राजस्थान के घटनाक्रम से जहां कांग्रेस की किरकिरी हुई है, वहीं कांग्रेस और भाजपा में फर्क साफ दिखता है।
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कांग्रेस-भाजपा में फर्क साफ दिखता है
राजस्थान के घटनाक्रम से जहां कांग्रेस की किरकिरी हुई है, वहीं कांग्रेस और भाजपा में फर्क साफ दिखता है। भाजपा ने गुजरात में विजय रुपाणी, कर्नाटक में येदियुरप्पा, असम में सर्बानंद सोनोवाल और उत्तराखंड में त्रिवेंद्र रावत, तीरथ सिंह जैसे कद्दावर सीएम बदले। पार्टी का अंतर्विरोध कांग्रेस की तरह खुलकर सामने नहीं आया।
भाजपा में सभी ने भरे मन से ही सही, हाईकमान के फैसले को सिर आंखों पर लिया। और तो और चुनावी राज्यों में तो सीएम चेहरा बदलने का भाजपा ने फायदा ही उठाया। उत्तराखंड इसकी मिसाल है। जाहिर है राजस्थान का घटनाक्रम जहां कांग्रेस के लिए आपदा है, वहीं भाजपा के लिए यह विधानसभा और लोक चुनाव के लिए अवसर पैदा करता है।
विपक्षी एकजुटता की हांडी पर आंच
देवीलाल की श्रद्धांजलि के बहाने विपक्षी एकजुटता की हांडी में पक रही खिचड़ी में भी 10 का दम नहीं दिखा। यूं तो 17 दलों के दिग्गजों की जुटान का न्योता था लेकिन केवल 7 ही जुट पाए। कांग्रेस किनारे रही।
तृणमूल कांग्रेस, टीआरएस, डीएमके, बसपा, सपा, बीजद जैसे क्षेत्रीय दल इस खिचड़ी का हिस्सा नहीं बने। फारूख अब्दुल्ला, अखिलेश, ममता, केजरीवाल, राव, देवगौड़ा, नवीन पटनायक, सतपाल मलिक जैसे दिग्गज आमंत्रण के बावजूद शामिल नहीं हुए। अखिलेश की नाराजगी का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि जब नीतीश कुमार के फूलपुर से चुनाव लड़ने की चर्चा उठी तो सपा प्रमुख की प्रतिक्रिया थी- कम से कम चर्चा तो कर लेते।
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मिले सुर मेरा-तुम्हारा तो सुर बने हमारा का राग आसान नहीं
नीतीश कुमार चाहते हैं कि विपक्षी एकजुटता की धुरी कांग्रेस बने और यही वजह है कि रविवार को लालू-नीतीश ने सोनिया से मुलाकात भी की लेकिन राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव और राजस्थान के सियासी संकट में उलझी कांग्रेस से इस भेंट-मुलाकात के दौरान फिलहाल कुछ बात नहीं बनी। संगठन चुनाव और राजस्थान संकट से निपटने के बाद ही कांग्रेस इस दिशा में आगे बढ़ पाएगी। उधर, विपक्षी एकजुटता के हिमायती कई क्षेत्रीय क्षत्रप कांग्रेस को ज्यादा भाव देने के मूड में नहीं है।
कांग्रेस इस स्थिति के लिए खुद ज्यादा जिम्मेदार नजर आ रही है। जाहिर है, विपक्षी एकजुटता की हांडी में पक रही खिचड़ी का जायका फिलहाल बदलता नजर आ रहा है। ऐसे में कांग्रेस के सामने जहां पार्टी के भीतर के उठ रहे अलग-अलग सुर को एक सुर में बदलने की चुनौती है, वहीं विपक्षी एकजुटता के लिए बाकी क्षेत्रीय क्षत्रपों के अलग-अलग सुर को भी एक सुर में बदलने की चुनौती है। ऐसे में मिले सुर मेरा-तुम्हारा तो सुर बने हमारा का राग उतना आसान नहीं है।
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