन बातों को प्राथमिकता देता ज्यादा लगता है, जो उसे किसी न किसी न रूप में सीधा फायदा पहुंचाती हैं फिर वह चाहे नकदी के रूप में हों, अवसर के रूप में हो या सुरक्षा अथवा आश्वस्ति के रूप में हो। वह जान चुका है कि चुनाव घोषणा पत्र हर चुनावी सावन में नए सिरे से किया जाने वाला राजनीतिक सुंदरकांड का पाठ है, जिसका व्यवहार के स्तर पर न तो कोई खास महत्व है और न ही वो पार्टियां भी चुनाव बाद इसकी धूल झाड़ती हों, जो जोर- शोर से इसे हर चुनाव की बेला में जारी करती हैं।
अंग्रेजी में चुनाव घोषणा पत्र को ‘मेनीफेस्टो’ कहा जाता है। डिक्शनरी में इसका अर्थ ऐसे राजनीतिक बयान से है, जो सत्ता में आने पर सम्बन्धित दल के कार्यक्रमों की रूप रेखा पेश करता हो, जिसमें सियासी दल की विचारधारा, अभिमत, कार्य योजना, दृष्टि और एप्रोच की झलक मिलती हो। इसे जानकर मतदाता यह तय कर सके कि किसे वोट देना बेहतर होगा, कौन देश अथवा प्रदेश को ठीक से चला सकता है, किसमें एक आम नागरिक की मूलभूत समस्याओं का निदान कर उसकी जिंदगी सुलभ बनाने की क्षमता और इच्छाशक्ति है। लेकिन मतदाता हमेशा इसी आधार पर वोट दे, यह जरूरी नहीं है।
वह प्रसंगानुरूप प्राथमिकताएं तय करके भी कई बार वोट करता है। इसीलिए एक बार जारी घोषणा पत्र राजनीतिक पार्टियों को भी अगले चुनाव में याद नहीं रहता। वो जनभावनाओं और अपेक्षाओं को रेवडि़यों के माध्यम से राजनीतिक दोहन का अधिकाधिक प्रयास करते दिखते हैं। क्योंकि घोषणा पत्रों की पुरानी शब्दावलियां और जुमले अब अपने अर्थ खो चुके हैं। ( कुछेक राजनीतिक दल अभी भी उसी से चिपके हुए हैं, वो अलग बात है)। ऐसे में मतदाता को लुभाने के लिए दरकार है नए जुमलों, प्रतीकों और प्रलोभनों की। इसकी छाया हमे खुद घोषणापत्रों की वैकल्पिक संज्ञाओं में देखने को मिलती है। ज्यादातर पार्टियों ने घोषणा पत्रों के राजनीतिक पर्यायवाची खोज लिए हैं।
मसलन न्याय पत्र, संकल्प पत्र, वचन पत्र, दृष्टि पत्र, गांरटी पत्र आदि। दिलचस्प बात यह है कि जैसे जैसे घोषणापत्रों में गांरटियों का पलडा भारी होता जा रहा है, विचार पक्ष का स्पेस उतना ही कम होता जा रहा है। घोषणा पत्र जारी करने में भी प्रतीकात्मक राजनीति का पूरा खयाल रखा गया है। मसलन कांग्रेस ने पूर्व केन्द्रीय मंत्री व दलित नेता बाबू जगजीवन राम के जन्म दिन पर घोषणा पत्र जारी किया तो भाजपा ने संविधान निर्माता डॉ. बाबा साहब अंबेडकर की जयंती पर अपना घोषणा पत्र जारी किया।
इस बार चुनाव घोषणा पत्र में कांग्रेस का न्याय पत्र चर्चा में है। इसमें 5 न्याय और 25 गारंटियों की बात कही गई है। कहा जा रहा है कि यह घोषणा पत्र, वर्क, वेल्थ और वेलफेयर ( काम, धन और कल्याण) के तत्वों पर आधारित है। इस घोषणा पत्र की भावना अच्छी है, लेकिन वादे हवाई ज्यादा हैं। कांग्रेस के घोषणा पत्र में एक बड़ा वादा सबकी महालक्ष्मी योजना का है। इसके तहत गरीब परिवारों को सीधे एक लाख रुपये नकद देना का वादा है। देश में बीपीएल परिवारों की संख्या करीब 30 लाख है। प्रत्येक परिवार को हर साल 1 लाख नकद देने के लिए सालाना 3 खरब रूपए चाहिए। ये कहां से आएंगे, स्पष्ट नहीं है।
दूसरी बात यह है कि कांग्रेस व अन्य विरोधी पार्टियां मोदी सरकार द्वारा 80 करोड़ गरीब परिवारों को मुफ्त राशन योजना देने की आलोचना इस आधार पर करती हैं कि सरकार फ्री अनाज के बजाए काम दे। अब इस 1 लाख रू. को किस श्रेणी में रखा जाएगा। वैसे देश के पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम का दावा है कि पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियों की वजह से देश में 10 सालों में 24 करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर निकले थे। वहीं अब मोदी सरकार का दावा है कि बीते दस साल में 24.8 करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर निकले ( नीति आयोग की रिपोर्ट)।